सियोल। फैक्ट्रियों और डेटा केंद्रों से निकलने वाली गर्मी को अब तक बड़ी हद तक बेकार ऊर्जा मानकर वातावरण में छोड़ दिया जाता रहा है। लेकिन दक्षिण कोरिया के शोधकर्ताओं ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो इसी बेकार गर्मी को उपयोग में लाकर ठंडक पैदा करने की दिशा में नया रास्ता खोल सकती है। इस नई प्रणाली की खासियत यह है कि इसे चलाने के लिए बहुत अधिक तापमान वाली गर्मी की जरूरत नहीं है। करीब 40 डिग्री सेल्सियस तापमान वाली औद्योगिक वेस्ट हीट से भी यह कूलिंग तैयार कर सकती है।
इस तकनीक को कोरिया इंस्टीट्यूट ऑफ मशीनरी एंड मटीरियल्स और चुंग-आंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने विकसित किया है। यह एक रासायनिक अवशोषण आधारित हीट पंप है, जिसे खास तौर पर उन जगहों के लिए तैयार किया गया है जहां फैक्ट्रियों या डेटा केंद्रों से लगातार गर्मी निकलती रहती है। शोधकर्ताओं का उद्देश्य ऐसी ऊर्जा का दोबारा इस्तेमाल करना है, जो सामान्य परिस्थितियों में सीधे वातावरण में चली जाती है।
70 डिग्री नहीं, सिर्फ 40 डिग्री की गर्मी से भी काम करने का दावा
पारंपरिक वेस्ट-हीट आधारित कूलिंग तकनीकों की एक बड़ी सीमा यह रही है कि उन्हें प्रभावी ढंग से काम करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक तापमान वाली गर्मी या भाप की जरूरत पड़ती है। नई प्रणाली इस मामले में अलग है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह लगभग 40 डिग्री सेल्सियस की कम तापमान वाली वेस्ट हीट को भी कूलिंग प्रक्रिया में इस्तेमाल कर सकती है।
फैक्ट्रियों और बड़े डेटा केंद्रों से निकलने वाली गर्म हवा या गर्म पानी अक्सर इसी तापमान के आसपास हो सकता है। यदि ऐसी गर्मी को उपयोगी ऊर्जा में बदला जा सके तो न केवल ऊर्जा की बर्बादी कम होगी, बल्कि कूलिंग के लिए अतिरिक्त बिजली की जरूरत भी घटाई जा सकती है।
चार चरणों में गर्मी से तैयार होती है ठंडक
इस तकनीक की कार्यप्रणाली को समझें तो सबसे पहले फैक्ट्री या डेटा सेंटर से निकलने वाली गर्मी को हीट पंप के भीतर पहुंचाया जाता है। इसके बाद प्राकृतिक अमोनिया आधारित प्रणाली इस गर्मी का इस्तेमाल करते हुए रासायनिक प्रक्रिया को सक्रिय करती है।
अगले चरण में इलेक्ट्रोकेमिकल कंप्रेसर अमोनिया गैस के दबाव को नियंत्रित तरीके से बढ़ाता है। इस प्रक्रिया के लिए पारंपरिक भारी यांत्रिक कंप्रेसर के बजाय विद्युत संकेत आधारित व्यवस्था का इस्तेमाल किया गया है।
इसके बाद दबाव वाली अमोनिया गैस को नियंत्रित तरीके से फैलाया जाता है। विस्तार के दौरान यह आसपास की ऊष्मा को अवशोषित करती है, जिससे कूलिंग प्रभाव पैदा होता है। इस तरह पूरी प्रणाली फैक्ट्री या डेटा सेंटर की बेकार गर्मी को कूलिंग प्रक्रिया के लिए उपयोगी ऊर्जा में बदलने की कोशिश करती है।
भारी मोटर नहीं, इसलिए शोर और कंपन भी कम
नई प्रणाली की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसका इलेक्ट्रोकेमिकल कंप्रेसर बताया जा रहा है। पारंपरिक एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेशन सिस्टम में यांत्रिक कंप्रेसर के अंदर कई हिस्से लगातार चलते रहते हैं। इसी वजह से आवाज और कंपन पैदा होते हैं।
नई तकनीक में कंप्रेसर के भीतर चलने वाले यांत्रिक हिस्सों की जरूरत को कम करने की कोशिश की गई है। इससे प्रणाली के अधिक शांत तरीके से काम करने की संभावना बनती है। यदि तकनीक बड़े स्तर पर सफल रहती है, तो अस्पतालों, विद्यालयों, कार्यालयों और अन्य ऐसे स्थानों में भी इसका उपयोग किया जा सकता है जहां कम शोर वाली कूलिंग व्यवस्था की जरूरत होती है।
