तेल के टैंकरों की आवाजाही, वैश्विक व्यापार की धड़कन और दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा की सबसे अहम नस माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर एक बार फिर तनाव चरम पर पहुंच गया है। कुछ दिन पहले तक अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते के बाद हालात सामान्य होने की उम्मीद जगी थी, लेकिन अब ईरान द्वारा होर्मुज को फिर बंद करने की घोषणा ने दुनिया भर के बाजारों, सरकारों और रणनीतिक विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। सवाल सिर्फ एक समुद्री रास्ते का नहीं, बल्कि उस भू-राजनीतिक टकराव का है जो मध्य पूर्व को फिर बड़े संकट की ओर धकेल सकता है।होर्मुज संकट के बीच बढ़ा मध्य पूर्व का तनाव | फोटो: NDTV

होर्मुज संकट के बीच बढ़ा मध्य पूर्व का तनाव | फोटो: NDTV

दुनिया की ऊर्जा लाइफलाइन क्यों है होर्मुज जलडमरूमध्य?

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और इसे दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग माना जाता है। वैश्विक स्तर पर समुद्री रास्ते से होने वाले तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई और ईरान जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों का निर्यात इसी रास्ते पर निर्भर है। यही वजह है कि जब भी ईरान होर्मुज को बंद करने की चेतावनी देता है या उस पर नियंत्रण की बात करता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की कीमतें उछलने लगती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहा, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, शिपिंग लागत और महंगाई पर व्यापक असर पड़ सकता है।ईरान के विदेश मंत्रालय और सैन्य नेतृत्व के बयान

ईरान के विदेश मंत्रालय और सैन्य नेतृत्व के बयान

लेबनान, हिज्बुल्लाह और इजरायल: कैसे बदला पूरा समीकरण?

ईरान के ताजा फैसले के पीछे सिर्फ अमेरिका से मतभेद नहीं, बल्कि लेबनान में बढ़ता संघर्ष भी बड़ी वजह माना जा रहा है। दक्षिणी लेबनान में हुए इजरायली हमलों और नागरिकों की मौत के बाद ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। तेहरान लंबे समय से हिज्बुल्लाह का प्रमुख समर्थक रहा है और लेबनान में किसी भी सैन्य कार्रवाई को अपने रणनीतिक हितों से जोड़कर देखता है। हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बैक-चैनल बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिश हुई थी। खबरें थीं कि वाशिंगटन ने इजरायल पर दबाव बनाने और क्षेत्रीय संघर्ष को सीमित रखने का भरोसा दिया था। लेकिन ताजा हमलों के बाद ईरान का आरोप है कि अमेरिका अपने वादों को निभाने में विफल रहा है। यही कारण है कि उसने समझौते की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हुए होर्मुज को फिर बंद करने का कदम उठाया।

क्या अमेरिका-ईरान समझौता टूटने की कगार पर है?

ईरान के विदेश मंत्रालय और सैन्य नेतृत्व के बयानों से साफ संकेत मिलते हैं कि तेहरान अब समझौते के हर बिंदु की समीक्षा कर रहा है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि यदि दूसरी तरफ से प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं हुआ तो पूरे समझौते का आधार ही कमजोर पड़ जाएगा। हालांकि, दूसरी ओर बातचीत पूरी तरह खत्म होती नहीं दिख रही। स्विट्जरलैंड में तकनीकी स्तर की वार्ता और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की संभावित भागीदारी यह संकेत देती है कि दोनों पक्ष अब भी संवाद का रास्ता खुला रखना चाहते हैं। पाकिस्तान और कतर जैसे मध्यस्थ देशों की सक्रियता भी बताती है कि क्षेत्रीय शक्तियां हालात को नियंत्रण से बाहर नहीं जाने देना चाहतीं।

दुनिया पर क्या होगा असर और आगे क्या?

यदि होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। तेल और गैस की कीमतों में उछाल, समुद्री बीमा लागत में वृद्धि और ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों की चिंता बढ़ना लगभग तय माना जा रहा है। भारत, चीन, जापान और यूरोप जैसे बड़े आयातक देशों की नजर भी इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी हुई है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह कदम केवल दबाव बनाने की रणनीति है या अमेरिका और ईरान के बीच बना नाजुक समझौता वास्तव में टूटने की कगार पर पहुंच चुका है। आने वाले दिनों में स्विट्जरलैंड में होने वाली बातचीत और लेबनान-इजरायल मोर्चे की स्थिति तय करेगी कि दुनिया राहत की सांस लेगी या फिर एक नए भू-राजनीतिक संकट का सामना करेगी।