हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन' (Reservation Hatao Andolan) को लेकर काफी चर्चा देखने को मिल रही है। कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस अभियान से लाखों लोगों के जुड़ने का दावा किया जा रहा है। ऐसे में एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि भारत में आरक्षण व्यवस्था क्या है, यह किन आधारों पर लागू होती है और क्या सरकार चाहे तो इसे तुरंत खत्म कर सकती है? आइए जानते हैं इससे जुड़े संवैधानिक प्रावधान और कानूनी प्रक्रिया।
Reservation Hatao Andolan: लाखों लोग जुड़े, क्या भारत में सरकार चाहकर भी खत्म कर सकती है आरक्षण? जानिए नियमSource : News 18.com
एजुकेशन सिस्टम में सुधार को लेकर जंतर-मंतर पर चल रहा विरोध प्रदर्शन अभी खत्म ही हुआ था कि सोशल मीडिया पर एक नए अभियान ने जोर पकड़ लिया। इसे 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन' नाम दिया गया है। इसी नाम से इंस्टाग्राम पर एक पेज भी बनाया गया है। हैरानी की बात यह है कि महज 48 घंटे के भीतर इस पेज को 5.5 मिलियन यानी 55 लाख लोग फॉलो कर चुके हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इस पेज को वेदांश त्यागी नाम के यूजर ने बनाया है। वेदांश पेशे से पोर्टफोलियो मैनेजर हैं और स्टॉक मार्केट में निवेश से जुड़ी जानकारी साझा करते हैं।
वेदांश कथित तौर पर 'रिजर्वेशन हटाओ' नाम से एक वेबसाइट शुरू करने की तैयारी भी कर रहे हैं। ऑनलाइन मेंबरशिप और डिजिटल नेटवर्किंग के जरिए लोगों को जोड़ने की योजना बनाई जा रही है। इतना ही नहीं, कॉकरोच जनता पार्टी की तरह जंतर-मंतर पर एक बड़ा प्रदर्शन करने की तैयारी भी चल रही है। सोशल मीडिया पर कई लोग इस आंदोलन का समर्थन करते हुए आरक्षण खत्म करने की मांग कर रहे हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोग इसके विरोध में भी अपनी राय रख रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत में आरक्षण के नियम क्या हैं? संविधान इस बारे में क्या कहता है? सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख रहा है? क्या आरक्षण को खत्म किया जा सकता है और इसे लेकर विवाद क्यों है? आइए इन सभी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।
आंदोलन की प्रमुख मांगें क्या हैं?
लेकिन उससे पहले यह जान लेते हैं कि 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन' की प्रमुख मांगें क्या हैं?
- जाति के आधार पर आरक्षण खत्म किया जाए।
- जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा की जाए।
- उच्च शिक्षा संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मेरिट के आधार पर चयन हो।
- छात्रों के लिए समान शिक्षा व्यवस्था लागू की जाए।
- सरकारी फॉर्म और प्रक्रियाओं में जाति आधारित पहचान का महत्व कम किया जाए।
- समान अवसर और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया जाए।
भारत में आरक्षण की शुरुआत कैसे हुई?
भारत में आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को समान अवसर उपलब्ध कराना रहा है। औपनिवेशिक काल में कोल्हापुर के राजा साहूजी महाराज ने गैर-ब्राह्मण और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की शुरुआत की थी। संविधान लागू होने के बाद अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए सरकारी नौकरियों, शिक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में विशेष प्रावधान किए गए। इसके बाद वर्ष 1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। वहीं वर्ष 2019 में 103वें संविधान संशोधन के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया।
वर्तमान में कितना है आरक्षण?
- अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 27%
- अनुसूचित जाति (SC): 15%
- अनुसूचित जनजाति (ST): 7.5%
- आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS): 10%
भारतीय संविधान में आरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं।
क्या सरकार अकेले आरक्षण खत्म कर सकती है?
इसका सीधा जवाब है- नहीं। भारत में आरक्षण व्यवस्था का बड़ा हिस्सा संविधान के प्रावधानों पर आधारित है, इसलिए इसे पूरी तरह समाप्त करने के लिए केवल सरकार की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। अगर आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव करना हो या संविधान में संशोधन की जरूरत पड़े, तो संसद को संविधान संशोधन विधेयक पारित करना होगा। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत आवश्यक होता है। कुछ मामलों में आधे से अधिक राज्यों की मंजूरी भी जरूरी हो सकती है। इसके अलावा यदि कोई संशोधन संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) के खिलाफ माना जाता है, तो सुप्रीम कोर्ट उसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) भी कर सकता है।
आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख?
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जी हां। आरक्षण से जुड़े कई अहम फैसले सुप्रीम कोर्ट पहले भी दे चुका है। वर्ष 1992 के इंद्रा साहनी (मंडल आयोग) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय करने का सिद्धांत दिया था। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि कुछ विशेष परिस्थितियों में इससे अलग व्यवस्था संभव हो सकती है। वहीं वर्ष 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को 10 प्रतिशत आरक्षण देने वाले 103वें संविधान संशोधन को बहुमत से वैध ठहराया था। इससे साफ होता है कि आरक्षण से जुड़े बड़े फैसलों में संसद और न्यायपालिका दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
क्या पूरी तरह खत्म हो सकता है आरक्षण?
सैद्धांतिक रूप से संसद संविधान में संशोधन कर आरक्षण व्यवस्था में बदलाव कर सकती है, लेकिन व्यवहारिक रूप से यह एक बेहद जटिल प्रक्रिया है। क्योंकि आरक्षण सामाजिक न्याय और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा विषय है, इसलिए किसी भी बड़े बदलाव को संसद, राज्यों और न्यायपालिका- तीनों स्तरों पर कानूनी कसौटी पर खरा उतरना होगा। यही वजह है कि केवल किसी आंदोलन, सार्वजनिक मांग या नेताओं के बयान भर से भारत में आरक्षण व्यवस्था को समाप्त नहीं किया जा सकता।
