erer | Source: ere बिहार। सफलता की राह हमेशा आसान नहीं होती। कई बार परिस्थितियां इंसान के हौसले की ऐसी परीक्षा लेती हैं, जहां आगे बढ़ना बेहद मुश्किल नजर आता है। बिहार के नसीन कुमार निशांत की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। साधारण परिवार से निकलकर उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बीच अपनी पढ़ाई जारी रखी और प्रशासनिक सेवा में जाने का सपना पूरा किया। महज 20 साल की उम्र में मां को खोने के बाद उनके जीवन में दुख का पहाड़ टूट पड़ा। घर में मातम था, परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ गई थीं और दूसरी ओर समाज के लोगों के ताने भी सुनने पड़ रहे थे। इसके बावजूद निशांत ने खुद को टूटने नहीं दिया।

आज वही नसीन कुमार निशांत 22 साल की उम्र में बिहार के युवा एसडीएम के तौर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। उन्होंने पहले ही प्रयास में BPSC परीक्षा में सफलता हासिल की। उनकी कहानी उन युवाओं के लिए मिसाल है, जो मुश्किल परिस्थितियों, पारिवारिक जिम्मेदारियों और लोगों की बातों के बीच अपने लक्ष्य तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।

पढ़ाई में शुरू से रहे आगे, IIT BHU तक पहुंचा सफर

नसीन कुमार निशांत का बचपन एक लोअर मिडिल क्लास परिवार में बीता। आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियां भले ही सामान्य थीं, लेकिन पढ़ाई के प्रति उनका रुझान शुरू से मजबूत रहा। वह बचपन से ही पढ़ाई में अच्छे थे और मेहनत के दम पर उन्होंने IIT BHU में दाखिला हासिल किया।

IIT BHU में पढ़ाई उनके शैक्षणिक सफर की महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। तकनीकी शिक्षा पूरी करने के बाद उनके सामने कॉरपोरेट क्षेत्र में करियर बनाने का रास्ता था। उन्होंने कुछ समय कॉरपोरेट की दुनिया को भी देखा, लेकिन उनके मन में प्रशासनिक सेवा में जाने की इच्छा बनी रही।

20 साल की उम्र में मां को खोना बना जिंदगी का सबसे बड़ा झटका

निशांत के जीवन में सबसे कठिन दौर तब आया, जब महज 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी मां को खो दिया। जिस उम्र में अधिकतर युवा अपने करियर और भविष्य को लेकर आगे बढ़ रहे होते हैं, उस समय निशांत के सामने जिंदगी का सबसे बड़ा व्यक्तिगत दुख आ खड़ा हुआ।

मां के निधन के बाद परिवार में मातम का माहौल था। इस घटना ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। दुख के साथ परिवार की जिम्मेदारियां भी उनके सामने आ गईं। इसके बावजूद उन्होंने अपने सपनों को खत्म नहीं होने दिया और खुद को संभालकर आगे बढ़ने का फैसला किया।

जिम्मेदारियां बढ़ीं, लेकिन प्रशासनिक सेवा का सपना नहीं छोड़ा

मां के जाने के बाद निशांत ने परिवार की जिम्मेदारियों को भी गंभीरता से संभाला। उन्होंने अपनी छोटी बहन की शिक्षा और शादी की जिम्मेदारी उठाई और उसे पूरा किया। एक तरफ परिवार की जिम्मेदारियां थीं, तो दूसरी तरफ उनके सामने अपने करियर का फैसला लेने की चुनौती थी।

इसी दौर में उन्होंने कॉरपोरेट नौकरी छोड़कर प्रशासनिक सेवा की तैयारी करने का निर्णय लिया। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि स्थिर नौकरी छोड़कर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करना अपने आप में जोखिम भरा कदम था। लेकिन निशांत ने अपने लक्ष्य को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध रहने का फैसला किया।

