नई दिल्ली। लोकसभा और विधानसभा की आरक्षित सीटों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत से एक बेहद अहम कानूनी संदेश सामने आया है। दशकों से एक ही सीट के आरक्षित रहने और उसमें रोटेशन (बारी-बारी से बदलाव) लागू करने की मांग लेकर पहुंचे याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि आरक्षित सीटों के नियमों और परिसीमन के प्रावधानों में बदलाव करना सिर्फ और सिर्फ संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
70 साल से एक ही सीट आरक्षित, मतदाता की क्या थी दलील?
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़ा है। स्थानीय मतदाता जगदीश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दलील दी थी कि कादीपुर सीट गठन के बाद से पिछले करीब सात दशकों से अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है।
याचिकाकर्ता का कहना था कि लगातार एक ही क्षेत्र को आरक्षित रखने से पंचायतों की तरह रोटेशन लागू न होने के कारण संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 का उल्लंघन होता है। इससे सामान्य वर्ग के मतदाताओं को अपनी पसंद का प्रतिनिधि चुनने का अवसर नहीं मिलता और आरक्षण का लाभ कुछ ही परिवारों तक सीमित रह जाता है।
परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) को चुनौती
याचिका में परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था। इस प्रावधान के तहत SC और ST की अधिक आबादी वाले क्षेत्रों को चिन्हित कर सीट आरक्षित की जाती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले ही इस प्रावधान को वैध ठहराते हुए रोटेशन का आदेश देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद मामला देश की सर्वोच्च अदालत पहुंचा, जहां सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया।
‘गलत नंबर मिला दिया है...’, सुप्रीम कोर्ट का सख्त टिप्पणी के साथ परामर्श
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की मांग को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश ने हल्के-फुल्के लेकिन स्पष्ट शब्दों में कहा कि याचिकाकर्ता ने "गलत नंबर मिला दिया है"।
सीजेआई ने टिप्पणी की कि आरक्षित सीटों पर रोटेशन लागू करने का फैसला अदालतों का नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों और संसद का है। पीठ ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता अपनी मांग को लेकर संसद सदस्यों और जनप्रतिनिधियों से संपर्क करें और कानून में संशोधन के लिए राजनीतिक व सामाजिक सहमति बनाएं।
मतदाता केवल जाति नहीं, विचारधारा पर भी वोट करते हैं: जस्टिस बागची
सुनवाई के दौरान पीठ के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने बहुदलीय लोकतंत्र के सिद्धांतों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह मान लेना सही नहीं है कि किसी आरक्षित सीट पर मतदाता केवल जाति के आधार पर वोट करते हैं। लोकतंत्र में जनता राजनीतिक दलों और उनकी नीतियों के आधार पर भी अपना प्रतिनिधि चुनती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी विशेष सीट से चुनाव लड़ने का अधिकार संवैधानिक मतदान के अधिकार के समान नहीं है, क्योंकि गैर-आरक्षित उम्मीदवार अन्य सामान्य सीटों से चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र हैं।
न्यायपालिका विधायिका को कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के तहत आरक्षित सीटों की व्यवस्था और परिसीमन कानून का निर्धारण विधायिका का काम है। अदालतें कानून में अपने मन से रोटेशन की कोई नई शर्त नहीं जोड़ सकतीं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी माना था कि सामाजिक न्याय के लिहाज से रोटेशन एक बेहतर नीति हो सकती है, लेकिन यह नीति लागू करने की शक्ति केवल देश की संसद के पास सुरक्षित है।
