नवीदुल हसन

उत्तर प्रदेश में वोटर लिस्ट से 2.89 करोड़ नाम हटाए गए, लखनऊ में सबसे ज्यादा कटौती

उत्तर प्रदेश में चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद मतदाता सूची का ड्राफ्ट जारी कर दिया है। इस प्रक्रिया के तहत राज्य की वोटर लिस्ट से करीब 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि यह कदम मतदाता सूची को सही और अपडेट रखने के लिए उठाया गया है।

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उनमें से करीब 2.17 करोड़ लोग ऐसे हैं जो अब उस पते पर नहीं रहते, यानी उन्होंने दूसरी जगह अपना निवास बदल लिया है। इसके अलावा 46.23 लाख मतदाता मृत पाए गए, जबकि 25.47 लाख मतदाता एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत थे। इन सभी कारणों के चलते उनके नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए हैं।

चुनाव आयोग ने बताया कि उत्तर प्रदेश में SIR की घोषणा 27 अक्टूबर 2025 को की गई थी। उस समय राज्य में कुल 15.44 करोड़ पंजीकृत मतदाता थे। सत्यापन के लिए हर मतदाता का अलग-अलग फॉर्म छपवाया गया और बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) को घर-घर जाकर जांच करने की जिम्मेदारी दी गई।

इस दौरान करीब 12.55 करोड़ मतदाताओं के फॉर्म वापस मिले, जो कुल मतदाताओं का लगभग 81 प्रतिशत है। लेकिन करीब 18.7 प्रतिशत मतदाताओं के फॉर्म जमा नहीं हो पाए, जिसके कारण उनके नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल नहीं किए गए।

आंकड़ों के अनुसार, राज्य के कई जिलों में मतदाताओं की संख्या में कमी दर्ज की गई है। राजधानी लखनऊ में मतदाताओं की संख्या पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है। इसी तरह कुछ अन्य जिलों में भी हजारों नाम हटाए गए हैं, हालांकि कमी का प्रतिशत अलग-अलग जिलों में अलग है।

इस पूरी प्रक्रिया में समय भी ज्यादा लगा। शुरुआत में चुनाव आयोग ने सत्यापन के लिए सिर्फ एक हफ्ते का समय तय किया था, लेकिन काम का बोझ ज्यादा होने और BLO की सीमित संख्या के कारण समयसीमा को कई बार बढ़ाया गया। इसके अलावा नए पोलिंग स्टेशन बनने और डाटा शिफ्टिंग जैसी तकनीकी दिक्कतों के चलते भी देरी हुई।

चुनाव आयोग ने साफ किया है कि यह सिर्फ ड्राफ्ट मतदाता सूची है। जिन लोगों के नाम गलती से हट गए हैं, उन्हें दावा और आपत्ति दर्ज कराने का मौका दिया जाएगा। सभी आपत्तियों की जांच के बाद 6 मार्च को अंतिम मतदाता सूची जारी की जाएगी।

वहीं, वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में नाम हटने को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। विपक्षी दलों का कहना है कि इस प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, जबकि चुनाव आयोग ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बताया है।