नए डिजाइन से छोटी मशीन में ज्यादा क्षमता का लक्ष्य
शोधकर्ताओं ने हीट पंप के उस हिस्से के डिजाइन में भी बदलाव किया है जिसे अवशोषण बेड कहा जाता है। इसी हिस्से में गर्मी और रासायनिक प्रक्रिया के बीच महत्वपूर्ण आदान-प्रदान होता है। नए डिजाइन का उद्देश्य कम आकार में बेहतर प्रदर्शन हासिल करना है।
रिपोर्टों के अनुसार, परीक्षण में नए डिजाइन वाले सिस्टम ने मौजूदा व्यवस्था की तुलना में बेहतर प्रदर्शन दिखाया है। इससे भविष्य में अपेक्षाकृत छोटी और हल्की कूलिंग इकाइयां तैयार करने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, प्रयोगशाला या प्रोटोटाइप स्तर के प्रदर्शन को बड़े औद्योगिक संयंत्रों में लंबे समय तक समान परिणाम देने से पहले व्यापक परीक्षण की जरूरत होगी।
प्राकृतिक अमोनिया का इस्तेमाल, पर्यावरण के लिए क्यों अहम?
इस तकनीक में प्राकृतिक अमोनिया को कार्यकारी माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया गया है। आधुनिक कूलिंग प्रणालियों में इस्तेमाल होने वाले कुछ सिंथेटिक रेफ्रिजरेंट पर्यावरण पर अधिक प्रभाव डाल सकते हैं, इसलिए कम पर्यावरणीय प्रभाव वाले विकल्पों की तलाश लगातार जारी है।
प्राकृतिक अमोनिया का इस्तेमाल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण विकल्प माना जाता है। हालांकि अमोनिया स्वयं विषैला पदार्थ है, इसलिए औद्योगिक स्तर पर इसके इस्तेमाल के दौरान सुरक्षा, रिसाव नियंत्रण और उचित इंजीनियरिंग व्यवस्था बेहद जरूरी होगी।
10 किलोवाट प्रोटोटाइप से शुरू हुई अगली परीक्षा
इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर तक ले जाने के लिए 10 किलोवाट क्षमता वाले प्रोटोटाइप का परीक्षण किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह देखना है कि वास्तविक परिस्थितियों में यह प्रणाली कितनी प्रभावी और भरोसेमंद तरीके से काम करती है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक भविष्य में इसकी क्षमता बढ़ाने के लिए कंप्रेसर स्टैक में अतिरिक्त सेल जोड़े जा सकते हैं। यानी जरूरत के अनुसार प्रणाली को बड़े औद्योगिक उपयोग के लिए विस्तारित करने की संभावना मौजूद है।
डेटा सेंटर से फैक्ट्री तक बदल सकता है कूलिंग का तरीका
आज डेटा केंद्रों में बड़ी मात्रा में बिजली सर्वर को ठंडा रखने में खर्च होती है। दूसरी ओर उन्हीं सर्वरों से लगातार गर्मी भी पैदा होती है। इसी तरह कई औद्योगिक संयंत्रों में मशीनों और प्रक्रियाओं से निकलने वाली गर्मी वातावरण में चली जाती है।
यदि नई तकनीक औद्योगिक स्तर पर अपेक्षित प्रदर्शन देने में सफल रहती है, तो यही बेकार गर्मी भविष्य में कूलिंग व्यवस्था के लिए उपयोगी संसाधन बन सकती है। इससे ऊर्जा के दोबारा इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ेंगी और कूलिंग सिस्टम पर बिजली की निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है।
फिलहाल यह तकनीक प्रोटोटाइप और परीक्षण के चरण में है। इसलिए इसे बाजार में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली तैयार तकनीक मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन अगर इसके औद्योगिक परीक्षण सफल रहते हैं, तो फैक्ट्रियों और डेटा केंद्रों की वेस्ट हीट को दोबारा इस्तेमाल करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
