महाराष्ट्र को देश के सबसे विकसित और समृद्ध राज्यों में गिना जाता है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और आईटी हब पुणे जैसे बड़े शहर इसी राज्य में स्थित हैं। उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मामले में महाराष्ट्र अक्सर दूसरे राज्यों के लिए उदाहरण माना जाता है। लेकिन इसी विकसित राज्य की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने सरकार, समाजशास्त्रियों और जनसंख्या विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक महाराष्ट्र में बेटियों के जन्म का अनुपात राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब देशभर में "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

क्या कहती है सरकारी रिपोर्ट?

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में जन्म के समय लिंगानुपात (Sex Ratio at Birth) चिंताजनक स्तर पर बना हुआ है। वर्ष 2020 से 2022 के बीच राज्य में हर 1,000 लड़कों पर केवल 899 लड़कियों का जन्म दर्ज किया गया। जबकि इसी अवधि में राष्ट्रीय औसत 918 लड़कियां प्रति 1,000 लड़के रहा। इसका अर्थ है कि महाराष्ट्र राष्ट्रीय औसत से करीब 19 अंक पीछे है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी समाज में जन्म के समय लिंगानुपात लगातार कम रहता है तो भविष्य में उसका सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है। यह केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं बल्कि समाज की मानसिकता और महिलाओं के प्रति नजरिए को भी दर्शाता है।

विकास के बावजूद क्यों नहीं बदल रही सोच?

महाराष्ट्र लंबे समय से शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास के क्षेत्र में अग्रणी राज्यों में शामिल रहा है। इसके बावजूद बेटियों के जन्म में गिरावट यह सवाल खड़ा करती है कि क्या आर्थिक विकास वास्तव में सामाजिक सोच को बदलने में सफल हुआ है?

विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक प्रगति और लैंगिक समानता हमेशा साथ-साथ नहीं चलती। कई बार अधिक आय और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं तक आसान पहुंच का गलत इस्तेमाल भी देखने को मिलता है। यही कारण है कि महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्य में भी बेटियों के जन्म का अनुपात अपेक्षाकृत कम बना हुआ है।

सबसे चौंकाने वाला तथ्य: शहरों की हालत गांवों से खराब

रिपोर्ट का सबसे बड़ा खुलासा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के आंकड़ों में दिखता है। आमतौर पर यह माना जाता है कि शहरों में लोग अधिक शिक्षित और जागरूक होते हैं, लेकिन महाराष्ट्र के आंकड़े इस धारणा को चुनौती देते हैं।

ग्रामीण महाराष्ट्र में जन्म के समय लिंगानुपात 910 है, यानी हर 1,000 लड़कों पर 910 लड़कियां जन्म ले रही हैं। दूसरी ओर शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा घटकर मात्र 885 रह गया है।

यह अंतर बताता है कि शहरों में आधुनिक तकनीकों और चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता के बावजूद बेटियों के प्रति भेदभाव समाप्त नहीं हुआ है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ मामलों में यही तकनीकी सुविधाएं भ्रूण के लिंग की अवैध जांच और चयनात्मक गर्भपात को बढ़ावा देती हैं।

क्या बेटा पाने की चाहत है मुख्य वजह?

जनसंख्या विशेषज्ञों का मानना है कि आज भी भारतीय समाज के कई हिस्सों में बेटे को परिवार का वारिस, बुजुर्गों का सहारा और वंश आगे बढ़ाने वाला माना जाता है। वहीं बेटियों को लेकर पारंपरिक सोच पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। जब परिवार छोटा रखने की प्रवृत्ति बढ़ती है और साथ ही बेटे की इच्छा बनी रहती है, तब कई परिवार किसी भी कीमत पर कम से कम एक बेटा चाहते हैं। यही सोच लिंगानुपात को प्रभावित करती है। महाराष्ट्र में कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) लगभग 1.5 तक पहुंच चुकी है। इसका मतलब है कि अधिकांश परिवार अब एक या दो बच्चों तक ही सीमित हैं। ऐसे में यदि परिवार बेटा चाहता है तो बेटियों के जन्म की संभावना पर सामाजिक दबाव बढ़ जाता है।

कानून होने के बावजूद क्यों नहीं रुक रही समस्या?

भारत में भ्रूण के लिंग की जांच और उसके आधार पर गर्भपात कराना पूरी तरह गैरकानूनी है। इसके लिए PCPNDT Act लागू है, जिसके तहत लिंग परीक्षण कराने और करवाने वालों पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। इसके बावजूद समय-समय पर विभिन्न राज्यों में अवैध लिंग जांच रैकेट पकड़े जाते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक कानून के साथ-साथ सामाजिक मानसिकता में बदलाव नहीं आएगा, तब तक केवल कानूनी कार्रवाई से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।

दूसरे राज्यों से क्या सीख सकता है महाराष्ट्र?

जहां महाराष्ट्र इस समस्या से जूझ रहा है, वहीं कुछ राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। छत्तीसगढ़ में हर 1,000 लड़कों पर लगभग 978 लड़कियां जन्म ले रही हैं। वहीं केरल में यह आंकड़ा 974 है। इन राज्यों में शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों का सकारात्मक असर देखने को मिला है। इसके विपरीत उत्तराखंड, दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों में भी लिंगानुपात को लेकर गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं।