भारत में पीएम पोषण स्कीम के तहत 10 करोड़ से ज्यादा बच्चों को खाना मिलता है | Source: AajTak

भारत में पीएम पोषण स्कीम के तहत 10 करोड़ से ज्यादा बच्चों को खाना मिलता है Source : AajTak

नई दिल्ली: देशभर के सरकारी स्कूलों में मिलने वाला मिड-डे मील (अब पीएम पोषण योजना) एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह तमिलनाडु सरकार का वह प्रस्ताव है, जिसमें सप्ताह में एक दिन बच्चों को चिकन बिरयानी परोसने की बात कही गई है। वहीं, पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील में अंडे को हटाने और फिर दोबारा शामिल किए जाने को लेकर भी बहस तेज हो गई है। ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि जिस योजना का उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना था, उसकी शुरुआत कैसे हुई और वर्षों में उसका मेन्यू किस तरह बदलता गया।

1920 से शुरू हुई थी पहल, 1995 में बनी राष्ट्रीय योजना

मिड-डे मील योजना का इतिहास आजादी से भी पहले का है। वर्ष 1920 में तत्कालीन मद्रास नगर निगम ने पहली बार स्कूलों में बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने की पहल की थी। इसके बाद 1956 में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. कामराज ने स्कूल फीडिंग योजना शुरू की। वहीं 1961 में केरल में भी स्कूल लंच कार्यक्रम की शुरुआत हुई, जिसे 1984 में राज्य सरकार ने आधिकारिक रूप से अपने हाथ में ले लिया।

इसके बाद कई अन्य राज्यों ने भी ऐसी योजनाएं शुरू कीं और अंततः 1995 में केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया। इस योजना का उद्देश्य बच्चों में कुपोषण कम करना, स्कूलों में नामांकन बढ़ाना, ड्रॉपआउट घटाना और नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना था। शुरुआत में यह योजना कक्षा 1 से 5 तक के छात्रों के लिए थी, लेकिन 2007 में इसे बढ़ाकर कक्षा 8 तक कर दिया गया।

साल 2021 में केंद्र सरकार ने इस योजना का नाम बदलकर ‘प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (पीएम पोषण)’ कर दिया। वर्तमान में इस योजना के तहत देशभर में करीब 12 करोड़ बच्चों को प्रत्येक स्कूल दिवस पर पका हुआ भोजन उपलब्ध कराया जाता है, जिससे यह दुनिया की सबसे बड़ी स्कूल पोषण योजनाओं में शामिल है।

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शुरुआत में क्या मिलता था, अब कितना बदल गया मेन्यू?

मिड-डे मील की शुरुआत के समय बच्चों को पका हुआ भोजन नहीं दिया जाता था। उस समय प्रत्येक छात्र को प्रति स्कूल दिवस 100 ग्राम चावल या अनाज उपलब्ध कराया जाता था। बाद में अदालत के निर्देशों के बाद स्कूलों में पका हुआ भोजन परोसने की व्यवस्था लागू की गई।

शुरुआती वर्षों में भोजन में मुख्य रूप से चावल या गेहूं, दाल और मौसमी सब्जियां शामिल होती थीं। समय के साथ राज्यों ने अपने बजट, स्थानीय खानपान और पोषण आवश्यकताओं के अनुसार मेन्यू में बदलाव किए। कई राज्यों ने दूध, केला, अंडा, चिक्की, पनीर और मशरूम जैसी चीजें भी शामिल करनी शुरू कर दीं।

तमिलनाडु, जिसने इस योजना को सबसे पहले व्यापक रूप से लागू किया था, वहां शुरुआती दौर में बच्चों को चावल और सांभर दिया जाता था। बाद में भोजन में तेल और मसालों से तैयार अन्य व्यंजन शामिल हुए। 1989 में सप्ताह में एक दिन अंडा देने की शुरुआत हुई, जिसे बाद में बढ़ाकर लगभग प्रतिदिन कर दिया गया। अब राज्य सरकार ने सप्ताह में एक दिन चिकन बिरयानी शामिल करने का प्रस्ताव भी रखा है, जिससे यह योजना एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई है।

अंडे और चिकन को लेकर क्यों होता है विवाद?

मिड-डे मील का मेन्यू लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक बहस का विषय रहा है। खासकर अंडे को शामिल करने या हटाने को लेकर कई राज्यों में विवाद होते रहे हैं। वर्तमान में केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, असम, बिहार, त्रिपुरा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, मेघालय, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में बच्चों को अंडा दिया जाता है। हालांकि इसकी आवृत्ति हर राज्य में अलग-अलग है। कहीं सप्ताह में एक दिन, तो कहीं कई दिनों तक अंडा परोसा जाता है। कुछ राज्यों में स्कूलों को अंडे के लिए अलग से बजट भी उपलब्ध कराया जाता है।

वहीं गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, दिल्ली और गोवा जैसे राज्यों में पूरी तरह शाकाहारी भोजन परोसा जाता है। यहां बच्चों को दाल, चावल, रोटी, खिचड़ी, मौसमी सब्जियां और कुछ जगहों पर दूध उपलब्ध कराया जाता है।

पोषण मानकों के अनुसार तय होता है मेन्यू

हालांकि हर राज्य का मेन्यू अलग होता है, लेकिन केंद्र सरकार ने पोषण संबंधी न्यूनतम मानक तय किए हैं। प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को दिए जाने वाले भोजन में कम से कम 450 कैलोरी और 12 ग्राम प्रोटीन होना अनिवार्य है। वहीं उच्च प्राथमिक कक्षाओं के छात्रों के लिए भोजन में 700 कैलोरी और 20 ग्राम प्रोटीन सुनिश्चित किया जाता है। भोजन में चावल, दाल, सब्जियां, तेल और अन्य पोषक तत्वों का संतुलित मिश्रण रखने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि बच्चों को आवश्यक पोषण मिल सके।

क्या किसी और राज्य में भी मिलता है चिकन?

फिलहाल देश में लक्षद्वीप एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जहां मिड-डे मील के तहत बच्चों को चिकन भी परोसा जाता है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल में सीमित मात्रा में पनीर और मशरूम, जबकि आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में बच्चों को चिक्की भी उपलब्ध कराई जाती है। तमिलनाडु का चिकन बिरयानी प्रस्ताव लागू होता है या नहीं, इस पर अंतिम फैसला अभी होना बाकी है। हालांकि इस प्रस्ताव ने एक बार फिर मिड-डे मील के मेन्यू, पोषण और शिक्षा नीति को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है।