नई दिल्ली। अयोध्या में बने भव्य श्रीराम मंदिर को लेकर एक बार फिर कानूनी हलचल तेज हो गई है। मंदिर का निर्माण सुप्रीम कोर्ट के 2019 के ऐतिहासिक फैसले के बाद शुरू हुआ था और 22 जनवरी 2024 को रामलला के बाल स्वरूप की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। अब एक नई याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल उठाया गया है कि वर्तमान में निर्मित राम मंदिर उसी जमीन और उसी स्थान पर स्थित है या नहीं, जिसे शीर्ष अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में निर्धारित किया था। याचिका में स्वतंत्र सर्वे कराने और जमीन की वास्तविक सीमाओं की पहचान करने की मांग की गई है। इस मामले में 2 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। इस घटनाक्रम के बाद अयोध्या के राम मंदिर से जुड़ा भूमि मामला एक बार फिर न्यायिक चर्चा के केंद्र में आ गया है।
सुप्रीम कोर्ट में किसने दाखिल की नई याचिका?
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध वाद सूची (कॉज लिस्ट) के अनुसार, 'श्री राम जन्मभूमि केस ट्रस्ट' की ओर से यह याचिका दाखिल की गई है। याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि 2019 के फैसले में जिस जमीन को लेकर निर्णय दिया गया था, उसका स्वतंत्र सर्वेक्षण और सीमांकन कराया जाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि संबंधित जमीन की सटीक सीमाओं, निर्देशांकों, क्षेत्रफल और वास्तविक स्थान की पहचान स्पष्ट की जानी चाहिए। इसके माध्यम से यह पता लगाने की मांग की गई है कि वर्तमान में निर्मित और विकसित मंदिर उसी भूमि पर स्थित है या नहीं, जिसके संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया था।
2 नवंबर को तीन न्यायाधीशों की पीठ करेगी सुनवाई
इस याचिका पर सोमवार, 2 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई निर्धारित है। अदालत की वाद सूची के अनुसार, मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ करेगी। इस पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल होंगे। सुनवाई के दौरान याचिका में उठाई गई मांगों पर अदालत के समक्ष विचार किया जाएगा। हालांकि, याचिका दाखिल होने और सुनवाई निर्धारित होने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने सर्वेक्षण कराने का आदेश दे दिया है। इस संबंध में अंतिम निर्णय सुनवाई के बाद अदालत ही करेगी।
स्वतंत्र आयोग बनाकर सर्वे कराने की मांग
याचिका का एक महत्वपूर्ण पहलू स्वतंत्र समिति या आयोग के गठन से जुड़ा है। इसमें मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी निगरानी में एक स्वतंत्र आयोग गठित करे। इस आयोग में सर्वेक्षण, राजस्व, पुरातत्व और अन्य तकनीकी क्षेत्रों के योग्य विशेषज्ञों को शामिल किया जाए। याचिकाकर्ता चाहता है कि इन विशेषज्ञों की सहायता से संबंधित भूमि की वास्तविक स्थिति का परीक्षण किया जाए। आयोग को यह पता लगाने का काम सौंपने की मांग की गई है कि वर्तमान में विकसित मंदिर का स्थान और उसका भूमि क्षेत्र वही है या नहीं, जिसे 2019 के फैसले में निर्धारित किया गया था। इसके साथ ही भूमि की सीमाओं और स्थान की पहचान से संबंधित तकनीकी पहलुओं की भी जांच कराने का अनुरोध किया गया है।
क्या जांचा जाएगा, याचिका में किन बिंदुओं पर जोर?
याचिका में मुख्य रूप से उस जमीन की पहचान और सीमांकन पर ध्यान देने की मांग की गई है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट का 2019 का फैसला लागू हुआ था। इसमें जमीन के सटीक निर्देशांक, विस्तार, क्षेत्रफल और सीमाओं का स्वतंत्र रूप से पता लगाने की बात कही गई है। याचिकाकर्ता चाहता है कि तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से यह स्पष्ट किया जाए कि वर्तमान मंदिर का निर्माण उसी निर्धारित भूमि पर हुआ है या नहीं। इसके लिए सर्वेक्षण और राजस्व संबंधी अभिलेखों के साथ पुरातात्विक तथा अन्य तकनीकी विशेषज्ञता का उपयोग करने का सुझाव दिया गया है। फिलहाल ये सभी याचिका में की गई मांगें हैं। इन पर अदालत का रुख सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगा।
9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था ऐतिहासिक फैसला
अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से विवादित जमीन पर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया था। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट का गठन करे। इसके साथ ही सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में किसी प्रमुख स्थान पर मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया था। इस फैसले के बाद लंबे समय से चले आ रहे अयोध्या भूमि विवाद के कानूनी समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया था।
5 अगस्त 2020 को शुरू हुआ था राम मंदिर का निर्माण
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी। 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में भूमि पूजन किया गया था। इसके साथ ही मंदिर निर्माण कार्य की औपचारिक शुरुआत हुई। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की देखरेख में मंदिर निर्माण का कार्य आगे बढ़ाया गया। मंदिर के गर्भगृह और पहले तल का निर्माण पूरा होने के बाद रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियां की गईं। इस दौरान मंदिर निर्माण से जुड़ी व्यवस्थाओं और धार्मिक अनुष्ठानों पर विशेष ध्यान दिया गया।
22 जनवरी 2024 को हुई थी रामलला की प्राण प्रतिष्ठा
अयोध्या के राम मंदिर में 22 जनवरी 2024 को श्रीराम के बाल स्वरूप यानी रामलला के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। इस ऐतिहासिक धार्मिक समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य यजमान के रूप में शामिल हुए थे। समारोह में देशभर के संत-महात्माओं और कई प्रतिष्ठित हस्तियों को आमंत्रित किया गया था। इनमें उद्योगपति, फिल्म जगत की हस्तियां, खिलाड़ी और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े राजनेता भी शामिल थे। प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद राम मंदिर को आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिया गया। इसके बाद से देशभर से श्रद्धालु अयोध्या पहुंचकर रामलला के दर्शन कर रहे हैं।
नई याचिका से फिर चर्चा में आया अयोध्या का भूमि मामला
राम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या का यह मामला एक नए कानूनी पहलू के साथ सामने आया है। नई याचिका में मंदिर के निर्माण पर कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं दिया गया है, बल्कि 2019 के फैसले में निर्धारित भूमि की पहचान और सीमांकन को लेकर स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। अब 2 नवंबर को होने वाली सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मांग पर क्या रुख अपनाता है और स्वतंत्र सर्वेक्षण या आयोग के गठन को लेकर क्या निर्देश देता है।
