स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से नक्सलवाद को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि देश में हथियार उठाने वाले नक्सलियों की चुनौती काफी हद तक खत्म हो चुकी है, लेकिन अब एक नई चुनौती सामने है। पीएम मोदी ने इसे ‘दिमागी नक्सल’ का नाम देते हुए कहा कि ऐसे लोगों को पहचानना और उन्हें अलग-थलग करना जरूरी है।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि जंगलों में हथियार लेकर घूमने वाले नक्सलियों का प्रभाव अब बहुत कम हो गया है। सरकार की ओर से 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया था। मई 2026 में गृह मंत्री अमित शाह ने भी दावा किया था कि यह लक्ष्य हासिल कर लिया गया है और भारत अब नक्सल मुक्त हो चुका है।
लेकिन पीएम मोदी ने साफ किया कि चुनौती पूरी तरह खत्म मान लेना सही नहीं होगा। उनके मुताबिक, हथियार छोड़ चुके नक्सलवाद के बाद ऐसी विचारधारा को बढ़ावा देने वाले लोगों पर नजर रखना जरूरी है। उन्होंने इसी संदर्भ में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसे लोग मौका मिलने पर समाज में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर सकते हैं।
यहां ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को समझना भी जरूरी है। यह सरकार की ओर से इस्तेमाल किया गया राजनीतिक शब्द है। पीएम मोदी ने इसे उन लोगों के संदर्भ में इस्तेमाल किया, जिन पर उनका आरोप है कि वे नक्सली या माओवादी विचारधारा को किसी न किसी रूप में समर्थन देते हैं। हालांकि, विपक्ष ने प्रधानमंत्री के इस बयान पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने इसे प्रधानमंत्री की हताशा का संकेत बताया है।
नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की कार्रवाई की बात करें तो पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ प्रभावित इलाकों में सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य और दूसरी सुविधाओं पर भी जोर दिया गया है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2025 तक नक्सलवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों की संख्या छह से घटकर तीन रह गई थी। उस समय बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर को सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में बताया गया था।
इसके बाद 31 मार्च 2026 को सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ अपने अभियान की बड़ी सफलता का दावा किया। मई में अमित शाह ने बस्तर में कहा कि नक्सलवाद को खत्म करने का लक्ष्य समय से पहले पूरा कर लिया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि करीब 3,000 आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों के पुनर्वास और कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा रही है।
अब प्रधानमंत्री मोदी के ताजा बयान से नक्सलवाद को लेकर बहस का एक नया पहलू सामने आया है। सरकार का कहना है कि सिर्फ हथियारबंद समूहों के खिलाफ कार्रवाई करना काफी नहीं है, बल्कि उस विचारधारा से भी निपटना जरूरी है जो हिंसा को बढ़ावा देती है। वहीं विपक्ष इस तरह की भाषा को राजनीतिक हमला मान रहा है।
स्वतंत्रता दिवस के भाषण में पीएम मोदी का संदेश साफ था कि सरकार नक्सलवाद को लेकर अपनी नीति में कोई ढील नहीं देना चाहती। अब देखना होगा कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर आगे राजनीतिक बहस किस दिशा में जाती है और सरकार इस चुनौती से निपटने के लिए क्या कदम उठाती है।
