नई दिल्ली। उम्र बढ़ने के साथ बुजुर्ग माता-पिता को अपने ही घर में यदि बेटे या बहू के व्यवहार से परेशानी, मानसिक दबाव, विवाद या असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है, तो उनके पास कानूनी संरक्षण के कई रास्ते मौजूद हैं। भारतीय कानून वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान, सुरक्षा और भरण-पोषण के साथ शांतिपूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है। ऐसे मामलों में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यह कानून केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार वरिष्ठ नागरिकों की संपत्ति और सुरक्षित जीवन की रक्षा से जुड़े प्रावधान भी उपलब्ध कराता है। कुछ मामलों में वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति से बेटे या बहू को हटाने के लिए भी कानूनी आदेश प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, यह अधिकार हर मामले में स्वतः लागू नहीं होता और मामले की परिस्थितियों पर संबंधित प्राधिकरण या न्यायाधिकरण को विचार करना होता है।
बुजुर्ग सास-ससुर कब मांग सकते हैं भरण-पोषण?
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 का प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बुजुर्ग व्यक्ति सम्मानजनक और सामान्य जीवन जी सके। यदि कोई वरिष्ठ नागरिक अपनी कमाई या अपनी संपत्ति से अपना जीवन-यापन करने में सक्षम नहीं है, तो वह कानून के तहत भरण-पोषण की मांग कर सकता है।
कानून की धारा 4 के तहत माता-पिता अपने वयस्क बच्चों के खिलाफ भरण-पोषण के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए भरण-पोषण न्यायाधिकरण की व्यवस्था की गई है। यानी यदि बुजुर्ग माता-पिता आर्थिक रूप से परेशान हैं और उनके वयस्क बच्चे उनकी आवश्यक देखभाल या भरण-पोषण नहीं कर रहे हैं, तो वे निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से राहत मांग सकते हैं।
सिर्फ पैसा नहीं, सम्मान और सुरक्षित जीवन भी अधिकार
वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार केवल भरण-पोषण तक सीमित नहीं हैं। यदि बेटे या बहू के व्यवहार के कारण किसी बुजुर्ग का शांतिपूर्ण जीवन प्रभावित हो रहा है या उन्हें अपनी सुरक्षा अथवा संपत्ति को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, तो वे संबंधित प्रशासन और न्यायाधिकरण के सामने अपनी शिकायत रख सकते हैं।
कानून का उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को ऐसा वातावरण उपलब्ध कराना है, जिसमें वे जीवन के इस पड़ाव में सुरक्षा और सम्मान के साथ रह सकें। लगातार विवाद, मानसिक दबाव या संपत्ति को लेकर उत्पन्न परेशानी की स्थिति में उपलब्ध कानूनी उपायों का सहारा लिया जा सकता है।
अपनी दी हुई संपत्ति वापस लेने का भी हो सकता है अधिकार
वरिष्ठ नागरिकों के लिए संपत्ति से जुड़ा प्रावधान भी बेहद महत्वपूर्ण है। कई बार माता-पिता या वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति बेटे या किसी अन्य व्यक्ति को इस उम्मीद या शर्त पर हस्तांतरित कर देते हैं कि वह उनकी बुनियादी जरूरतों और सुविधाओं का ध्यान रखेगा।
यदि संपत्ति हस्तांतरित करने के बाद उस व्यक्ति की ओर से वरिष्ठ नागरिक की बुनियादी जरूरतों और सुविधाओं का ध्यान नहीं रखा जाता है, तो कुछ परिस्थितियों में संपत्ति के हस्तांतरण को रद्द कराने का रास्ता उपलब्ध हो सकता है। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 23 संपत्ति के हस्तांतरण से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रावधान है।
हालांकि, किसी संपत्ति हस्तांतरण को रद्द करने का प्रश्न मामले के तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर तय किया जाता है। इसलिए हर विवाद में संपत्ति स्वतः वापस हो जाएगी, ऐसा नहीं माना जा सकता।
क्या सास-ससुर बहू को घर से निकलवा सकते हैं?
