बेंगलुरु। कर्नाटक से सामने आई मां-बेटी के मिलन की एक भावुक कहानी लोगों का ध्यान खींच रही है। दक्षिण कन्नड़ जिले के बेल्थंगडी तालुक के मलावंतिके क्षेत्र के मक्की गांव में 105 साल की सीताम्मा और उनकी 85 साल की सबसे बड़ी बेटी सुशीला की करीब दो दशक बाद मुलाकात हुई। उम्र के इस पड़ाव पर मां और बेटी के इस मिलन को संभव बनाने में सुशीला के नाती-पोतों की अहम भूमिका रही। दोनों लंबे समय से एक-दूसरे से मिलना चाहती थीं, लेकिन उम्र, स्वास्थ्य और सीताम्मा के घर तक पहुंचने के लिए उचित सड़क नहीं होने के कारण यह इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी।
20 साल तक सिर्फ यादों में रही मां-बेटी की मुलाकात
सीताम्मा अपने बच्चों के साथ मक्की में रहती हैं। उनके कुल 11 बच्चे हैं और सुशीला उनकी सबसे बड़ी बेटी हैं। सुशीला अब 85 वर्ष की हो चुकी हैं, जबकि उनकी मां सीताम्मा की उम्र 105 साल है। दोनों परिवारों के बीच काफी दूरी होने और सीताम्मा के घर तक पहुंचने का रास्ता बेहद कठिन होने के कारण मां-बेटी लगभग 20 वर्षों से आमने-सामने नहीं मिल पाई थीं।
समय गुजरता रहा और दोनों के पास एक-दूसरे से जुड़ी पुरानी यादें ही रह गईं। सुशीला लंबे समय से अपनी मां से मिलने की इच्छा रखती थीं, लेकिन उनकी उम्र और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण यह सफर आसान नहीं था। दूसरी ओर, 105 साल की सीताम्मा के लिए भी अपनी बेटी से मिलने के लिए दूर तक यात्रा करना संभव नहीं था।
मां के घर पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं
सीताम्मा के घर तक पहुंचने की सबसे बड़ी मुश्किल वहां तक सड़क का न होना है। मक्की में स्थित उनके घर तक आने-जाने के लिए लोगों को घने जंगल से होकर जीप में सफर करना पड़ता है। इसके बाद करीब डेढ़ किलोमीटर का रास्ता ढलान वाला है, जिसे पैदल तय करना पड़ता है। रास्ते में एक छोटी नदी या नाले को भी पार करना पड़ता है।
ऐसे कठिन रास्ते को देखते हुए 85 वर्षीय सुशीला के लिए अपनी मां तक पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण था। यही वजह रही कि लंबे समय से उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी। उम्र बढ़ने के साथ यह मुलाकात और भी मुश्किल होती जा रही थी।
नाती-पोतों ने उठाया जिम्मा, दादी को लेकर निकले सफर पर
जब परिवार को एहसास हुआ कि उम्र और मुश्किल रास्ते के कारण सुशीला अपनी मां से शायद ही मिल पाएंगी, तो उनके नाती-पोतों ने इस इच्छा को पूरा करने का फैसला किया। उन्होंने अपनी दादी को मक्की स्थित उनकी नानी और परनानी के घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उठाई।
नाती-पोतों के साथ सुशीला जीप से जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर रवाना हुईं। सफर आसान नहीं था, लेकिन परिवार के सदस्यों का लक्ष्य स्पष्ट था कि किसी भी तरह उन्हें उनकी मां तक पहुंचाना है। जीप जहां तक जा सकती थी, वहां तक वह पहुंची, लेकिन घर तक का अंतिम हिस्सा वाहन से तय नहीं हो सका।
जीप के बाद शुरू हुआ पैदल सफर
