ere | Source: ereनई दिल्ली। विभिन्न राज्यों में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया के बीच सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी ने एक बार फिर मतदान के अधिकार और मतदाता सूची से जुड़े सवालों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जस्टिस भुइयां ने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसका परिणाम लाखों भारतीय नागरिकों को उनके मतदान के अधिकार से वंचित करना है, मनमानी होगी और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ मानी जाएगी।

जस्टिस उज्जल भुइयां ने रविवार को हैदराबाद स्थित नालसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो अलग-अलग वर्गों की कल्पना नहीं करता। एक वर्ग ऐसा नहीं हो सकता जिसके पास मतदान का अधिकार हो और दूसरा ऐसा, जिसे इस अधिकार से वंचित कर दिया जाए।

वोट का अधिकार छीनने वाली प्रक्रिया पर उठाया सवाल

जस्टिस भुइयां ने कहा कि यदि किसी प्रक्रिया का परिणाम भारतीय नागरिकों को पूरी तरह मतदान के अधिकार से वंचित करना है और उन्हें अपने ही देश में बिना वोट के अधिकार वाला नागरिक बना देना है, तो ऐसी प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगी।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मतदान का अधिकार भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए ऐसी किसी भी प्रक्रिया को उचित नहीं ठहराया जा सकता, जिसका अंतिम परिणाम बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों को उनके मतदान के अधिकार से वंचित करना हो।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि यदि किसी प्रक्रिया के कारण लाखों या करोड़ों भारतीय नागरिक अपने ही देश में मतदान के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और उन्हें एक तरह से दूसरे दर्जे के नागरिक की स्थिति में ला दिया जाता है, तो ऐसी प्रक्रिया मनमानी है। उनके अनुसार, किसी भी तर्क के आधार पर इसे सही नहीं ठहराया जा सकता।

‘संविधान की आत्मा पर हमला’ वाली टिप्पणी

जस्टिस उज्जल भुइयां ने अपनी टिप्पणी में आगे कहा कि ऐसी प्रक्रिया संविधान की आत्मा पर हमला करती है। उन्होंने इसे उस संवैधानिक व्यवस्था को नकारने के समान बताया, जिसे भारत ने अपने संविधान के आधार पर स्वीकार किया है।

उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब एसआईआर को लेकर विभिन्न राज्यों में राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों की ओर से अलग-अलग सवाल उठाए जा रहे हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान नाम हटाए जाने, दस्तावेजों की मांग और प्रक्रिया की पारदर्शिता जैसे मुद्दे पहले से ही बहस का विषय बने हुए हैं।

हालांकि, जस्टिस भुइयां की ये टिप्पणियां कार्यक्रम में दिए गए उनके विचारों के तौर पर सामने आई हैं। उपलब्ध जानकारी में यह नहीं कहा गया है कि उन्होंने एसआईआर के संबंध में कोई न्यायिक आदेश जारी किया है।

अनुच्छेद 326 को लेकर जस्टिस भुइयां ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट के जज ने मतदान के अधिकार को भारत के लंबे लोकतांत्रिक संघर्ष से जोड़ते हुए कहा कि भारतीय नागरिकों का वोट देने का अधिकार विदेशी शासन के खिलाफ देश के लंबे संघर्ष से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि आजादी अनेक संघर्षों और बलिदानों के बाद हासिल हुई और मतदान का अधिकार उसी लोकतांत्रिक उपलब्धि का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई भी प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता और कोई भी अदालत इसे माफ नहीं कर सकती। उनके अनुसार, संविधान से ऊपर कोई नहीं है।

क्या है एसआईआर और क्यों हो रहा विवाद?

विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची की विस्तृत जांच और पुनरीक्षण करना है। निर्वाचन आयोग का कहना है कि इसके जरिए मृत व्यक्तियों, दोहरे नाम, स्थान बदल चुके मतदाताओं और अन्य अपात्र नामों को हटाकर अधिक साफ और विश्वसनीय मतदाता सूची तैयार करने का प्रयास किया जाता है।

एसआईआर की शुरुआत जून 2025 में बिहार से हुई थी और बाद में इसे देश के कई राज्यों तक विस्तारित किया गया। इस प्रक्रिया को लेकर बिहार, पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर बहस हुई है।

विवाद का एक प्रमुख मुद्दा मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने की आशंका, मतदाताओं से दस्तावेज मांगे जाने और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने से जुड़ा है। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची में केवल पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि चुनाव प्रक्रिया विश्वसनीय और निष्पक्ष बनी रहे।

एसआईआर विवाद के बीच बयान क्यों है महत्वपूर्ण?

जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण और मतदान के अधिकार को लेकर देश के कई हिस्सों में बहस चल रही है। उनके बयान में मतदान के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 326 और समानता के सिद्धांत से जोड़ते हुए उसके महत्व पर जोर दिया गया है।

उनकी टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता के अधिकार को लेकर संवैधानिक सिद्धांत कितने महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, एसआईआर की वैधता या किसी विशेष राज्य में मतदाता सूची से हटाए गए नामों को लेकर अंतिम कानूनी स्थिति संबंधित मामलों में अदालतों के आदेशों और निर्वाचन प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।