पासपोर्ट को लेकर लंबे समय से लोगों के बीच एक आम धारणा रही है कि यह भारतीय नागरिकता का सबसे बड़ा प्रमाण है। लेकिन अब विदेश मंत्रालय के ताजा बयान ने इस धारणा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। मंत्रालय ने साफ किया है कि पासपोर्ट मुख्य रूप से एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट यानी यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का अंतिम और पूर्ण प्रमाण। ऐसे में करोड़ों लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि अगर पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है, तो आखिर भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए किन दस्तावेजों और कानूनी प्रावधानों की जरूरत पड़ती है?
पासपोर्ट और नागरिकता पर बड़ा खुलासा | फोटो: कलम लोक
पासपोर्ट पर विदेश मंत्रालय की बड़ी स्पष्टता
विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने हालिया जानकारी साझा करते हुए कहा कि पासपोर्ट का मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति की अंतरराष्ट्रीय यात्रा को आसान बनाना है। इसे नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता। मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2025 के दौरान लगभग 1.5 करोड़ पासपोर्ट और संबंधित सेवाएं प्रदान की गईं, जिनमें अकेले 1.39 करोड़ नए या नवीनीकृत पासपोर्ट शामिल हैं। अधिकारी ने बताया कि पुलिस सत्यापन को छोड़कर सामान्य परिस्थितियों में पासपोर्ट जारी करने में छह कार्य दिवस लगते हैं। वहीं पासपोर्ट सेवा केंद्र (PSK) और डाकघर पासपोर्ट सेवा केंद्र (POPSK) में आवेदकों को औसतन 45 मिनट से भी कम समय देना पड़ता है।
पासपोर्ट सेवाओं में आया बड़ा बदलाव
पिछले एक दशक में पासपोर्ट सेवाओं का दायरा तेजी से बढ़ा है। जहां दस वर्ष पहले देश में केवल 77 पासपोर्ट केंद्र थे, वहीं अब इनकी संख्या बढ़कर 545 हो चुकी है। विदेश मंत्रालय का दावा है कि डिजिटल प्रक्रिया और सेवा विस्तार के कारण पासपोर्ट प्राप्त करना पहले की तुलना में काफी आसान हो गया है। मंत्रालय ने यह भी बताया कि भारतीय नागरिकों के लिए वैश्विक यात्रा के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं। वर्तमान में 27 देश भारतीयों को वीजा-फ्री प्रवेश देते हैं, जबकि 47 देशों में वीजा ऑन अराइवल और 66 देशों में ई-वीजा की सुविधा उपलब्ध है। यूरोपीय देशों के साथ हुए मोबिलिटी एग्रीमेंट छात्रों, पेशेवरों, शोधकर्ताओं और कारोबारियों की आवाजाही को भी आसान बना रहे हैं।
नागरिकता कानून क्या कहता है?
विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम और उससे जुड़े कानूनी प्रावधानों के आधार पर होता है। कानून के मुताबिक यदि किसी व्यक्ति का जन्म 26 जनवरी 1950 से लेकर 1 जुलाई 1987 से पहले भारत में हुआ है, तो वह जन्म के आधार पर भारतीय नागरिक माना जाएगा। लेकिन 1 जुलाई 1987 के बाद जन्म लेने वाले व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि उसके माता-पिता में से कम से कम एक भारतीय नागरिक हो। यही वजह है कि केवल जन्म प्रमाण पत्र, आधार कार्ड या पासपोर्ट दिखाकर हर स्थिति में नागरिकता साबित नहीं की जा सकती। कई मामलों में माता-पिता की नागरिकता से जुड़े दस्तावेज भी आवश्यक हो सकते हैं।
अदालतों ने भी पासपोर्ट को अंतिम प्रमाण नहीं माना
इस विषय पर न्यायपालिका का रुख भी स्पष्ट रहा है। वर्ष 2013 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में कहा था कि केवल पासपोर्ट, आधार कार्ड या जन्म प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर देने से नागरिकता स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती। अदालत ने माना कि संबंधित व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि वह नागरिकता कानून की शर्तों को पूरा करता है। विदेश मंत्रालय के ताजा बयान के बाद एक बार फिर नागरिकता और पासपोर्ट के बीच का अंतर चर्चा का विषय बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों को यह समझना होगा कि पासपोर्ट यात्रा का अधिकार देता है, जबकि नागरिकता का निर्धारण अलग कानूनी प्रक्रिया और प्रमाणों के आधार पर किया जाता है !
