कोलकाता। सरकारी जमीन से कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान दो मंजिला व्यावसायिक इमारत गिराए जाने के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने माना कि अधिकारियों ने कार्रवाई की निर्धारित सीमा से आगे जाकर याचिकाकर्ताओं की संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाया। इसके बाद कोर्ट ने संबंधित प्राधिकरण को उसी स्थान पर नई इमारत बनाकर याचिकाकर्ताओं को सौंपने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने दिया नई इमारत बनाने का आदेश
जस्टिस पार्थ सारथी सेन ने कबिता मन्ना और एक अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए अधिकारियों को दोबारा इमारत बनाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि नई इमारत तैयार होने और उसका कब्जा याचिकाकर्ताओं को मिलने तक प्रभावित लोगों को बिना किसी शुल्क के वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराया जाए। संभव हो तो यह आवास उसी क्षेत्र में दिया जाए।
कोर्ट ने कहा- कार्रवाई तय सीमा से आगे बढ़ी
अदालत के 8 सितंबर के आदेश के मुताबिक रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों और पर्याप्त साक्ष्यों से यह स्पष्ट हुआ कि अधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं के निर्माण को भी गिराकर अपनी निर्धारित सीमा से आगे कार्रवाई की। कोर्ट ने माना कि संबंधित संपत्ति को बिना वैध अधिकार के नुकसान पहुंचाया गया।
सरकारी जमीन के कथित कब्जे से शुरू हुआ विवाद
मामला पूर्व मेदिनीपुर में सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं के अनुसार उन्होंने स्थानीय ग्राम पंचायत से स्वीकृत नक्शे के आधार पर दो मंजिला व्यावसायिक इमारत का निर्माण कराया था। परिसर में दूसरे याचिकाकर्ता का कारोबार भी संचालित होता था। यह विवाद वर्ष 2024 से हाईकोर्ट के समक्ष चल रहा था।
जांच, पैमाइश और रिपोर्ट के बाद चला बुलडोजर
अगस्त 2024 में हाईकोर्ट की एक समकक्ष पीठ ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि यदि लोक निर्माण विभाग की सड़क पर अवैध अतिक्रमण पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए। इसके बाद संबंधित कार्यकारी अभियंता ने सरकारी जमीन की दोबारा पैमाइश कराने के निर्देश दिए। राजस्व निरीक्षक ने 10 सितंबर 2024 को निरीक्षण रिपोर्ट और नक्शा तैयार किया। बाद में दोबारा मौके की जांच हुई और 17 मार्च 2025 को एक अन्य रिपोर्ट पेश की गई।
याचिकाकर्ताओं ने कहा- उनकी संपत्ति भी तोड़ दी गई
रिपोर्ट में सरकारी प्लॉट नंबर 1 और 12 पर कथित अतिक्रमण का उल्लेख किया गया था। इसके बाद अतिक्रमण हटाने का आदेश जारी हुआ। याचिकाकर्ताओं ने कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी और मार्च 2025 में उन्हें अंतरिम राहत मिली। बाद में मामला डिवीजन बेंच तक पहुंचा। 19 मई 2025 को अदालत के सामने यह बात दर्ज हुई कि सरकारी जमीन पर मौजूद कथित अनधिकृत निर्माण हटाया गया था, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कार्रवाई के दौरान उनकी संपत्ति भी इसकी चपेट में आ गई।
राज्य सरकार ने आरोपों को बताया विवादित
राज्य की ओर से अदालत में कहा गया कि याचिकाकर्ता अतिरिक्त तोड़फोड़ के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत नहीं कर सके। सरकार ने यह भी दलील दी कि मामले के तथ्य विवादित हैं और ऐसे मामलों का फैसला सामान्यतः रिट क्षेत्राधिकार में नहीं किया जाना चाहिए।
रिकॉर्ड पर मिले साक्ष्यों को कोर्ट ने माना पर्याप्त
हाईकोर्ट ने माना कि सामान्य स्थिति में रिट अदालत विवादित तथ्यों की गहराई से जांच नहीं करती, क्योंकि उसके पास ट्रायल कोर्ट की तरह साक्ष्य दर्ज करने और गवाहों से पूछताछ करने की प्रक्रिया नहीं होती। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेज और सामग्री पर्याप्त हों तो वह उनके आधार पर मामले का निर्णय कर सकती है। कोर्ट ने पाया कि प्लॉट नंबर 1 और 12 के कथित अतिक्रमण के साथ याचिकाकर्ताओं के एलआर प्लॉट नंबर 650 पर बना निर्माण भी गिरा दिया गया।
दो साल के भीतर तैयार करनी होगी नई इमारत
अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर माना कि अधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं के भूखंड पर बने निर्माण को गिराकर अपनी कार्रवाई की सीमा पार की। इसके बाद हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित प्राधिकरण को नई इमारत बनाने का आदेश दिया। नई इमारत याचिकाकर्ताओं के 1 मार्च को दाखिल पूरक हलफनामे के साथ संलग्न स्वीकृत नक्शे के अनुसार बनाई जाएगी। फैसले की प्रति संबंधित प्राधिकरण को मिलने की तारीख से दो वर्ष के भीतर निर्माण पूरा करना होगा।
10 लाख रुपये का मुआवजा भी देना होगा
इमारत दोबारा बनाने के आदेश के साथ हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को 10 लाख रुपये मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। अदालत के आदेश के अनुसार यह राशि दो बराबर किस्तों में दी जाएगी। पहली 5 लाख रुपये की किस्त अक्टूबर 2026 के अंतिम दिन तक और दूसरी 5 लाख रुपये की किस्त फरवरी 2027 के अंतिम दिन तक देनी होगी। इसके अलावा नई इमारत तैयार होने तक प्रभावित याचिकाकर्ताओं को मुफ्त वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का आदेश भी दिया गया है।
