आरक्षण के मुद्दे पर चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के बयानों के बीच बिहार में तेज हुई राजनीतिक बहस | Source: Chrome

आरक्षण के मुद्दे पर चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के बयानों के बीच बिहार में तेज हुई राजनीतिक बहस।Source : Chrome

बिहार में आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण के खिलाफ हुए प्रदर्शन के बाद लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के सांसद चिराग पासवान और आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बयान सामने आए हैं। जहां चिराग पासवान ने आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताते हुए इसकी समीक्षा का विरोध किया, वहीं उपेंद्र कुशवाहा ने बिहार में 65 प्रतिशत आरक्षण की सीमा बढ़ाने के फैसले का समर्थन किया है।21 और 22 अगस्त को जंतर-मंतर पर सवर्ण और जनरल कैटेगरी के युवाओं, छात्रों और अलग-अलग संगठनों ने प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारियों ने जाति के बजाय आर्थिक स्थिति को आरक्षण का आधार बनाने की मांग उठाई। इसी के बाद बिहार की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।

चिराग पासवान ने क्या कहा?

चिराग पासवान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो शेयर करते हुए आरक्षण को लेकर अपनी पार्टी का रुख साफ किया। उन्होंने कहा कि आरक्षण किसी को दी गई खैरात नहीं, बल्कि संविधान से मिला अधिकार है।चिराग ने अपने पुराने संसद बयान का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षण खत्म करने की बात तो दूर, वह इसकी समीक्षा के पक्ष में भी नहीं हैं। उन्होंने सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के प्रति अपनी पार्टी की प्रतिबद्धता दोहराई।

65 फीसदी आरक्षण पर उपेंद्र कुशवाहा का समर्थन

चिराग पासवान के बयान के बाद उपेंद्र कुशवाहा ने बिहार में आरक्षण की सीमा बढ़ाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जातीय सर्वे कराया था और उससे मिले आंकड़ों के आधार पर बिहार में आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने का फैसला लिया गया था।

कुशवाहा के मुताबिक, यह मामला अदालत में जाने के बाद रुक गया था। अब जरूरत है कि नीतीश कुमार की पहल को आगे बढ़ाया जाए। उनके बयान से संकेत मिलता है कि वह बिहार में बढ़ी हुई आरक्षण सीमा को लागू कराने के पक्ष में हैं।

जंतर-मंतर पर क्या मांग उठी?

आरक्षण का यह मुद्दा दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के बाद फिर गरम हुआ।प्रदर्शनकारियों ने जाति आधारित आरक्षण की जगह आर्थिक स्थिति को आधार बनाने की मांग रखी।प्रदर्शन में सभी वर्गों के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण और क्रीमी लेयर व्यवस्था लागू करने की मांग भी उठाई गई। इसके अलावा प्रदर्शनकारियों ने 'एक परिवार, एक आरक्षण' जैसी मांग भी सामने रखी।कुछ संगठनों और प्रदर्शनकारियों ने एससी, एसटी और ओबीसी की आरक्षण सूचियों की समीक्षा करने की मांग की। एससी/एसटी एक्ट और यूजीसी के इक्विटी नियमों को लेकर भी विरोध की आवाजें सुनाई दीं।

अब बिहार की राजनीति में क्यों बढ़ी हलचल?

एक तरफ चिराग पासवान आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताते हुए इसकी समीक्षा तक का विरोध कर रहे हैं, तो दूसरी ओर उपेंद्र कुशवाहा बिहार में 65 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं।ऐसे में आरक्षण को लेकर अलग-अलग राजनीतिक रुख सामने आने से बिहार में यह मुद्दा आने वाले दिनों में और अहम हो सकता है। खासकर जातीय सर्वे, आरक्षण की सीमा और आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग के बीच बिहार की राजनीति में इस मुद्दे पर नई बहस देखने को मिल सकती है।