कई बीमारियां ऐसी होती हैं जो अचानक गंभीर लक्षणों के साथ सामने आती हैं, इसलिए लोग उन्हें जल्दी पहचान लेते हैं। लेकिन कुछ बीमारियां चुपचाप शरीर में अपनी जगह बना लेती हैं और उनके शुरुआती संकेत इतने सामान्य लगते हैं कि लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) ऐसी ही एक बीमारी है। भारत में आज भी इसके कई मामले समय पर पकड़ में नहीं आते, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षणों को अक्सर तनाव, कमजोरी, थकान या पोषण की कमी समझ लिया जाता है। यही वजह है कि कई मरीज सही बीमारी का पता चलने से पहले वर्षों तक भटकते रहते हैं।
क्या होते हैं मल्टीपल स्क्लेरोसिस के शुरुआती लक्षण?
हाथ या पैरों में झनझनाहट होना, कुछ दिनों तक धुंधला दिखाई देना, अचानक चक्कर आना या लगातार थकान महसूस होना ऐसे संकेत हैं जिन्हें लोग आम समस्या मान लेते हैं। कई बार ये लक्षण कुछ समय बाद अपने आप ठीक भी हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति को लगता है कि अब सब सामान्य है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यही सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है। शरीर में दिखाई देने वाला यह छोटा बदलाव दिमाग और रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करने वाली गंभीर बीमारी का शुरुआती संकेत हो सकता है।
क्यों देर से पता चलते हैं इसके मामले?
डॉ. अंशु रस्तोगी बताती हैं कि भारत में मल्टीपल स्क्लेरोसिस के कई मामले इसलिए सामने नहीं आ पाते क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण बहुत हल्के और अस्थायी होते हैं। मरीजों को हाथ-पैरों में झनझनाहट, मांसपेशियों में जकड़न, सुन्नपन, कुछ समय के लिए धुंधला दिखना, चक्कर आना या बिना वजह थकान महसूस हो सकती है। कई बार ये समस्याएं कुछ दिनों या हफ्तों में कम हो जाती हैं, इसलिए लोग मान लेते हैं कि बीमारी खत्म हो गई। जबकि हकीकत में यह नसों को नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रिया का संकेत हो सकता है।
क्या है मल्टीपल स्क्लेरोसिस?
मल्टीपल स्क्लेरोसिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) गलती से नसों की सुरक्षा करने वाली परत पर हमला करने लगती है। इससे दिमाग और शरीर के बाकी हिस्सों के बीच संदेश पहुंचाने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। समस्या यह है कि हर मरीज में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। किसी को नजर से जुड़ी परेशानी हो सकती है, किसी को संतुलन बनाने में दिक्कत हो सकती है, जबकि कुछ लोगों में शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन या कमजोरी महसूस हो सकती है। यही कारण है कि बीमारी की पहचान करना कई बार मुश्किल हो जाता है।
किस उम्र के लोगों में ज्यादा देखा जाता है यह रोग?
विशेषज्ञों के अनुसार 20 से 40 साल की उम्र के लोगों में यह बीमारी ज्यादा देखी जाती है और महिलाओं में इसके मामले पुरुषों की तुलना में अधिक पाए जाते हैं। लेकिन इस आयु वर्ग के लोगों में थकान, चक्कर, कमजोरी या मनोदशा में बदलाव जैसी समस्याओं को अक्सर काम के दबाव, चिंता या शरीर में पोषक तत्वों की कमी से जोड़ दिया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई मरीज कई बार बीमारी के दौर से गुजरने के बाद ही न्यूरोलॉजिस्ट या विशेषज्ञ चिकित्सक तक पहुंच पाते हैं। तब तक बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है।
भारत में क्या है इस बीमारी की स्थिति?
भारत में लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि मल्टीपल स्क्लेरोसिस बहुत कम लोगों को होने वाली बीमारी है। इसी सोच के कारण इसके प्रति जागरूकता भी सीमित रही। हालांकि अब जांच सुविधाओं और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के उपचार में बढ़ोतरी के बाद पहले की तुलना में ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। फिर भी छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में विशेषज्ञ चिकित्सकों तथा बेहतर जांच सुविधाओं की कमी के कारण मरीजों को सही इलाज तक पहुंचने में काफी समय लग जाता है।
Disclaimer:-यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें। किसी भी स्वास्थ्य समस्या, नई गतिविधि या उपचार को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।
