पटना: बिहार सरकार की ओर से जमीन और फ्लैटों की रजिस्ट्री के लिए लागू की गई नई पेपरलेस ई-निबंधन व्यवस्था के विरोध में राज्यभर के कातिब, दस्तावेज नवीस और स्टांप वेंडर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए हैं। इसके चलते पटना, मुजफ्फरपुर, नालंदा, समस्तीपुर और रोहतास समेत प्रदेश के सभी 91 निबंधन कार्यालयों में जमीन की खरीद-बिक्री और रजिस्ट्री का काम पूरी तरह प्रभावित हो गया है। सरकार नई व्यवस्था को भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने, बिचौलियों को खत्म करने और निबंधन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने वाला बड़ा प्रशासनिक सुधार बता रही है, लेकिन दूसरी ओर कातिबों का कहना है कि इस व्यवस्था से उनकी आजीविका पर सीधा संकट खड़ा हो गया है। हड़ताल के कारण निबंधन कार्यालयों में कामकाज ठप होने से आम लोगों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है और राज्य के राजस्व पर भी इसका असर पड़ रहा है।
रोजगार खत्म होने का डर, डिजिटल सुरक्षा को लेकर भी उठे सवाल
दस्तावेज नवीस संघ का सबसे बड़ा विरोध इस बात को लेकर है कि नई व्यवस्था को पूरी तरह डिजिटल और सर्विस प्रोवाइडर आधारित बनाए जाने से हजारों कातिबों की रोजी-रोटी पर संकट आ जाएगा। दशकों से इस काम से जुड़े कातिबों का कहना है कि पेपरलेस व्यवस्था का मतलब उनके लिए मुंशीलेस व्यवस्था है, जिससे उनका पारंपरिक व्यवसाय ही समाप्त हो जाएगा। इसके अलावा नई प्रणाली में आधार कार्ड और मोबाइल ओटीपी के जरिए सत्यापन किए जाने को लेकर भी सुरक्षा संबंधी सवाल उठाए जा रहे हैं। कातिबों का तर्क है कि ग्रामीण क्षेत्रों में यदि किसी व्यक्ति का मोबाइल या सिम किसी दूसरे व्यक्ति के पास चला जाए तो फर्जी तरीके से जमीन की रजिस्ट्री किए जाने का खतरा बढ़ सकता है। उनका कहना है कि पुरानी व्यवस्था में खरीदार, विक्रेता, पहचानकर्ता और गवाहों के हस्ताक्षर तथा अंगूठे के निशान स्टांप पेपर पर दर्ज होते थे, जो भविष्य में किसी विवाद की स्थिति में महत्वपूर्ण भौतिक साक्ष्य के तौर पर काम करते थे। पेपरलेस व्यवस्था में ऐसे दस्तावेजी साक्ष्यों के खत्म होने से भविष्य में कानूनी विवाद और जमीन से जुड़े मुकदमों की संख्या बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
तकनीकी खामियों से बढ़ी परेशानी, सरकार के दावों पर उठे सवाल
सरकार और जिला प्रशासन का दावा है कि नई ऑनलाइन व्यवस्था से बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी और आम लोगों के लिए जमीन रजिस्ट्री की प्रक्रिया आसान और पारदर्शी बनेगी। हालांकि, कातिबों का कहना है कि जमीनी स्तर पर नई व्यवस्था कई तकनीकी परेशानियों से जूझ रही है। उनके मुताबिक विभाग का सॉफ्टवेयर और सर्वर धीमी गति से काम कर रहे हैं और कई बार एक ओटीपी आने में दो-दो दिन तक का समय लग रहा है। डिजिटल दस्तावेजों को मोबाइल पर डाउनलोड करने के बाद उनकी प्रिंटिंग की गुणवत्ता भी खराब होने की शिकायत की जा रही है, जिससे दस्तावेजों को पढ़ना मुश्किल हो जाता है। ग्रामीण इलाकों में डिजिटल साक्षरता की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। कातिबों का कहना है कि आम लोगों के लिए कंप्यूटर या मोबाइल के जरिए जटिल कानूनी प्रक्रिया को खुद पूरा करना आसान नहीं है। पहले हिंदी में अपेक्षाकृत सरल और संक्षिप्त दस्तावेज तैयार किए जाते थे, जबकि नई व्यवस्था में कई पन्नों के डिजिटल प्रारूप और तकनीकी शब्दावली के कारण लोगों में भ्रम और असहजता बढ़ रही है।
हड़ताल से आम जनता परेशान, सरकार को राजस्व का भी नुकसान
कातिबों की अनिश्चितकालीन हड़ताल का सीधा असर उन लोगों पर पड़ रहा है, जिन्हें अपनी जमीन की खरीद-बिक्री या रजिस्ट्री तत्काल करानी है। चिकित्सा खर्च, शादी या बच्चों की पढ़ाई जैसी जरूरी जरूरतों के लिए जमीन बेचने या खरीदने वाले लोग भी निबंधन कार्यालय पहुंचकर बिना काम कराए वापस लौटने को मजबूर हैं। दूर-दराज के इलाकों से जिला मुख्यालय तक आने वाले लोगों को अतिरिक्त समय और पैसे खर्च करने के बाद भी रजिस्ट्री नहीं हो पा रही है। वहीं, रजिस्ट्री का काम ठप होने से बिहार सरकार को भी रोजाना करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान होने का दावा किया जा रहा है। छोटे और मध्यम स्तर के निबंधन कार्यालयों में भी प्रतिदिन लाखों रुपये के निबंधन शुल्क का नुकसान हो रहा है। दस्तावेज नवीस संघ ने स्पष्ट किया है कि जब तक सरकार नई डिजिटल प्रक्रिया पर दोबारा विचार नहीं करती और कातिबों के रोजगार की सुरक्षा को लेकर ठोस लिखित आश्वासन नहीं देती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
