मां बनना हर महिला के जीवन का बेहद खास सपना होता है, लेकिन जब लंबे समय तक कोशिशों के बावजूद प्रेग्नेंसी नहीं ठहरती, तो यह मानसिक और भावनात्मक रूप से काफी परेशान करने वाला अनुभव बन जाता है। कई महिलाएं इसे तनाव, उम्र या लाइफस्टाइल से जोड़कर नजरअंदाज कर देती हैं, जबकि असली वजह शरीर में छिपी एक हार्मोनल समस्या भी हो सकती है थायरॉयड डिसऑर्डर।
हर साल 25 मई को World Thyroid Day मनाया जाता है ताकि लोगों को थायरॉयड से जुड़ी बीमारियों और उनके असर के बारे में जागरूक किया जा सके। डॉक्टरों के मुताबिक महिलाओं में बढ़ती फर्टिलिटी समस्याओं के पीछे हाइपोथायरॉयडिज्म एक बड़ा कारण बनकर सामने आ रहा है।
आखिर क्या होता है थायरॉयड और क्यों है इतना जरूरी?
थायरॉयड गर्दन में मौजूद एक छोटी तितली के आकार की ग्रंथि होती है, जो शरीर के कई जरूरी कामों को कंट्रोल करती है। यह हार्मोन मेटाबॉलिज्म, ऊर्जा, वजन, मूड और पीरियड्स तक को प्रभावित करता है। जब यह ग्रंथि सही मात्रा में हार्मोन नहीं बना पाती, तो शरीर का पूरा हार्मोनल बैलेंस बिगड़ने लगता है।
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि थायरॉयड का सीधा असर महिलाओं की प्रजनन क्षमता पर पड़ता है। हार्मोन असंतुलित होने पर ओव्यूलेशन यानी अंडा बनने और निकलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिससे कंसीव करने में दिक्कत आने लगती है।
इन संकेतों को भूलकर भी हल्के में न लें
कई बार महिलाएं थायरॉयड के शुरुआती लक्षणों को सामान्य कमजोरी या तनाव समझकर नजरअंदाज कर देती हैं। लेकिन अगर लंबे समय से ये समस्याएं बनी हुई हैं, तो तुरंत जांच करवाना जरूरी हो सकता है।
थायरॉयड के सामान्य संकेत
- लगातार थकान महसूस होना
- अचानक वजन बढ़ना
- बालों का तेजी से झड़ना
- पीरियड्स का अनियमित होना
- हमेशा ठंड लगना
- मूड स्विंग और चिड़चिड़ापन
- स्किन का ड्राई होना
डॉक्टरों के अनुसार कई महिलाएं नियमित पीरियड्स होने के बावजूद सही तरीके से ओव्यूलेट नहीं कर पातीं। ऐसे मामलों में थायरॉयड टेस्ट काफी मददगार साबित हो सकता है।
प्रेग्नेंसी पर कैसे पड़ता है असर?
फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि थायरॉयड सिर्फ वजन या मेटाबॉलिज्म तक सीमित नहीं है। यह एग क्वालिटी, फर्टिलाइजेशन और एम्ब्रियो इम्प्लांटेशन जैसी प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करता है। अगर शरीर को सही हार्मोनल सिग्नल नहीं मिलते, तो स्वस्थ एग बनना मुश्किल हो सकता है।
कुछ विशेषज्ञ गर्भधारण की योजना बना रही महिलाओं में TSH लेवल को 2.5 mIU/L से नीचे रखना बेहतर मानते हैं, क्योंकि हल्का बढ़ा हुआ स्तर भी फर्टिलिटी को प्रभावित कर सकता है।
भारत में तेजी से बढ़ रही समस्या
रिसर्च रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत में प्रजनन आयु की महिलाओं में हाइपोथायरॉयडिज्म के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। खराब लाइफस्टाइल, तनाव, नींद की कमी और पोषण की अनदेखी इसकी बड़ी वजह मानी जा रही है।
लाइफस्टाइल में छोटे बदलाव कर सकते हैं मदद
थायरॉयड को कंट्रोल में रखने के लिए सिर्फ दवाइयां ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदतें भी काफी मायने रखती हैं।
क्या करें?
- संतुलित और पौष्टिक आहार लें
- आयोडीन और सेलेनियम से भरपूर चीजें खाएं
- पर्याप्त नींद लें
- तनाव कम करने की कोशिश करें
- डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाइयां समय पर लें
समय रहते जांच क्यों है जरूरी?
डॉक्टरों का कहना है कि अगर आप लंबे समय से कंसीव करने की कोशिश कर रही हैं और बार-बार निराशा हाथ लग रही है, तो थायरॉयड टेस्ट जरूर करवाएं। सही समय पर पहचान और इलाज से न सिर्फ फर्टिलिटी बेहतर हो सकती है, बल्कि भविष्य की प्रेग्नेंसी से जुड़ी जटिलताओं का खतरा भी कम हो सकता है।