जब लोग देने लगे ताने, तब निशांत ने चुप रहकर मेहनत जारी रखी

BPSC की तैयारी के दौरान निशांत को सामाजिक दबाव और लोगों की बातों का भी सामना करना पड़ा। कई लोग उनकी तैयारी और सफलता की संभावना पर सवाल उठाते थे। तरह-तरह की बातें और ताने सुनने को मिलते थे। ऐसी परिस्थितियां किसी भी अभ्यर्थी के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती हैं।

इसके अलावा BPSC परीक्षा में करीब तीन साल की देरी ने भी उनके धैर्य की परीक्षा ली। लंबे इंतजार और अनिश्चितता के बावजूद निशांत अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटे। उन्होंने लोगों को जवाब बहस या विवाद से नहीं, बल्कि अपनी मेहनत और परिणाम से देने का फैसला किया।

तीन साल की देरी भी नहीं तोड़ पाई हिम्मत

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में समय का बढ़ जाना अभ्यर्थियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। निशांत के सामने भी यह स्थिति आई। BPSC परीक्षा में हुई तीन साल की देरी के बावजूद उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी।

इस दौरान परिवार की जिम्मेदारियां, मां को खोने का दुख और लोगों के ताने उनके सामने थे। लेकिन उन्होंने इन परिस्थितियों को अपनी कमजोरी बनने नहीं दिया। उनका ध्यान अपने लक्ष्य पर बना रहा और उन्होंने लगातार मेहनत जारी रखी।

पहले ही प्रयास में BPSC पास, 22 साल में बने SDM

लगातार संघर्ष और तैयारी के बाद आखिरकार वह दिन आया, जब निशांत की मेहनत रंग लाई। उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में BPSC परीक्षा में सफलता हासिल की। महज 22 वर्ष की उम्र में वह बिहार के युवा SDM बन गए।

यह उपलब्धि इसलिए भी खास रही क्योंकि उनके सफर में कई ऐसी परिस्थितियां आई थीं, जो उन्हें अपने लक्ष्य से भटका सकती थीं। लेकिन उन्होंने मुश्किलों के बीच तैयारी जारी रखी और आखिरकार प्रशासनिक सेवा में अपनी जगह बना ली।

सफलता ने उन लोगों को दिया जवाब, जो क्षमता पर उठाते थे सवाल

निशांत की सफलता केवल एक प्रतियोगी परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है। उनके लिए यह उन तमाम मुश्किलों पर जीत भी थी, जिनका उन्होंने अपने सफर के दौरान सामना किया। जिन लोगों की बातों और तानों से उन्हें परेशान होना पड़ा, उन्हें उन्होंने किसी जवाब या बहस से नहीं, बल्कि अपनी उपलब्धि से जवाब दिया।

22 साल की उम्र में SDM बनना उनके लिए उस मेहनत का परिणाम बना, जो उन्होंने दुख, जिम्मेदारियों और सामाजिक दबाव के बीच जारी रखी थी। उनकी सफलता ने यह भी साबित किया कि परिस्थितियां कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, लक्ष्य के प्रति दृढ़ता बनी रहे तो मंजिल हासिल की जा सकती है।

युवाओं के लिए प्रेरणा बनी निशांत की कहानी

नसीन कुमार निशांत की कहानी उन युवाओं के लिए खास संदेश देती है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान असफलता, देरी, पारिवारिक जिम्मेदारियों या लोगों की आलोचना से परेशान हो जाते हैं। उनकी जिंदगी में ऐसा समय भी आया, जब व्यक्तिगत दुख और जिम्मेदारियां दोनों एक साथ सामने थीं।

इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी और अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। IIT BHU से शिक्षा पूरी करने के बाद कॉरपोरेट करियर छोड़कर प्रशासनिक सेवा की तैयारी करना और फिर पहले प्रयास में BPSC पास करना उनके दृढ़ संकल्प को दिखाता है।