ere | Source: rerपटना: बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर आए ताजा नतीजों ने राज्य के सियासी गलियारों में भारी तहलका मचा दिया है। हर तरफ बस एक ही सवाल तैर रहा है कि क्या बिहार की राजनीति का ऊंट अब किसी नए करवट बैठने वाला है? 8 में से 5 सीटों पर भूमिहार उम्मीदवारों का परचम लहराना और दूसरी तरफ कांग्रेस जैसी देश की सबसे पुरानी पार्टी का खाता तक न खुल पाना, सिर्फ एक हार-जीत नहीं बल्कि एक बहुत बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है। आइए समझते हैं कि इन चौंकाने वाले नतीजों के पीछे का असली गणित क्या है।

8 सीटों का पूरा रिपोर्ट कार्ड: किसके सिर सजा ताज और कौन पस्त हुआ?

विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की इन 8 सीटों पर चुनाव नतीजे बेहद दिलचस्प रहे। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का दबदबा साफ नजर आया, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सबसे ज्यादा 3 सीटों पर कब्जा जमाया, वहीं जनता दल यूनाइटेड (जदयू) को 1 सीट मिली।

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और नई नवेली पार्टी 'जन सुराज' के खाते में 1-1 सीट आई। सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात यह रही कि 2 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने बाजी मारकर सभी स्थापित राजनीतिक दलों के होश उड़ा दिए। वहीं, कांग्रेस का सूपड़ा पूरी तरह साफ हो गया।

जानिए किस सीट से किसने दर्ज की जीत: पूरी सूची

  • पटना शिक्षक: डॉ. संजीव कुमार सिंह (राजद)
  • पटना स्नातक: नीरज कुमार (जदयू)
  • दरभंगा शिक्षक: सुरेश प्रसाद राय (जन सुराज)
  • दरभंगा स्नातक: सर्वेश कुमार (भाजपा)
  • तिरहुत शिक्षक: नरेंद्र प्रसाद सिंह (भाजपा)
  • सारण शिक्षक: राहुल राज (निर्दलीय - राजपूत)
  • कोसी स्नातक: डॉ. एनके यादव (भाजपा - यादव)
  • तिरहुत स्नातक: वंशीधर बृजवासी (निर्दलीय - सहनी)

भूमिहार चेहरे छाए: क्या सवर्णों का सियासी दबदबा फिर से लौट आया है?

इन 8 सीटों में से 5 सीटों पर भूमिहार उम्मीदवारों की एकतरफा जीत ने जातिगत समीकरणों के विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। डॉ. संजीव कुमार सिंह, नीरज कुमार, सुरेश प्रसाद राय, सर्वेश कुमार और नरेंद्र प्रसाद सिंह की जीत से यह चर्चा गर्म हो गई है कि क्या बिहार में सवर्ण राजनीति का पुराना दौर वापस आ रहा है?

हालांकि, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसे पूरे बिहार का एकतरफा मूड मान लेना जल्दबाजी होगी। एमएलसी चुनाव का वोटर आम विधानसभा चुनाव से बिल्कुल अलग होता है। यहाँ प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि, शिक्षकों व स्नातकों से उनका सीधा संपर्क और स्थानीय मुद्दे पार्टी सिंबल से ज्यादा असर दिखाते हैं।

मदन मोहन झा की हार से कांग्रेस में सन्नाटा: क्या बिहार में खत्म हो रहा जनाधार?

कांग्रेस के लिए यह चुनाव किसी बड़े झटके से कम नहीं रहा। सबसे चौंकाने वाला नतीजा दरभंगा शिक्षक सीट से आया, जहाँ पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. मदन मोहन झा को करारी हार झेलनी पड़ी।

वर्ष 2018 से 2022 तक प्रदेश संगठन की कमान संभाल चुके इतने बड़े दिग्गज नेता की हार ने कांग्रेस की अंदरूनी तैयारी और जमीनी पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह नतीजा साफ इशारा करता है कि पुराने रसूख के भरोसे अब चुनाव नहीं जीते जा सकते।

निर्दलीयों का जलवा और दलों के लिए बड़ा सबक

इस चुनाव ने सभी मुख्य राजनीतिक दलों को एक कड़ा संदेश दिया है। सारण शिक्षक सीट से राहुल राज और तिरहुत स्नातक सीट से वंशीधर बृजवासी की जीत ने साबित कर दिया कि मतदाता केवल पार्टी का झंडा देखकर वोट नहीं दे रहे।

जन सुराज की दरभंगा शिक्षक सीट पर जीत भी यह दिखाती है कि जनता नए विकल्पों पर दांव लगाने से भी परहेज नहीं कर रही है। जमीनी जुड़ाव और व्यक्तिगत पहचान ही अब जीत की सबसे बड़ी चाबी बनती जा रही है।