हैदराबाद की एक सड़क का नाम बदलने का फैसला अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। तेलंगाना की कांग्रेस सरकार ने अमेरिकी वाणिज्य दूतावास से जुड़ी एक प्रमुख सड़क का नाम ‘डोनाल्ड ट्रंप एवेन्यू’ रखने का निर्णय लिया है। पहली नजर में यह महज एक नामकरण का मामला लग सकता है, लेकिन इसके पीछे निवेश, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, कांग्रेस की राजनीतिक लाइन और विपक्ष के हमलों का ऐसा मिश्रण दिखाई दे रहा है, जिसने इस फैसले को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। सवाल केवल यह नहीं है कि सड़क का नाम ट्रंप के नाम पर क्यों रखा जा रहा है, बल्कि यह भी है कि आखिर उस नेता को यह सम्मान क्यों दिया जा रहा है, जिसका न हैदराबाद से कोई सीधा संबंध रहा है और न ही जिसने कभी इस शहर का दौरा किया है।
हैदराबाद को ‘ग्लोबल सिटी’ बनाने की कोशिश और ट्रंप एवेन्यू का विचार
पिछले कुछ वर्षों में हैदराबाद भारत के सबसे तेजी से उभरते कारोबारी और तकनीकी केंद्रों में शामिल हुआ है। दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां यहां अपने कैंपस और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर स्थापित कर रही हैं। अमेरिका की कई फॉर्च्यून-500 कंपनियां भी हैदराबाद को दक्षिण एशिया में अपने संचालन का बड़ा केंद्र बना चुकी हैं। तेलंगाना सरकार का तर्क है कि यह नामकरण अमेरिका और तेलंगाना के बीच मजबूत होते आर्थिक संबंधों का प्रतीक है। सरकार के अनुसार, यह कदम विदेशी निवेशकों को यह संदेश देने के लिए भी है कि हैदराबाद केवल भारत का नहीं, बल्कि वैश्विक निवेश का शहर बन चुका है। रेवंत रेड्डी सरकार इस फैसले को आर्थिक कूटनीति के नजरिए से देख रही है, जहां सड़क का नाम केवल सड़क नहीं, बल्कि निवेश आकर्षित करने का प्रतीकात्मक संदेश माना जा रहा है।
लेकिन सवाल यह भी है कि ट्रंप ही क्यों?
यहीं से विवाद शुरू होता है। आलोचकों का कहना है कि यदि उद्देश्य अमेरिका के साथ संबंधों को सम्मान देना है, तो किसी संस्थान, साझेदारी परियोजना या अमेरिका-भारत मित्रता के नाम पर सड़क का नाम रखा जा सकता था। फिर डोनाल्ड ट्रंप ही क्यों चुने गए? ट्रंप अमेरिका के सबसे विवादित नेताओं में गिने जाते हैं। उनके कार्यकाल को लेकर दुनिया भर में तीखी बहस होती रही है। भारत में भी कांग्रेस और उसके शीर्ष नेता राहुल गांधी कई मौकों पर ट्रंप की नीतियों और बयानों की आलोचना करते रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस शासित राज्य द्वारा ट्रंप के नाम पर सड़क बनाना राजनीतिक विरोधियों को सवाल पूछने का मौका दे रहा है। विरोधी इसे कांग्रेस की ‘दोहरी राजनीति’ बता रहे हैं, जहां दिल्ली में ट्रंप की आलोचना और हैदराबाद में ट्रंप का सम्मान एक साथ दिखाई दे रहा है।
वामपंथी दलों की आपत्ति और वैचारिक बहस
सीपीआई(एम) के वरिष्ठ नेता एम.ए. बेबी ने इस फैसले पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि भारत का लोकतांत्रिक और राजनीतिक इतिहास हमेशा साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों से जुड़ा रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि एक समय कोलकाता में अमेरिकी दूतावास के पास की सड़क का नाम वियतनाम के क्रांतिकारी नेता हो ची मिन्ह के नाम पर रखा गया था। उनके अनुसार, ऐसे दौर में जब अमेरिका की विदेश नीति को लेकर दुनिया के कई हिस्सों में सवाल उठ रहे हैं, तब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के नाम पर सड़क का नाम रखना गलत राजनीतिक संदेश देता है। यह आलोचना केवल ट्रंप तक सीमित नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक सोच पर भी सवाल उठाती है जिसमें आर्थिक संबंधों को ऐतिहासिक और वैचारिक बहसों से ऊपर रखा जा रहा है।
रेवंत रेड्डी का दांव और कांग्रेस की मुश्किल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रेवंत रेड्डी इस फैसले के जरिए तेलंगाना को निवेश-अनुकूल राज्य के रूप में पेश करना चाहते हैं। वह यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी सरकार वैश्विक पूंजी, अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी साझेदारियों के लिए पूरी तरह खुली है। लेकिन यही कदम कांग्रेस के लिए असहज स्थिति भी पैदा कर रहा है। विपक्ष पूछ रहा है कि क्या यह फैसला राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व की जानकारी में लिया गया है? क्या कांग्रेस अब ट्रंप को सम्मान देने की नई राजनीतिक लाइन पर चल रही है? इन सवालों का जवाब अभी तक सामने नहीं आया है, लेकिन इतना तय है कि ‘डोनाल्ड ट्रंप एवेन्यू’ अब सिर्फ एक सड़क का नाम नहीं रहा। यह कांग्रेस की राजनीति, भारत-अमेरिका संबंधों और बदलते राजनीतिक प्रतीकों पर छिड़ी बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है, क्योंकि सड़क का उद्घाटन जितना करीब आएगा, राजनीतिक सवाल भी उतने ही तेज होते जाएंगे।
