15 वर्षीय नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात मामले में Supreme Court of India और All India Institute of Medical Sciences के बीच अहम कानूनी और मेडिकल बहस सामने आई। पीड़िता करीब 28–30 हफ्ते की गर्भवती थी और उसने कोर्ट से गर्भपात की अनुमति मांगी थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसकी मानसिक और शारीरिक स्थिति पर विशेष ध्यान दिया। रिपोर्ट्स में सामने आया कि लड़की मानसिक रूप से काफी परेशान थी, जिससे उसकी हालत और बिगड़ सकती थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी महिला, खासकर नाबालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने इसे महिला के प्रजनन अधिकार (reproductive rights) और गरिमा से जुड़ा मुद्दा बताया, जो संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत आता है। कोर्ट ने यह भी माना कि इतनी कम उम्र में जबरन मातृत्व लड़की के मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य पर गंभीर असर डाल सकता है।
दूसरी तरफ, AIIMS ने कोर्ट में चिंता जताई कि गर्भावस्था के इतने एडवांस स्टेज (तीसरी तिमाही) में गर्भपात कराना मेडिकल तौर पर जोखिम भरा हो सकता है। इससे मां की जान को खतरा हो सकता है और भविष्य में उसकी प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ सकता है। AIIMS ने इन आधारों पर कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए याचिका (curative/review petition) दाखिल की।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने AIIMS की आपत्तियों को खारिज करते हुए अपना फैसला बरकरार रखा। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह मामला केवल मेडिकल जोखिम का नहीं, बल्कि पीड़िता की मानसिक पीड़ा, गरिमा और अधिकारों का भी है। अदालत ने यह भी कहा कि जब गर्भ दुष्कर्म का परिणाम हो, तो कानून की समय-सीमा से ऊपर उठकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।
अंत में कोर्ट ने निर्देश दिया कि पूरी प्रक्रिया मेडिकल एक्सपर्ट्स की निगरानी में सुरक्षित तरीके से की जाए और पीड़िता व उसके परिवार की सहमति को प्राथमिकता दी जाए।
