असगर अली अंसारी



हाथ में मोबाइल, आँखों में दुनिया और सड़क पर Gen-Z | Source: AI Made.हर दौर अपनी एक पीढ़ी पैदा करता है, और हर पीढ़ी अपने समय से सवाल पूछती है। आज का समय Gen-Z का है—वह पीढ़ी जिसने आँखें खोलते ही इंटरनेट देखा, बचपन में स्मार्टफोन पकड़ा, किशोरावस्था में सोशल मीडिया को जीया और युवावस्था में AI को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया। इसलिए यदि यह पीढ़ी अपने समय से सबसे अधिक प्रश्न पूछ रही है, तो यह अस्वाभाविक नहीं, बल्कि इतिहास की स्वाभाविक प्रक्रिया है।

हाथ में मोबाइल, आँखों में दुनिया और सड़क पर Gen-ZSource : AI Made.

इस पीढ़ी ने किताबों से पहले स्क्रीन को देखा। उसके खेल मैदानों में कम और मोबाइल की स्क्रीन पर अधिक खेले गए। उसने दुनिया को पैदल चलकर नहीं, बल्कि इंटरनेट के माध्यम से देखा। ज्ञान, मनोरंजन, संगीत, सिनेमा, भाषा, व्यापार और रोजगार—सब कुछ उसकी हथेली में सिमट आया। लेकिन तकनीक की इस अभूतपूर्व उपलब्धि ने एक गहरी कमी भी छोड़ दी—अनुभव की कमी।

मोबाइल दुनिया दिखा सकता है, लेकिन दुनिया को जीने का एहसास नहीं दे सकता। किसी पहाड़ की तस्वीर उसकी ऊँचाई नहीं बता सकती, किसी समुद्र का वीडियो उसकी लहरों का स्पर्श नहीं दे सकता और किसी व्यंजन का चित्र उसकी खुशबू नहीं पहुँचा सकता। मनुष्य केवल जानकारी से नहीं, बल्कि अनुभव से परिपक्व होता है।

अब यही पीढ़ी युवावस्था में है। उसके सामने केवल भारत नहीं, पूरी दुनिया खुली हुई है। वह अपने शहर की तुलना टोक्यो, सिंगापुर, बर्लिन और न्यूयॉर्क से करता है। वह देखता है कि कहीं शोध पर निवेश हो रहा है, कहीं स्टार्टअप संस्कृति फल-फूल रही है और कहीं युवाओं को उनकी प्रतिभा के अनुरूप अवसर मिल रहे हैं। स्वाभाविक है कि उसकी अपेक्षाएँ भी पहले की पीढ़ियों से अधिक हों।

यह पीढ़ी हर विचार को तर्क की कसौटी पर परखती है। वह इतिहास पढ़ती है तो प्रमाण पूछती है, धर्म सुनती है तो अर्थ जानना चाहती है और राजनीति देखती है तो परिणाम मांगती है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह परंपरा की विरोधी है, बल्कि वह परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद चाहती है। वह आस्था का सम्मान कर सकती है, लेकिन अंधविश्वास को सहज स्वीकार नहीं करती। वह विज्ञान को महत्व देती है, पर संवेदनाओं को भी नकारती नहीं।

सबसे बड़ा प्रश्न रोजगार का है। सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि क्षणिक हो सकती है, लेकिन जीवन स्थायी आय से चलता है। हर युवा इन्फ्लुएंसर नहीं बन सकता, हर वीडियो करोड़ों लोगों तक नहीं पहुँचता और हर स्टार्टअप सफल नहीं होता। अंततः अधिकांश युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और सुरक्षित भविष्य चाहिए।

यहीं से बेचैनी जन्म लेती है। जब सपने वैश्विक हों और अवसर सीमित दिखाई दें, तब असंतोष स्वाभाविक है। यह असंतोष कभी सोशल मीडिया पर दिखाई देता है, कभी विश्वविद्यालयों में, कभी सड़कों पर और कभी चुनावों में। इसे केवल राजनीतिक विरोध मान लेना वास्तविकता को बहुत सीमित करके देखने जैसा होगा।

दरअसल, Gen-Z केवल सरकारों से प्रश्न नहीं पूछ रही। वह पूरे समाज से जवाब चाहती है। वह शिक्षा व्यवस्था से पूछती है कि डिग्री के बाद रोजगार कहाँ है। वह राजनीति से पूछती है कि विकास के आँकड़ों का उसके जीवन से क्या संबंध है। वह धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व से पूछती है कि बदलती दुनिया में संवाद का स्थान कहाँ है। और वह तकनीक से भी पूछ रही है कि क्या मशीनें मनुष्य के सपनों की जगह ले सकती हैं?

इतिहास गवाह है कि जब भी कोई नई तकनीक समाज में गहरे परिवर्तन लाती है, तो उसके साथ एक नई सामाजिक चेतना भी जन्म लेती है। औद्योगिक क्रांति ने नई राजनीति को जन्म दिया था, इंटरनेट ने नई अर्थव्यवस्था को जन्म दिया और संभव है कि AI का युग एक नई सामाजिक और राजनीतिक चेतना को जन्म दे।

इसलिए सड़क पर खड़ी Gen-Z को केवल "विद्रोही" कह देना आसान है, लेकिन पर्याप्त नहीं। वह असल में अपने समय की सबसे बड़ी जिज्ञासा है। वह प्रश्न है, जिसका उत्तर भविष्य को देना होगा।

यदि भारत आने वाले दशकों में विश्व की सबसे युवा शक्ति बनना चाहता है, तो उसे केवल डिजिटल इंडिया नहीं, बल्कि रोजगारयुक्त भारत, वैज्ञानिक सोच वाला भारत, नवाचार को प्रोत्साहित करने वाला भारत और संवाद पर आधारित भारत भी बनाना होगा। क्योंकि जिस पीढ़ी के हाथ में मोबाइल है, उसी के हाथ में कल देश की बागडोर भी होगी।

और शायद यही इस समय की सबसे बड़ी सच्चाई है—Gen-Z किसी व्यवस्था को गिराने नहीं, बल्कि अपने भविष्य को बनाने के लिए जवाब तलाश रही है। जो समाज उसके प्रश्नों को सुनेगा, वही भविष्य का नेतृत्व करेगा।