erere | Source: ererनई दिल्ली/मऊगंज/खरगोन। दिल्ली के जंतर-मंतर पर राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शनों के बीच मध्य प्रदेश की दो होनहार छात्राओं आकांक्षा (स्नेहा) चतुर्वेदी और अवंतिका मौर्य के परिवारों का दर्द एक बार फिर सामने आ गया। छात्रों के आंदोलन में न्याय, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग जोर-शोर से उठी, लेकिन इन दोनों परिवारों के लिए यह मुद्दा सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि जिंदगी भर का ऐसा जख्म है, जो समय के साथ भी नहीं भर सका। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलन भले समाप्त हो गया हो, लेकिन इन परिवारों का कहना है कि उनकी बेटियां अब कभी वापस नहीं लौट सकतीं।

डॉक्टर बनने का सपना था, लेकिन विवाद ने बदल दी जिंदगी

मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले के मगनिया गांव की रहने वाली 18 वर्षीय आकांक्षा उर्फ स्नेहा चतुर्वेदी डॉक्टर बनने का सपना लेकर नागपुर में रहकर NEET-UG की तैयारी कर रही थीं। परिजनों के अनुसार उन्हें परीक्षा में करीब 650 अंक मिलने की उम्मीद थी और परिवार को विश्वास था कि उनकी मेहनत रंग लाएगी।

परिवार का आरोप है कि परीक्षा से जुड़े विवाद और भविष्य को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता के कारण आकांक्षा गहरे मानसिक तनाव में चली गईं। इसी तनाव के बीच उन्होंने अपनी जान गंवा दी। परिजनों का दावा है कि उन्होंने अपने पीछे एक नोट भी छोड़ा था, जिसमें दोबारा परीक्षा देने का साहस न होने की बात लिखी थी। इस घटना ने प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर पूरे देश में गंभीर बहस छेड़ दी।

बेटी के सपने के लिए बिक गए खेत और गहने

आकांक्षा के पिता कृष्ण कुमार चतुर्वेदी एक छोटे किसान हैं। परिवार ने बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए अपनी आर्थिक क्षमता से कहीं अधिक संघर्ष किया। परिजनों के अनुसार पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए कर्ज लिया गया, उधार किया गया और परिवार की जमीन तथा गहने तक बेच दिए गए।

आकांक्षा के नागपुर में रहने और पढ़ाई का खर्च चलाने के लिए पिता ने कैटरिंग का काम भी किया। परिवार का कहना है कि बेटी के उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किया, लेकिन अंत में उन्हें असहनीय दुख का सामना करना पड़ा।

बेटी के जाने के बाद पिता भी हो गए गंभीर रूप से बीमार

परिजनों के अनुसार आकांक्षा की मौत की खबर मिलने के बाद उनके पिता को ब्रेन हेमरेज हुआ, जिसके बाद वह लकवाग्रस्त हो गए। लंबे समय से उनका इलाज चल रहा है। परिवार की बची हुई जमा पूंजी भी अब इलाज में खर्च हो रही है।

आकांक्षा की मां नीलम ने बताया कि बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए परिवार ने खेत और गहने बेच दिए थे, लेकिन आज न बेटी रही और न ही खेत। उन्होंने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से उनकी बेटी वापस नहीं आ सकती, लेकिन उनकी इच्छा है कि पेपर लीक के दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले। उनका मानना है कि तभी उनकी बेटी की आत्मा को सच्ची शांति मिल सकेगी।

अवंतिका मौर्य की कहानी भी उतनी ही दर्दनाक

NEET विवाद के दौरान ही मध्य प्रदेश के खरगोन की रहने वाली 23 वर्षीय अवंतिका मौर्य ने भी इंदौर में तीसरी मंजिल से कूदकर अपनी जान गंवा दी थी। वह अपने पिता की तरह डॉक्टर बनना चाहती थीं और इसी लक्ष्य को लेकर लगातार तैयारी कर रही थीं।

अवंतिका के पिता डॉ. बंशी मौर्य ने बताया कि परीक्षा से जुड़े विवाद के बाद उनकी बेटी पूरी तरह बदल गई थी। उसने लोगों से बातचीत करना लगभग बंद कर दिया था, खाना-पीना छोड़ दिया था और लगातार मानसिक तनाव में रहने लगी थी। परिवार का कहना है कि बाद में सरकार ने परीक्षा व्यवस्था को लेकर कई फैसले किए, लेकिन उनकी बेटी अब कभी वापस नहीं आ सकती।

मां आज भी बेटी की तस्वीर नहीं देख पाती

अवंतिका की मां आज भी अपनी बेटी की तस्वीर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं। परिवार का कहना है कि घर में रखी तस्वीरें और पुराने एल्बम तक छिपाकर रख दिए गए हैं क्योंकि उन्हें देखते ही मां की तबीयत बिगड़ जाती है। परिवार के लिए बेटी की याद आज भी असहनीय पीड़ा का कारण बनी हुई है।

जंतर-मंतर के आंदोलन ने फिर ताजा कर दिए पुराने जख्म

दिल्ली के जंतर-मंतर पर परीक्षा प्रणाली में सुधार, पारदर्शिता और कथित पेपर लीक के विरोध में हुए आंदोलन ने इन दोनों परिवारों के दर्द को एक बार फिर सामने ला दिया। आंदोलन के दौरान छात्रों ने जवाबदेही और निष्पक्ष परीक्षा व्यवस्था की मांग उठाई, वहीं आकांक्षा और अवंतिका के परिवारों ने उम्मीद जताई कि भविष्य में ऐसी व्यवस्था बने, जिसमें किसी छात्र का सपना परीक्षा प्रणाली से जुड़े विवादों के कारण न टूटे।

अब भी जवाब तलाश रहे हैं परिवार

आकांक्षा और अवंतिका इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके परिवारों के मन में आज भी कई सवाल हैं। उनका कहना है कि ऐसी परीक्षा व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें मेहनत करने वाले छात्रों का भविष्य सुरक्षित रहे और किसी भी छात्र या उसके परिवार को ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े। उनका मानना है कि यदि परीक्षा प्रणाली अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनेगी, तो भविष्य में किसी भी परिवार को अपनी संतान को इस तरह खोने का दर्द नहीं सहना पड़ेगा।