पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची में भारी गड़बड़ियों ने बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से गायब होने के बाद मतदाताओं में चिंता बढ़ गई है और चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी ट्रिब्यूनलों ने लाखों अपीलें सुनीं, लेकिन बहुत कम नाम वापस जोड़े गए। इससे यह बहस तेज हो गई है कि क्या (SIR) प्रक्रिया जल्दबाज़ी में और बिना पर्याप्त जांच के चलाई गई थी।


34 लाख अपीलें, सिर्फ 1,607 नाम जुड़े

चुनाव आयोग के मुताबिक बंगाल में वोटर लिस्ट को लेकर अब तक 34 लाख से ज़्यादा अपीलें दायर हुईं, लेकिन दो अतिरिक्त सूचियों में सिर्फ 1,607 नाम ही वापस जोड़े गए और 14 नाम हटाए गए। इतने बड़े अंतर के कारण कुल अपीलों का यह आंकड़ा 0.05% से भी कम बैठता है, जो SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता और सही तरीके पर गंभीर सवाल खड़े करता है।


91 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटे

SIR प्रक्रिया के दौरान पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से करीब 91 लाख नाम हटाए गए, जिनमें 63 लाख लोगों को ग़ैरहाज़िर, दूसरी जगह चले जाने, मृत या डुप्लीकेट बताया गया। बाक़ी 27 लाख नाम ‘तार्किक विसंगति’—जैसे स्पेलिंग मिसमैच की गलती, उम्र में अंतर, माता-पिता के नाम में मिसमैच या दस्तावेज़ों में फर्क के आधार पर हटाए गए, जबकि यह श्रेणी किसी और राज्य में लागू ही नहीं होती, जिससे संदेह और बढ़ गया।


ट्रिब्यूनल के फैसले और भी उलझाने वाले

अब तक हुए फैसलों में हर 1 नाम हटाए जाने पर 115 नाम वापस जुड़े, जो खुद ही पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि या तो नाम हटाने का काम जल्दबाज़ी में हुआ या ट्रिब्यूनलों को अपीलें निपटाने के लिए पर्याप्त समय और संसाधन ही नहीं मिले।


कई मतदाता अब भी असमंजस में किसी को अपडेट नहीं मिला

मुर्शिदाबाद नगरपालिका चेयरमैन इंजामुल इस्लाम का नाम तो सूची में वापस जुड़ गया, लेकिन उनके दो भाइयों का मामला अब भी लंबित है, जबकि सिर्फ़ सम्सेरगंज में ही 74,775 नाम हटाए गए जो पूरे राज्य में सबसे बड़ा आंकड़ा है।


हर दिन 150–200 शिकायतें: लोग अपील प्रक्रिया नहीं समझ पा रहे

वोटर लिस्ट का अध्ययन करने वाले सबीर अहमद के अनुसार हालात बहुत गंभीर हैं।

उन्हें हर दिन 150–200 लोगों के फोन आ रहे हैं, जिनमें ज्यादातर लोग यह बता रहे हैं कि वे अपील लिख ही नहीं पा रहे।क्योंकि अपील में लगभग 1,000 शब्दों में अपना पक्ष लिखना होता है, जो आम लोगों खासकर ग्रामीणों के लिए बहुत मुश्किल है।शहरों में कुछ हद तक कानूनी सहायता मिल जाती है,लेकिन गाँवों में लोगों को मदद भी नहीं मिल पा रही,जिसके कारण भ्रम और तनाव दोनों बढ़ रहे हैं।सबसे बड़ी समस्या यह है कि एक ही परिवार के कुछ सदस्यों के नाम कट गए और कुछ के नहीं, जिससे लोगों में और ज्यादा कन्फ्यूजन फैल गया है।


65 प्रिसाइडिंग अधिकारियों के नाम भी हटे

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ‘तार्किक विसंगति’ बताकर चुनाव प्रक्रिया संभालने वाले 65 प्रिसाइडिंग अधिकारियों के भी नाम काट दिए गए।ये वही अधिकारी हैं जो चुनाव के दिन बूथ की जिम्मेदारी संभालते हैं।

अख़्तर अली मुर्शिदाबाद के रहने वाले पेशे से शिक्षक 4 चुनावों में प्रिसाइडिंग ऑफिसर रहे फिर भी उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया।उन्होंने सारे दस्तावेज़ भी दिए।लेकिन अपील इसलिए खारिज कर दी गई कि पिता के नाम की स्पेलिंग मिसमैच है।

मोहम्मद मोसेलुद्दीन सुवानी का परिवार

उनके परिवार में 6 लोगों के नाम इसलिए हटाए गए क्योंकि दस्तावेज़ में पिता के 6 बच्चे दर्ज थे

इसे अधिकारियों ने “विसंगति” मान लिया।


सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी बूथ पर नाम गायब

88 वर्षीय सुप्रबुद्धा सेन जो महान कलाकार नंदलाल बोस के पोते हैं उनकी स्थिति भी इस गड़बड़ी की गंभीरता दिखाती है।ट्रिब्यूनल ने उनका नाम वापस जोड़ने का आदेश दिया था,लेकिन मतदान के दिन जब वे बूथ पहुँचे,वोटर लिस्ट में उनका नाम था ही नहीं।

काफी बहस और जाँच के बाद उन्हें शाम 4:30 बजे विशेष अनुमति देकर वोट डालने दिया गया।यह घटना साफ़ दिखाती है कि काग़ज़ पर दिए गए आदेश और ज़मीनी स्तर पर होने वाले काम में भारी अंतर है।


क्या SIR प्रक्रिया जल्दबाज़ी में लागू हुई?

विशेषज्ञों का कहना है कि SIR प्रक्रिया में कई ऐसी कमियाँ रहीं, जो दिखाती हैं कि इसे तेज़ी और बिना पूरी तैयारी के लागू किया गया। समस्याएँ ये थीं कि दस्तावेज़ जाँचने के लिए बहुत कम समय मिलाकई असल मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हुए,पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी दिखाई दी,अंतिम समय में जारी सूचियों ने लोगों को कन्फ्यूज किया।सबसे बड़ा सबूत यह है कि 34 लाख अपीलों में से सिर्फ 1,607 नाम ही वापस जुड़े,जो बताता है कि SIR प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ हैं।

इन्हीं कारणों से अब मतदाता अधिकार,चुनाव आयोग की विश्वसनीयता,और पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर चुनाव से ठीक पहले बड़ी बहस खड़ी हो गई है।