देशभर में पारंपरिक फैशन की ओर बढ़ते रुझान के बीच कोल्हापुरी चप्पल एक बार फिर सुर्खियों में है। अपनी सादगी, मजबूती और शाही इतिहास के लिए मशहूर यह पारंपरिक फुटवियर अब सिर्फ गांवों या छोटे शहरों तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि बड़े महानगरों और फैशन इंडस्ट्री में भी अपनी मजबूत पकड़ बना चुका है।

महाराष्ट्र के कोल्हापुर से शुरू हुई यह चप्पल आज पूरे देश और विदेशों में लोकप्रिय हो चुकी है। इसके अलावा सांगली और सोलापुर भी इसके प्रमुख उत्पादन केंद्र माने जाते हैं। यहां के कारीगर पीढ़ियों से इस कला को संजोए हुए हैं और आज भी पारंपरिक तरीके से हाथों से चप्पल तैयार करते हैं।

इतिहास की बात करें तो कोल्हापुरी चप्पल की शुरुआत करीब 12वीं-13वीं सदी मानी जाती है। बाद में छत्रपति शाहू महाराज के शासनकाल में इसे खास पहचान मिली। उस समय यह चप्पल खासतौर पर सैनिकों और राजघराने के लोगों के लिए बनाई जाती थी, क्योंकि यह मजबूत, टिकाऊ और लंबे समय तक चलने वाली होती थी। समय के साथ यह आम लोगों के बीच भी लोकप्रिय हो गई।

विशेषज्ञों के अनुसार, कोल्हापुरी चप्पल की सबसे बड़ी खासियत इसका पूरी तरह से हैंडमेड होना है। इसे बनाने में नेचुरल लेदर का इस्तेमाल किया जाता है और एक जोड़ी चप्पल तैयार करने में कई दिन लग सकते हैं। यही कारण है कि इसकी गुणवत्ता और आरामदायक डिजाइन इसे बाकी फुटवियर से अलग बनाता है।

फैशन इंडस्ट्री में भी इसका क्रेज लगातार बढ़ रहा है। कई डिजाइनर अब कोल्हापुरी चप्पल को मॉडर्न लुक के साथ पेश कर रहे हैं, जिससे यह युवाओं के बीच भी तेजी से लोकप्रिय हो रही है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे Amazon और Flipkart पर इसकी बिक्री में भी इजाफा देखा जा रहा है।

हालांकि, बढ़ती मांग के साथ नकली उत्पादों की समस्या भी सामने आ रही है। बाजार में सस्ते और मशीन से बने चप्पल को कोल्हापुरी नाम से बेचा जा रहा है, जिससे असली कारीगरों को नुकसान हो रहा है। ऐसे में सरकार और संबंधित संस्थाएं GI टैग के जरिए इसकी पहचान को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रही हैं।

गौरतलब है कि कोल्हापुरी चप्पल को GI (Geographical Indication) टैग मिल चुका है, जिससे इसकी मौलिकता और परंपरा को संरक्षण मिला है। इससे स्थानीय कारीगरों को भी लाभ हो रहा है और उनकी कला को वैश्विक पहचान मिल रही है।

स्थानीय कारीगरों का कहना है कि अगर सरकार और बाजार से सही समर्थन मिले, तो यह उद्योग लाखों लोगों को रोजगार दे सकता है। साथ ही, यह भारत की पारंपरिक कला को दुनिया के सामने पेश करने का एक मजबूत माध्यम भी बन सकता है।

कुल मिलाकर, कोल्हापुरी चप्पल आज सिर्फ एक फुटवियर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, इतिहास और शिल्पकला का प्रतीक बन चुकी है। बदलते समय के साथ इसका रूप भले ही आधुनिक हो गया हो, लेकिन इसकी जड़ें आज भी परंपरा में गहराई से जुड़ी हुई हैं।