महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक नई रिसर्च ने अहम निष्कर्ष सामने रखा है। IIT मद्रास के नेतृत्व में किए गए बहु-संस्थागत अध्ययन के अनुसार, पुलिस बल में महिला पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ने से जेंडर आधारित अपराधों की पीड़िताओं का पुलिस पर भरोसा मजबूत होता है, शिकायत दर्ज कराने की संभावना बढ़ती है और न्याय प्रक्रिया अधिक संवेदनशील बनती है। हालांकि, अध्ययन ने यह भी चेतावनी दी है कि ऐसे मामलों में केवल समझौता या मध्यस्थता पर अधिक निर्भरता कानूनी जवाबदेही को कमजोर कर सकती है। Women police recruitment

Women police recruitment

महिला पुलिस से बढ़ता है भरोसा और शिकायत दर्ज कराने का साहस

अध्ययन में बताया गया है कि भारत में जेंडर आधारित हिंसा के कई मामले सामाजिक दबाव, बदनामी के डर और पुलिस पर कम भरोसे के कारण दर्ज ही नहीं हो पाते। ऐसे में जब थानों में महिला पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ती है तो पीड़ित महिलाएं अपनी बात अधिक सहजता से रख पाती हैं। महिला अधिकारी संवेदनशील तरीके से शिकायत सुनती हैं, जिससे पीड़िताओं का आत्मविश्वास बढ़ता है और अपराधों की रिपोर्टिंग में भी वृद्धि होती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह बदलाव न्याय प्रणाली को अधिक पीड़ित-केंद्रित बना सकता है।

रिसर्च में सामने आई एक अहम चेतावनी भी

शोध में यह भी कहा गया है कि कई बार घरेलू हिंसा और जेंडर क्राइम के मामलों को एफआईआर की बजाय काउंसलिंग, समझौते या वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) के जरिए निपटाने की कोशिश की जाती है। यदि ऐसा हर मामले में किया जाए तो अपराधियों का मनोबल बढ़ सकता है और वे दोबारा अपराध करने से नहीं डरेंगे। इसलिए शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि पीड़िता की इच्छा को प्राथमिकता देते हुए गंभीर मामलों में कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

देशभर के विशेषज्ञों और पुलिस अधिकारियों से जुटाए गए आंकड़े

यह अध्ययन रिटायर्ड IPS अधिकारी प्रोफेसर पी. कंदास्वामी के नेतृत्व में किया गया। इसमें देशभर के पुलिस अधिकारियों के साथ फोकस ग्रुप चर्चा की गई और अपराध विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा कानूनी विशेषज्ञों की राय भी शामिल की गई। अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित पीयर-रिव्यू जर्नल Systems Research and Behavioral Science में प्रकाशित हुए हैं, जिससे इसकी विश्वसनीयता और बढ़ जाती है।

महिला भर्ती के साथ संस्थागत सुधार भी जरूरी

रिसर्च केवल महिला पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ाने की बात नहीं करती, बल्कि उनके प्रशिक्षण, नेतृत्व के अवसर, जवाबदेही तंत्र और संस्थागत समर्थन को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानती है। अध्ययन में स्वतंत्र अपराध ऑडिट, जन-जागरूकता अभियान, बेहतर दोषसिद्धि दर और महिला पुलिसकर्मियों के लिए अनुकूल कार्य वातावरण जैसे सुधारों की भी सिफारिश की गई है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इन कदमों से महिलाओं की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था दोनों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।