यह सवाल अक्सर पारिवारिक विवादों में सामने आता है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए उपलब्ध कानून कुछ परिस्थितियों में उन्हें अपनी संपत्ति की सुरक्षा के लिए राहत लेने का अधिकार देता है। यदि बेटे या बहू का वहां रहना बुजुर्ग की सुरक्षा, देखभाल या सम्मानजनक जीवन में गंभीर बाधा बन रहा हो, तो संबंधित न्यायाधिकरण के सामने मामला रखा जा सकता है।
अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के संदर्भ में यह बात सामने आई कि यदि किसी व्यक्ति को वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से हटाना उसकी देखभाल, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हो, तो संबंधित न्यायाधिकरण के पास परिस्थितियों के अनुसार ऐसा आदेश देने की शक्ति हो सकती है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी शिकायत के आधार पर हर मामले में बहू को तत्काल घर से बाहर कर दिया जाएगा। न्यायाधिकरण को मामले की परिस्थितियों, संबंधित पक्षों के अधिकारों और उपलब्ध कानूनी प्रावधानों पर विचार करना होता है।
बहू के रहने के अधिकार को भी करना होगा ध्यान में
वरिष्ठ नागरिकों को कानून से मिलने वाली सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन पारिवारिक विवादों में दूसरे पक्ष के कानूनी अधिकारों की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर मामले में वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण कानून तथा महिलाओं के आवास से जुड़े अधिकारों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर विचार किया था।
इसका मतलब है कि केवल यह आरोप लगना कि बहू से सास-ससुर परेशान हैं, अपने आप में हर परिस्थिति में बहू को घर से हटाने का अंतिम आधार नहीं बन जाता। संबंधित मामले में अदालत या सक्षम प्राधिकरण को सभी परिस्थितियों और संबंधित कानूनी अधिकारों को ध्यान में रखना पड़ सकता है।
भरण-पोषण के लिए कहां करें शिकायत?
वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण से जुड़े मामलों के लिए कानून के तहत भरण-पोषण न्यायाधिकरण बनाए गए हैं। बुजुर्ग व्यक्ति अपनी स्थिति के अनुसार निर्धारित प्रक्रिया के तहत वहां आवेदन कर सकता है।
यदि वरिष्ठ नागरिक स्वयं आवेदन करने में सक्षम नहीं हैं, तो उनकी ओर से अधिकृत व्यक्ति भी निर्धारित कानूनी व्यवस्था के तहत आवेदन कर सकता है। न्यायाधिकरण मामले की सुनवाई करके कानून के अनुसार आवश्यक आदेश दे सकता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बुजुर्गों को अपने अधिकारों के लिए केवल पारिवारिक स्तर पर समझौते पर निर्भर न रहना पड़े, बल्कि जरूरत पड़ने पर कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से भी राहत मिल सके।
हिंसा या गंभीर खतरे की स्थिति में क्या करें?
यदि पारिवारिक विवाद केवल कहासुनी तक सीमित न होकर हिंसा, धमकी या गंभीर खतरे की स्थिति तक पहुंच गया है, तो वरिष्ठ नागरिकों को उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों का भी सहारा लेना चाहिए। ऐसी स्थिति में पुलिस और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क किया जा सकता है।
किसी भी कानूनी कार्रवाई में घटना से जुड़े दस्तावेज, शिकायत, संपत्ति के कागजात और अन्य उपलब्ध प्रमाण महत्वपूर्ण हो सकते हैं। मामले की परिस्थितियों के अनुसार उचित कानूनी सलाह लेना भी उपयोगी हो सकता है।
बुजुर्गों के अधिकारों को लेकर सबसे जरूरी बात
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 बुजुर्गों को आर्थिक सहायता और देखभाल के साथ-साथ उनकी सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन से जुड़े अधिकारों के लिए कानूनी आधार देता है। संपत्ति के हस्तांतरण और उससे जुड़ी शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में धारा 23 महत्वपूर्ण हो सकती है।
वहीं, घर से बेटे या बहू को हटाने जैसे मामलों में फैसला परिस्थितियों और लागू कानून के आधार पर होता है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार मजबूत होने के बावजूद प्रत्येक पारिवारिक विवाद का समाधान एक ही तरीके से नहीं किया जा सकता।
