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बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैं। राज्यसभा सांसद के रूप में संसद पहुंचे नीतीश कुमार को हाल ही में रेलवे संबंधी संसदीय स्थायी समिति का सदस्य नामित किया गया था, लेकिन उन्होंने इस समिति में शामिल नहीं होने का फैसला लिया। इसके बाद लोकसभा सचिवालय ने उनके नामांकन को औपचारिक रूप से वापस लेने की अधिसूचना जारी कर दी। रेलवे मंत्रालय का लंबा अनुभव रखने वाले नीतीश कुमार का इस महत्वपूर्ण समिति से दूरी बनाना राजनीतिक और संसदीय हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि इस फैसले के पीछे की वजह सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन इसे लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।
लोकसभा सचिवालय ने जारी की अधिसूचना
लोकसभा सचिवालय की ओर से जारी आधिकारिक नोटिस में कहा गया है कि राज्यसभा सदस्य नीतीश कुमार का रेलवे संबंधी स्थायी समिति में किया गया नामांकन वापस लिया जाता है। इससे पहले 4 जून 2026 को जारी लोकसभा बुलेटिन के माध्यम से उन्हें समिति का सदस्य बनाया गया था। संसदीय स्थायी समितियां संसद की कार्यप्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती हैं। ये समितियां विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज, नीतियों और योजनाओं की समीक्षा करती हैं तथा सरकार को सुझाव भी देती हैं। रेलवे संबंधी समिति भी देश के सबसे बड़े मंत्रालयों में से एक रेलवे मंत्रालय के कामकाज पर नजर रखती है, इसलिए इसमें अनुभवी नेताओं की भूमिका काफी अहम मानी जाती है।
रेलवे से रहा है नीतीश कुमार का विशेष जुड़ाव
नीतीश कुमार का रेलवे मंत्रालय से पुराना और मजबूत संबंध रहा है। वह जुलाई 1998 से अगस्त 1999 तक और फिर मार्च 2001 से मई 2004 तक देश के रेल मंत्री रह चुके हैं। उनके कार्यकाल में रेलवे में कई महत्वपूर्ण सुधारों की शुरुआत हुई थी। तत्काल टिकट बुकिंग योजना को व्यापक रूप दिया गया और यात्रियों की सुविधा के लिए इंटरनेट के माध्यम से टिकट बुकिंग जैसी आधुनिक व्यवस्थाओं को बढ़ावा मिला। रेलवे प्रशासन और नीतिगत मामलों की गहरी समझ रखने वाले नेता के रूप में उनकी पहचान रही है। यही कारण है कि रेलवे समिति में उनकी नियुक्ति को एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा था। ऐसे में उनका स्वयं इस समिति से अलग रहने का फैसला कई लोगों को हैरान कर रहा है।
वरिष्ठ नेताओं की परंपरा से जोड़कर देखा जा रहा फैसला
नीतीश कुमार या जेडीयू की ओर से अभी तक इस निर्णय पर कोई विस्तृत बयान सामने नहीं आया है। हालांकि संसदीय मामलों के जानकारों का मानना है कि कई वरिष्ठ और शीर्ष राजनीतिक नेता संसदीय समितियों का हिस्सा बनने से बचते रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पद छोड़ने के बाद किसी संसदीय समिति में सदस्यता नहीं ली थी। इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी भी सत्ता से बाहर होने के बाद ऐसी समितियों से दूर रहे थे। कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने भी कभी किसी स्थायी समिति की सदस्यता स्वीकार नहीं की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार का फैसला भी इसी परंपरा के अनुरूप हो सकता है। हालांकि इसके पीछे कोई अन्य राजनीतिक या रणनीतिक कारण है या नहीं, इस पर अभी आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है।
