ऋतब्रत गुट ने चुनाव आयोग को सौंपे दस्तावेज।
उमर फ़ारूक़:
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को लेकर सियासी घमासान और तेज हो गया है। विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट, जो खुद को 'असली' (Ashol) टीएमसी बता रहा है, अगले सप्ताह नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से मुलाकात करेगा। इस दौरान गुट चुनाव आयोग के सामने पार्टी के नाम, 'जुड़वा फूल' चुनाव चिह्न और पार्टी की सभी संस्थागत संपत्तियों पर अपना आधिकारिक दावा पेश करेगा।
सूत्रों के मुताबिक, उलूबेरिया पूर्व के विधायक ऋतब्रत बनर्जी खुद चुनाव आयोग के सामने पक्ष रखेंगे। उनके साथ एंटाली विधायक संदीपन साहा, रघुनाथगंज विधायक अखरुज्जमान, सुजापुर विधायक सबीना यासमीन, कस्बा विधायक जावेद अहमद खान समेत कुल 10 नेता मौजूद रहेंगे। संदीपन, सबीना और जावेद विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष हैं, जबकि अखरुज्जमान विपक्ष के मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) हैं।
बागी गुट का कहना है कि वह एकनाथ शिंदे मामले में अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया के आधार पर खुद को "असली टीएमसी" साबित करेगा। गुट का दावा है कि उसने कानूनी और संसदीय विशेषज्ञों की सलाह लेकर सभी जरूरी तैयारियां कर ली हैं, ताकि उनके दावे में कोई बाधा न आए। सूत्रों का यह भी कहना है कि चुनाव आयोग इस मामले को प्राथमिकता दे सकता है।
इस विवाद का सबसे अहम पहलू टीएमसी की आर्थिक संपत्ति भी है। रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी के पास कम से कम 1,100 करोड़ रुपये की वैध संपत्ति (व्हाइट मनी) है, जबकि कुछ अनुमान इसे 1,600 करोड़ रुपये से अधिक बताते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि विधानसभा में अब 65 विधायकों के समर्थन का दावा करने वाला बागी गुट खुद को अलग पार्टी नहीं मानता। उनका कहना है कि यह पार्टी में विभाजन नहीं, बल्कि वही टीएमसी की संवैधानिक और वास्तविक निरंतरता (Constitutional Continuity) है।
सोमवार को हुई अपनी राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में बागी गुट ने ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाकर हावड़ा मध्य के विधायक अरूप रॉय को नया अध्यक्ष घोषित किया। वहीं, ममता बनर्जी को केवल 'मार्गदर्शक' की भूमिका देने का प्रस्ताव रखा गया। इसके बाद मंगलवार को गुट ने पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नीलम मीणा से मुलाकात कर बैठक के सभी फैसलों से जुड़े दस्तावेज भी सौंप दिए।
ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि उन्हें किसी और की पार्टी पर दावा करने की जरूरत नहीं है। उनके अनुसार, पार्टी का चुनाव चिह्न पहले से ही उनका है और वही टीएमसी की संवैधानिक पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वहीं, कालीघाट स्थित ममता बनर्जी खेमा इस दावे का कानूनी आधार पर विरोध कर रहा है। ममता समर्थकों का कहना है कि 2023 के शिवसेना मामले (सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्य) में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि केवल विधायकों की संख्या के आधार पर कोई गुट मूल राजनीतिक दल पर कब्जा नहीं कर सकता। अदालत ने कहा था कि मतदाता किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि मूल पार्टी की पहचान और विश्वसनीयता को वोट देते हैं।
ममता खेमे का यह भी कहना है कि उन्होंने पहले ही चुनाव आयोग को ईमेल के जरिए राष्ट्रीय कार्यसमिति की सूची भेज दी है, जिसमें ममता बनर्जी को पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया गया है।
अब यह पूरा विवाद चुनाव चिन्ह (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा-15 के तहत तय होगा। चुनाव आयोग पार्टी के संगठन और विधायक दल—दोनों में किसके पास वास्तविक बहुमत है, इसकी जांच करेगा। यदि आयोग को संगठन में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता और पार्टी में वास्तविक विभाजन माना जाता है, तो वह टीएमसी के 'जुड़वा फूल' चुनाव चिह्न को फ्रीज भी कर सकता है।
ऐसी स्थिति में दोनों गुटों को भविष्य के चुनाव नए नाम और नए चुनाव चिह्न के साथ लड़ने पड़ सकते हैं। हालांकि, पार्टी की संपत्तियों को लेकर अंतिम फैसला चुनाव आयोग नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट करेगा।
