झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव के बाद जो हलचल शुरू हुई थी, वह अब एक नए राजनीतिक प्रयोग की चर्चा तक पहुंच गई है। सवाल सिर्फ कांग्रेस उम्मीदवार की हार या क्रॉस वोटिंग का नहीं है, बल्कि उस वैकल्पिक सत्ता समीकरण का है जिसने राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी है। जेडीयू विधायक सरयू राय ने ऐसा फॉर्मूला सामने रखा है जिसमें न बीजेपी की जरूरत है और न कांग्रेस की। यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने महागठबंधन के भीतर भरोसे और समन्वय पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यही वजह है कि झारखंड की राजनीति में अब चर्चा केवल सत्ता बचाने की नहीं, बल्कि सत्ता के नए रास्ते तलाशने की भी हो रही है।
सरयू राय का नया सियासी फॉर्मूला | फोटो: दैनिक जागरण
सरयू राय का नया राजनीतिक गणित क्या है?
राज्यसभा चुनाव के बाद सरयू राय ने दावा किया कि झारखंड में क्षेत्रीय दल चाहें तो राष्ट्रीय पार्टियों के बिना भी सरकार चला सकते हैं। उनके अनुसार झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के 34 विधायक, राजद के 4 विधायक, वाम दलों के 2 विधायक और खुद उनका समर्थन मिलाकर कुल 41 विधायक हो जाते हैं। यानी बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब पहुंचने वाला ऐसा गठजोड़, जिसमें कांग्रेस और बीजेपी दोनों बाहर हों। सरयू राय का यह सुझाव केवल संख्या का खेल नहीं था, बल्कि क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय दलों की राजनीति से अलग होकर अपनी स्वतंत्र पहचान मजबूत करने का संदेश भी माना गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान भाजपा की क्षेत्रीय दलों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति के जवाब के रूप में भी देखा जा सकता है।
राज्यसभा चुनाव ने क्यों बढ़ा दी सियासी अटकलें?
झारखंड राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार की हार ने महागठबंधन के भीतर अविश्वास की दरार को उजागर कर दिया। कांग्रेस और राजद दोनों एक-दूसरे पर हार का ठीकरा फोड़ते नजर आए। कांग्रेस का आरोप है कि सहयोगी दलों का पूरा समर्थन नहीं मिला, जबकि राजद का कहना है कि बिहार की राजनीति में कांग्रेस के रवैये का असर झारखंड तक पहुंचा। इसी बीच एनडीए समर्थित उम्मीदवार परिमल नाथवानी की जीत और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से उनकी मुलाकात ने भी कई राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए। इन घटनाओं ने यह संकेत दिया कि झारखंड की राजनीति में आने वाले समय में नए समीकरण बनने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।
क्या ‘माइनस कांग्रेस-माइनस बीजेपी’ सरकार टिकाऊ होगी?
यही वह सवाल है जिस पर सबसे ज्यादा बहस हो रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि केवल क्षेत्रीय दलों के आधार पर कोई सरकार बन भी जाए, तो उसकी स्थिरता सबसे बड़ी चुनौती होगी। बहुमत के लिए बेहद सीमित संख्या होने के कारण हर विधायक का महत्व बढ़ जाएगा और किसी एक सदस्य की नाराजगी भी सरकार के लिए संकट खड़ा कर सकती है। ऐसे हालात में सरकार पर लगातार दबाव बना रहेगा और राजनीतिक अस्थिरता का खतरा भी बढ़ेगा। झारखंड जैसे राज्य में, जहां गठबंधन राजनीति पहले से ही जटिल रही है, ऐसा प्रयोग लंबे समय तक चल पाएगा या नहीं, इसे लेकर गंभीर संदेह व्यक्त किए जा रहे हैं।
हेमंत सोरेन क्यों नहीं उठाएंगे बड़ा राजनीतिक जोखिम?
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन फिलहाल किसी नए और अनिश्चित प्रयोग के बजाय मौजूदा गठबंधन को बनाए रखने को प्राथमिकता देंगे। एक ओर केंद्रीय एजेंसियों की जांच और राजनीतिक दबाव है, तो दूसरी ओर सरकार की स्थिरता भी उनके लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में कांग्रेस को बाहर कर अल्पमत या सीमित बहुमत वाली सरकार बनाना उनके लिए बड़ा जोखिम साबित हो सकता है। यही वजह है कि सरयू राय का फॉर्मूला भले ही राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गया हो, लेकिन जमीन पर इसके अमल की संभावना फिलहाल बेहद कम दिखाई देती है। फिर भी इस बहस ने एक बात साफ कर दी है, झारखंड में क्षेत्रीय राजनीति अब राष्ट्रीय दलों की छाया से बाहर निकलकर अपनी नई भूमिका तलाशने की कोशिश कर रही है।