जीप से आगे रास्ता खत्म होने के बाद सुशीला को पैदल चलना पड़ा। उनकी उम्र और रास्ते की कठिनाई को देखते हुए नाती-पोतों ने उन्हें सावधानी से आगे बढ़ने में मदद की। जंगल के बीच ऊबड़-खाबड़ रास्ते और ढलान वाले हिस्से को पार करते हुए परिवार उन्हें सीताम्मा के घर तक लेकर पहुंचा।
करीब डेढ़ किलोमीटर के इस कठिन हिस्से को पार करना अपने आप में बड़ी चुनौती थी। लेकिन वर्षों से मां से मिलने की इच्छा और परिवार का साथ सुशीला को आगे बढ़ाता रहा। आखिरकार वह उस घर तक पहुंच गईं, जहां उनकी 105 साल की मां उनका इंतजार कर रही थीं।
दो दशक बाद आमने-सामने आईं 105 साल की मां और 85 साल की बेटी
जैसे ही सुशीला अपनी मां सीताम्मा से मिलीं, वर्षों से अधूरी पड़ी इच्छा पूरी हो गई। करीब 20 साल बाद मां और बेटी का आमना-सामना हुआ। इस मुलाकात में उम्र का लंबा फासला, बीते वर्षों की दूरी और मुश्किल रास्ते जैसे सभी अवरोध पीछे छूट गए।
परिवार के लिए यह पल बेहद खास था, क्योंकि उन्होंने लंबे समय से अपनी दादी की इच्छा को पूरा करने का सपना देखा था। नाती-पोतों की कोशिश से वह सपना आखिरकार साकार हो गया।
पोते केशव ने बताया- दादी को मां से मिलाना हमारा सपना था
इस भावुक मुलाकात को लेकर सुशीला के पोते केशव ने अपनी खुशी जाहिर की। उन्होंने बताया कि परिवार की लंबे समय से इच्छा थी कि उनकी दादी को उनकी मां से मिलवाया जाए। लेकिन दोनों की उम्र और परनानी के घर तक सही सड़क नहीं होने के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा था।
केशव के मुताबिक, उनकी दादी को उनकी मां से मिलवाना परिवार का सपना था। उन्होंने कहा कि उम्र और घर तक उचित सड़क नहीं होने के कारण वे लंबे समय तक ऐसा नहीं कर सके। अब जब वे आखिरकार अपनी दादी को उनकी मां तक पहुंचाने में सफल हुए तो परिवार बेहद खुश है।
मुश्किल रास्ते ने बढ़ाई चुनौती, रिश्ते की चाह ने आसान कर दी राह
यह कहानी सिर्फ दो दशक बाद हुई एक मुलाकात की नहीं है, बल्कि परिवार के उस प्रयास की भी है जिसने उम्र और भौगोलिक मुश्किलों को पीछे छोड़ दिया। एक ओर 105 साल की मां थीं, जो अपने घर से बाहर निकलकर बेटी से मिलने की स्थिति में नहीं थीं, तो दूसरी ओर 85 साल की बेटी थीं, जिनके लिए जंगल और कठिन रास्ते से गुजरना आसान नहीं था।
फिर भी नाती-पोतों ने हार नहीं मानी। जीप से जंगल का रास्ता तय करने से लेकर पैदल मार्ग पर अपनी दादी को संभालकर आगे ले जाने तक उन्होंने हर कदम पर उनका साथ दिया। इसी कोशिश की वजह से करीब 20 वर्षों से अधूरी मां-बेटी की मुलाकात आखिरकार संभव हो सकी।
मां-बेटी का यह मिलन क्यों है खास?
सीताम्मा और सुशीला की उम्र क्रमशः 105 और 85 वर्ष है। इस उम्र में दो दशक बाद एक-दूसरे से मिलना अपने आप में बेहद भावुक क्षण है। खास बात यह भी रही कि मुलाकात के रास्ते में परिवार को सड़क की कमी और जंगल के कठिन भूभाग जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
नाती-पोतों ने अपनी दादी की इच्छा को प्राथमिकता दी और उनके लिए यह सफर संभव बनाया। परिवार की इसी कोशिश ने वर्षों से दूर मां और बेटी को फिर एक-दूसरे के सामने ला दिया।
