सबा फिरदौस
जातिगत भेदभाव को समाज से समाप्त करने के लिए सबसे पहले लोगों की सोच से जाति को मिटाना आवश्यक है। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने कही।
उन्होंने कहा कि यदि समाजिक व्यवहार में फैले जाति-आधारित भेदभाव को खत्म करना है, तो इसकी शुरुआत व्यक्ति के मन और सोच से होनी चाहिए। आरएसएस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित जन संगोष्ठी कार्यक्रम में, शनिवार 17 जनवरी 2026 को आम लोगों से संवाद करते हुए उन्होंने यह विचार रखे।
मोहन भागवत ने बताया कि पहले जाति का संबंध कार्य और पेशे से जुड़ा होता था, लेकिन समय के साथ यह समाज में गहराई से स्थापित हो गई और भेदभाव का कारण बन गई। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे जाति व्यवस्था को अपने मन से निकालें।
उन्होंने कहा, “यदि ईमानदारी से जाति को सोच से हटा दिया जाए, तो आने वाले 10 से 12 वर्षों में जातिगत भेदभाव पूरी तरह समाप्त हो सकता है।”
सवाल-जवाब के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि संघ का उद्देश्य समाज के साथ मिलकर देश को उसकी सर्वोच्च स्थिति तक पहुँचाना है।
“संघ व्यक्ति के चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का कार्य करता है। यह न तो किसी प्रतिक्रिया में बना संगठन है और न ही किसी से प्रतिस्पर्धा करता है,” उन्होंने कहा।
संघ की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए मोहन भागवत ने कहा,
“संघ स्वयं बड़ा बनना नहीं चाहता, बल्कि पूरे समाज को सशक्त और बड़ा बनाना चाहता है, ताकि समाज के साथ मिलकर भारत को उसके गौरवशाली लक्ष्य तक ले जाया जा सके।”
अंत में उन्होंने कहा कि जो लोग संघ को सही रूप में समझना चाहते हैं, उन्हें उसकी शाखाओं से जुड़ना चाहिए।
