नई दिल्ली। देश में डिजिटल भुगतान का सबसे लोकप्रिय माध्यम बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव सामने आया है। संसद में पेश किए गए एक संशोधन विधेयक के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि भविष्य में 2,000 रुपये से अधिक के व्यावसायिक (बिजनेस) यूपीआई भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) शुल्क लगाया जा सकता है। हालांकि अभी इस संबंध में कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और यह केवल प्रस्तावित कानूनी बदलाव का हिस्सा है।
संसद में पेश हुआ संशोधन विधेयक
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल' पेश किया है। इस विधेयक में बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं पर इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों के लिए एमडीआर लगाने पर लगे प्रतिबंध को हटाने का प्रस्ताव शामिल है।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, यदि यह प्रावधान कानून का रूप लेता भी है, तब भी इसे कब और किस स्वरूप में लागू किया जाएगा, इस पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
क्या है एमडीआर और कौन देता है यह शुल्क?
एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) वह सेवा शुल्क होता है, जिसे दुकानदार या व्यापारी डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के बदले बैंक, पेमेंट एग्रीगेटर या पेमेंट सेवा प्रदाता को भुगतान करते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार यह शुल्क सीधे ग्राहकों से नहीं लिया जाएगा, बल्कि केवल व्यापारिक लेनदेन से जुड़े मर्चेंट पर लागू हो सकता है। व्यक्ति से व्यक्ति (पी-टू-पी) के बीच होने वाले सामान्य यूपीआई ट्रांसफर पर इसका कोई प्रस्तावित प्रभाव नहीं बताया गया है।
2020 से यूपीआई पर लागू है शून्य एमडीआर
जनवरी 2020 में केंद्र सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड के माध्यम से होने वाले लेनदेन पर एमडीआर को शून्य कर दिया था। इस निर्णय के बाद व्यापारी बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के यूपीआई भुगतान स्वीकार कर रहे हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक एमडीआर से संबंधित व्यवस्था का नियमन करता है, जबकि सरकार समय-समय पर डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत बदलाव करती रही है।
किस पर पड़ सकता है असर?
यदि भविष्य में यह प्रस्ताव लागू किया जाता है, तो इसका प्रभाव मुख्य रूप से उन व्यापारियों पर पड़ सकता है, जो 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई बिजनेस भुगतान स्वीकार करते हैं।
रोजमर्रा के छोटे भुगतान, जैसे दूध, सब्जी, किराना, ऑटो, टैक्सी या अन्य सामान्य खरीदारी के अधिकांश लेनदेन पर इसका असर पड़ने की संभावना कम बताई जा रही है। व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले यूपीआई भुगतान भी इस प्रस्ताव के दायरे में शामिल नहीं हैं।
95 प्रतिशत यूपीआई लेनदेन रह सकते हैं शुल्क से बाहर
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन कुल यूपीआई ट्रांजैक्शन की संख्या का लगभग 5 प्रतिशत हैं, लेकिन कुल लेनदेन मूल्य में इनकी हिस्सेदारी लगभग 65 प्रतिशत बताई जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में एमडीआर लागू भी किया जाता है, तो लगभग 95 प्रतिशत यूपीआई लेनदेन पहले की तरह बिना किसी शुल्क के जारी रह सकते हैं। इसके अलावा यह भी संभव है कि सभी व्यापारी इस संभावित लागत को ग्राहकों पर स्थानांतरित न करें।
यूपीआई बना देश का सबसे बड़ा डिजिटल भुगतान माध्यम
यूपीआई आज भारत का सबसे बड़ा डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म बन चुका है। जुलाई महीने में इसके माध्यम से लगभग 23.7 अरब लेनदेन दर्ज किए गए, जिनका कुल मूल्य करीब 29.9 लाख करोड़ रुपये रहा। लगातार बढ़ते उपयोग को देखते हुए सरकार और नियामक संस्थाएं इस प्रणाली को अधिक मजबूत, टिकाऊ और दीर्घकालिक बनाने के लिए विभिन्न विकल्पों पर विचार कर रही हैं।
अभी अंतिम फैसला नहीं
फिलहाल यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि संसद में केवल एक संशोधन प्रस्ताव पेश किया गया है। एमडीआर कब लागू होगा, किस दर से लागू होगा और किन श्रेणियों के व्यापारियों पर लागू होगा, इस संबंध में सरकार की ओर से अभी कोई अंतिम अधिसूचना या निर्णय जारी नहीं किया गया है। इसलिए वर्तमान में आम उपभोक्ताओं के यूपीआई भुगतान की व्यवस्था पहले की तरह ही जारी है।
