बक्सर में बीजेपी का संगठनात्मक संकट। सांकेतिक तस्वीर
buxar: बक्सर भाजपा में अंदरूनी कलह अब खुलकर सामने आ गई है। पार्टी की जिला इकाई के 25 मंडलों में से 11 मंडल अध्यक्षों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इन पदाधिकारियों ने जिलाध्यक्ष ओम प्रकाश भुवन पर मनमानी और तानाशाहीपूर्ण रवैया अपनाने समेत कई गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि, जिलाध्यक्ष ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए इसे दबाव बनाने की राजनीति करार दिया है। अब इस पूरे मामले में प्रदेश नेतृत्व के फैसले का इंतजार है।
11 मंडल अध्यक्षों ने प्रदेश अध्यक्ष को भेजा इस्तीफा
जानकारी के मुताबिक, इन सभी 11 मंडल अध्यक्षों ने 30 जून को ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष को अपना त्यागपत्र भेज दिया था। हालांकि, उस समय बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव चल रहा था, इसलिए मामला सार्वजनिक नहीं किया गया। उपचुनाव खत्म होने के बाद अब इन इस्तीफों की जानकारी सोशल मीडिया पर सामने आने लगी, जिसके बाद बक्सर भाजपा में चल रही अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आ गई। इस्तीफा देने वाले मंडल अध्यक्षों ने अपने पत्र में संगठन की मौजूदा स्थिति के लिए जिला अध्यक्ष ओम प्रकाश भुवन को जिम्मेदार ठहराया है।
जिलाध्यक्ष पर मनमानी और तानाशाही के आरोप
प्रदेश अध्यक्ष को भेजे गए त्यागपत्र में मंडल अध्यक्षों ने आरोप लगाया कि जिला अध्यक्ष संगठन में मनमाने और तानाशाहीपूर्ण तरीके से काम कर रहे हैं। उनका दावा है कि मंडलों में गुटबाजी को बढ़ावा दिया जा रहा है और कार्यकर्ताओं तथा पदाधिकारियों को उचित सम्मान नहीं मिल रहा। कुछ मंडल अध्यक्षों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें कई मौकों पर अपमानित किया गया, जिसके चलते वे संगठन में अपने दायित्वों का निर्वहन करने में खुद को असहज महसूस कर रहे हैं। इसी वजह से उन्होंने प्रदेश नेतृत्व से अपने इस्तीफे स्वीकार करने का अनुरोध किया है। हालांकि, पार्टी सूत्रों के अनुसार प्रदेश नेतृत्व ने अभी तक इन इस्तीफों को स्वीकार नहीं किया है। इस बीच संबंधित मंडलों में संगठन का कामकाज सुचारु रखने के लिए एक-एक संयोजक नियुक्त कर दिया गया है।
जिलाध्यक्ष ने आरोपों को बताया दबाव की राजनीति
मंडल अध्यक्षों के आरोपों पर भाजपा के बक्सर जिलाध्यक्ष ओम प्रकाश भुवन ने सफाई देते हुए सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। उन्होंने इसे दबाव बनाने की राजनीति बताया। जिलाध्यक्ष का कहना है कि मंडलों में संयोजक नियुक्त किए जाने के बाद संगठन का काम पहले की तुलना में बेहतर तरीके से चल रहा है। उन्होंने हाल ही में हुए ‘मन की बात’ कार्यक्रम और डिजिटल प्रशिक्षण का उदाहरण देते हुए दावा किया कि बक्सर भाजपा का प्रदर्शन राज्य स्तर पर टॉप-10 में रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग मंडल अध्यक्षों के माध्यम से उन पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस तरह की राजनीति से संगठन में कुछ हासिल नहीं होने वाला।
प्रशिक्षण वर्ग के बहिष्कार से भी सामने आया था असंतोष
बक्सर भाजपा में मंडल अध्यक्षों और जिलाध्यक्ष के बीच मतभेद का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले पार्टी की ओर से आयोजित दो दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग को लेकर भी असंतोष सामने आया था। बताया जाता है कि अब इस्तीफा देने वाले सभी मंडल अध्यक्षों ने इस प्रशिक्षण वर्ग का विरोध करते हुए इसका बहिष्कार किया था। उस समय भी पार्टी के अंदर इसे लेकर चर्चा तेज हुई थी, लेकिन संगठन ने मामले को सार्वजनिक विवाद बनने से रोकने की कोशिश की। अब 11 मंडल अध्यक्षों के सामूहिक इस्तीफे सामने आने के बाद यह विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
इन 11 मंडल अध्यक्षों ने दिया इस्तीफा
जिन 11 मंडल अध्यक्षों ने प्रदेश अध्यक्ष को अपना त्यागपत्र भेजा है, उनमें:
- बक्सर पश्चिमी नगर मंडल: अजय कुमार वर्मा
- सोनवर्षा मंडल: पिंकू चौबे
- नियाजीपुर मंडल: अशीत लाल
- बहन मंडल: उदय उज्जैन
- कोरान सराय मंडल: धर्मेंद्र पांडेय
- चक्की मंडल: विनोद उपाध्याय
- पांडेयपट्टी मंडल: अजय भट्ट
- बक्सर ग्रामीण मंडल: दीपक सिंह
- चौसा मंडल: प्रकाश राय
- डुमरी मंडल: वंशीधर पांडेय
- चौसा नगर मंडल: सविता देवी
सामूहिक इस्तीफे से बढ़ी प्रदेश नेतृत्व की चुनौती
एक साथ 11 मंडल अध्यक्षों के इस्तीफे ने भाजपा के जिला संगठन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। मंडल अध्यक्ष पार्टी के जमीनी संगठन की अहम कड़ी माने जाते हैं। ऐसे में एक साथ 25 में से 11 मंडलों के अध्यक्षों का पद छोड़ने का फैसला और जिलाध्यक्ष पर गंभीर आरोप लगाना संगठन के भीतर चल रहे मतभेदों की ओर इशारा करता है। हालांकि जिलाध्यक्ष इसे दबाव की राजनीति बता रहे हैं और पार्टी के कार्यक्रमों में बेहतर प्रदर्शन का दावा कर रहे हैं। दूसरी ओर, प्रदेश नेतृत्व ने अभी तक इस्तीफे स्वीकार नहीं किए हैं और संबंधित मंडलों में संयोजक नियुक्त कर दिए गए हैं। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रदेश नेतृत्व इस पूरे विवाद को किस तरह सुलझाता है और 11 मंडल अध्यक्षों के इस्तीफे पर आखिर क्या फैसला लिया जाता है।
