लखनऊ के अलीगंज इलाके में सोमवार की दोपहर उस समय मातम में बदल गई, जब एक तीन मंजिला व्यावसायिक इमारत में स्थित कोचिंग सेंटर में अचानक भीषण आग लग गई। कुछ मिनट पहले तक जहां छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे थे, वहीं कुछ ही देर बाद पूरा परिसर चीखों, धुएं और अफरातफरी से भर गया। आग की लपटें इतनी तेजी से फैलीं कि छात्रों को बाहर निकलने का मौका तक नहीं मिला। किसी ने खिड़की से छलांग लगाकर मौत को मात देने की कोशिश की, तो कोई बाथरूम में बंद होकर मदद का इंतजार करता रहा। कई छात्रों ने अपने परिवारों को फोन कर आखिरी बार बताया कि वे धुएं के बीच फंसे हुए हैं। इस हादसे में अब तक 13 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि कई घायल अस्पतालों में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं !Photo:- PTI

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कुछ ही मिनटों में क्लासरूम बन गया मौत का फंदा

यह दर्दनाक हादसा अलीगंज के उषा मेहता मार्ग स्थित एक तीन मंजिला कॉम्प्लेक्स में हुआ। इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर पेट शॉप संचालित थी, जबकि पहली और दूसरी मंजिल पर कोचिंग सेंटर, कंप्यूटर लाइब्रेरी और गेमिंग जोन चल रहे थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आग इमारत के निचले हिस्से से शुरू हुई और देखते ही देखते ऊपर की मंजिलों तक पहुंच गई। हालांकि आग लगने का वास्तविक कारण अभी स्पष्ट नहीं हो सका है और इसकी जांच जारी है। सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि आग और धुएं ने सीढ़ियों को अपनी चपेट में ले लिया। छात्रों के लिए नीचे उतरने का रास्ता पूरी तरह बंद हो गया। कुछ ही मिनटों में कमरों में जहरीला धुआं भरने लगा। छात्रों को न तो बाहर निकलने का रास्ता दिख रहा था और न ही किसी तरह की आपातकालीन व्यवस्था नजर आ रही थी। हालात ऐसे हो गए कि कई छात्र खिड़कियों की ओर भागे, जबकि कुछ बाथरूम में जाकर खुद को बंद कर लिया। आग से ज्यादा खतरा उस जहरीले धुएं से था, जिसने धीरे-धीरे पूरी इमारत को अपनी गिरफ्त में ले लिया।

‘भैया, मैं बाथरूम में हूं... बचा लो’-आखिरी कॉल ने तोड़ दिए परिवार

हादसे के बाद सामने आई परिजनों की कहानियां किसी भी इंसान को अंदर तक झकझोर सकती हैं। एक छात्र के बड़े भाई शकील अहमद ने बताया कि उन्हें अपने भाई का आखिरी मैसेज मिला था। उसने लिखा था कि वह धुएं से बचने के लिए वॉशरूम की तरफ भाग रहा है। इसके बाद उसका फोन बंद हो गया। घटनास्थल पर पहुंचे परिजन बदहवास होकर अपने बच्चों को ढूंढते रहे। कोई अस्पताल की ओर भागा, कोई पुलिस और प्रशासन से जानकारी मांगता रहा। कई परिवारों के लिए सबसे मुश्किल समय वह था, जब उन्हें अपने बच्चों की पहचान के लिए अस्पतालों और ट्रॉमा सेंटरों में बुलाया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, कई छात्र खिड़कियों से लटककर मदद की गुहार लगा रहे थे। कुछ छात्रों ने ऊंचाई से छलांग लगा दी, जिससे वे घायल हो गए लेकिन उनकी जान बच गई। वहीं कई छात्र धुएं के कारण बेहोश हो गए। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर कुछ मिनट और देरी होती, तो मृतकों की संख्या और भी ज्यादा हो सकती थी।

स्थानीय लोगों ने दिखाई बहादुरी, दमकलकर्मियों ने दी जिंदगी की उम्मीद

हादसे के बाद सबसे पहले स्थानीय लोग मदद के लिए आगे आए। आसपास के दुकानदारों और निवासियों ने छात्रों को बचाने की कोशिश शुरू कर दी। कई लोगों ने छज्जों और बिजली के तारों के सहारे छात्रों को नीचे उतारा। कुछ लोगों ने नीचे खड़े होकर कूदते छात्रों को संभालने की कोशिश की। आग की सूचना मिलते ही दमकल विभाग की 14 गाड़ियां मौके पर पहुंचीं। लेकिन घने धुएं और आग की वजह से रेस्क्यू ऑपरेशन बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया। फायर ब्रिगेड की टीमों ने पड़ोसी इमारत की दीवार तोड़कर अंदर प्रवेश किया। हाइड्रोलिक सीढ़ियों, ऑक्सीजन सिलेंडरों और विशेष सुरक्षा उपकरणों की मदद से छात्रों को बाहर निकाला गया। दमकल विभाग के अधिकारियों के अनुसार 20 से अधिक छात्रों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। कई घायलों को तत्काल किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) ट्रॉमा सेंटर भेजा गया। रेस्क्यू ऑपरेशन कई घंटों तक चला और देर शाम तक फायर ब्रिगेड की टीमें अंदर फंसे लोगों की तलाश करती रहीं।

13 मौतें, कई घायल और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल

इस अग्निकांड में अब तक 13 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। मृतकों में अधिकांश छात्र बताए जा रहे हैं। कई छात्र गंभीर रूप से झुलस गए हैं या धुएं के कारण उनकी हालत नाजुक बनी हुई है। डॉक्टरों का कहना है कि कई मरीजों के फेफड़ों में जहरीला धुआं चला गया, जिसके कारण उनकी स्थिति गंभीर है। इस हादसे ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या इमारत में पर्याप्त फायर सेफ्टी उपकरण मौजूद थे? क्या वहां आपातकालीन निकास (Emergency Exit) की व्यवस्था थी? क्या नियमित रूप से फायर ऑडिट कराया जाता था? क्या इतनी बड़ी संख्या में छात्रों के लिए भवन सुरक्षा मानकों का पालन किया जा रहा था? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अब जांच एजेंसियों को तलाशना है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इमारत में सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई थी। उनका कहना है कि यदि समय रहते फायर सेफ्टी इंतजाम बेहतर किए गए होते, तो इतनी बड़ी जनहानि नहीं होती। कई लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि व्यावसायिक भवनों में संचालित कोचिंग सेंटरों की नियमित जांच क्यों नहीं होती।

सरकार का एक्शन, जांच के आदेश और जवाबदेही की मांग

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हादसे पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने अधिकारियों को घायलों के बेहतर इलाज और मृतकों के परिजनों को हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने अस्पताल पहुंचकर घायलों का हालचाल जाना और चिकित्सा व्यवस्था की समीक्षा की। प्रशासन ने कहा है कि हादसे के कारणों की विस्तृत जांच की जाएगी और यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। फिलहाल जांच एजेंसियां आग लगने के कारण, भवन की सुरक्षा व्यवस्था और संचालन से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर रही हैं। लेकिन इन सरकारी आश्वासनों के बीच सबसे बड़ा सच यह है कि कई परिवारों के घर हमेशा के लिए उजड़ गए। जिन बच्चों ने सुबह घर से निकलते समय अपने माता-पिता से कहा था कि वे पढ़ाई करने जा रहे हैं, उनमें से कई अब कभी वापस नहीं लौटेंगे। लखनऊ का यह अग्निकांड सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि उन खामियों का आईना है जिन्हें नजरअंदाज करने की कीमत मासूम जिंदगियों ने चुकाई है।