आज के समय में मोबाइल फोन लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। दिनभर काम, पढ़ाई और मनोरंजन के बाद बड़ी संख्या में लोग रात में भी मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं। कई लोग फोन चलाते-चलाते सो जाते हैं और फिर उसे अपने तकिए या बिस्तर के बिल्कुल पास रखकर सोते हैं। यही आदत अब स्वास्थ्य को लेकर चर्चा का विषय बन गई है। फेमस कैंसर हीलर डॉ. तरंग कृष्णा ने एक इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए रात में फोन के इस्तेमाल और उसे सिरहाने रखकर सोने को लेकर लोगों को सावधान किया है।
क्या सोते समय फोन को सिरहाने रखना सही है?
डॉ. तरंग कृष्णा के अनुसार, आजकल बहुत से लोगों की आदत है कि वे रात में मोबाइल फोन को तकिए के पास रखकर सोते हैं। कई लोगों को यह बिल्कुल सामान्य व्यवहार लगता है, लेकिन डॉक्टर ने इसे लेकर सावधानी बरतने की बात कही है। उनके मुताबिक रात में फोन को लगातार अपने बेहद करीब रखने से उससे होने वाले संपर्क को लेकर चिंता की जा सकती है।
हालांकि, किसी एक आदत को सीधे कैंसर का कारण मान लेना सही नहीं है। कैंसर के जोखिम को लेकर वैज्ञानिक प्रमाणों को समझना जरूरी है और स्वास्थ्य संबंधी किसी भी गंभीर दावे के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए।
मोबाइल फोन और ईएमएफ विकिरण को लेकर क्या चिंता है?
मोबाइल फोन रेडियोफ्रीक्वेंसी यानी गैर-आयनीकरण विद्युतचुंबकीय विकिरण का इस्तेमाल करके संचार करते हैं। डॉ. तरंग कृष्णा ने अपने पोस्ट में ईएमएफ यानी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड को लेकर चिंता जताई है और इसके लंबे समय तक संपर्क को स्वास्थ्य के लिहाज से सावधानी का विषय बताया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एजेंसियों ने रेडियोफ्रीक्वेंसी विद्युतचुंबकीय क्षेत्रों को लेकर शोध और वर्गीकरण किया है, लेकिन उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर मोबाइल फोन को सीधे कैंसर का निश्चित कारण बताना उचित नहीं है। इसलिए इस विषय में डर पैदा करने के बजाय प्रमाण आधारित जानकारी को समझना अधिक जरूरी है।
ब्रेन ट्यूमर से जोड़कर क्यों की जाती है मोबाइल फोन की चर्चा?
मोबाइल फोन के इस्तेमाल और ब्रेन ट्यूमर के संभावित संबंध को लेकर लंबे समय से वैज्ञानिक अध्ययन होते रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि फोन का इस्तेमाल करते समय सिर और फोन के बीच दूरी कम होती है। इसी वजह से वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की है कि लंबे समय तक रेडियोफ्रीक्वेंसी विकिरण के संपर्क का स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं।
अब तक इस विषय पर उपलब्ध शोध से मोबाइल फोन के सामान्य इस्तेमाल और ब्रेन ट्यूमर के बीच कोई स्पष्ट और निर्णायक कारणात्मक संबंध स्थापित नहीं हुआ है। इसलिए सोशल मीडिया पर किए गए किसी भी स्वास्थ्य दावे को अंतिम सत्य मानने के बजाय विश्वसनीय चिकित्सकीय और वैज्ञानिक स्रोतों को देखना जरूरी है।
ब्लू लाइट नींद को जरूर कर सकती है प्रभावित
मोबाइल फोन को रात में इस्तेमाल करने को लेकर एक अलग और अच्छी तरह स्थापित चिंता नींद से जुड़ी है। फोन की स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी, विशेष रूप से नीली रोशनी, रात के समय नींद की प्राकृतिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा सोशल मीडिया, वीडियो और लगातार संदेश देखने की आदत भी दिमाग को सक्रिय बनाए रख सकती है।
सोने से ठीक पहले लंबे समय तक मोबाइल देखने से कई लोगों को नींद आने में परेशानी हो सकती है। देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत सोने का समय भी आगे बढ़ा सकती है। पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद शरीर और मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।
रात में फोन स्क्रॉल करना बन सकता है नींद खराब होने की वजह
आजकल सोने से पहले मोबाइल पर लगातार स्क्रॉल करना बहुत आम हो गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और दूसरी डिजिटल सामग्री लोगों का ध्यान लंबे समय तक बनाए रखने के लिए डिजाइन की जाती हैं। ऐसे में व्यक्ति कुछ मिनट के लिए फोन देखने के इरादे से शुरुआत करता है, लेकिन काफी देर तक स्क्रीन पर बना रह सकता है।
इस आदत का सीधा असर सोने के समय और नींद की अवधि पर पड़ सकता है। फोन के लगातार इस्तेमाल के कारण दिमाग को आराम देने के बजाय वह डिजिटल सामग्री में व्यस्त रहता है। इससे सोने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
सोने से पहले मोबाइल से दूरी बनाना क्यों फायदेमंद हो सकता है?
रात में मोबाइल फोन का इस्तेमाल कम करने से स्क्रीन के संपर्क को घटाने के साथ-साथ सोने की दिनचर्या बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार, सोने से पहले फोन को अपने बिस्तर से दूर रखना एक व्यावहारिक कदम हो सकता है।
फोन को तकिए के नीचे या शरीर से बिल्कुल सटाकर रखने के बजाय उसे कुछ दूरी पर रखा जा सकता है। इससे रात में बार-बार फोन देखने की आदत पर भी नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है।
सोने से कम से कम एक घंटे पहले फोन बंद करने की सलाह
अच्छी नींद के लिए सोने से लगभग एक घंटे पहले मोबाइल फोन का इस्तेमाल बंद करने की सलाह दी जाती है। इस समय को स्क्रीन से दूर रहकर शांत गतिविधियों में लगाया जा सकता है। किताब पढ़ना, परिवार के लोगों से बातचीत करना या ध्यान जैसी गतिविधियां सोने से पहले मन को शांत करने में मदद कर सकती हैं।
यदि किसी व्यक्ति को लगातार नींद आने में परेशानी हो रही है, रात में बार-बार नींद टूटती है या लंबे समय से नींद की समस्या बनी हुई है, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।
कैंसर के डर से ज्यादा जरूरी है सही जानकारी
मोबाइल फोन को लेकर कैंसर का डर पैदा करने वाली खबरें या सोशल मीडिया पोस्ट सामने आने पर यह समझना जरूरी है कि हर स्वास्थ्य दावा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं होता। कैंसर का जोखिम कई अलग-अलग कारकों से प्रभावित हो सकता है और किसी एक आदत को बिना पर्याप्त प्रमाण के इसका निश्चित कारण बताना सही नहीं होगा।
मोबाइल फोन का अत्यधिक इस्तेमाल कम करना, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना और नियमित नींद की दिनचर्या अपनाना स्वास्थ्य के लिहाज से उपयोगी कदम हो सकते हैं। लेकिन मोबाइल फोन को सीधे कैंसर का कारण मानकर घबराने के बजाय प्रमाण आधारित जानकारी पर भरोसा करना चाहिए।
