erere | Source: erereनई दिल्ली। मानसून 2026 को लेकर मौसम का अनुमान अचानक और चिंताजनक हो गया है। निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काईमेट ने अपने ताजा आकलन में पूरे मानसूनी मौसम के लिए बारिश का अनुमान घटाकर दीर्घकालिक औसत यानी एलपीए का 85 प्रतिशत कर दिया है। एजेंसी ने मौसमी सूखे की संभावना भी 70 प्रतिशत बताई है। स्काईमेट के मुताबिक इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह अल नीनो का लगातार मजबूत होना और हिंद महासागर द्विध्रुव की स्थिति को लेकर बनी अनिश्चितता है।

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जून-जुलाई में ही बारिश रही औसत से कम

स्काईमेट के अनुसार एक जून से 31 जुलाई के बीच देशभर में बारिश दीर्घकालिक औसत से करीब 13 प्रतिशत कम रही। एजेंसी ने अगस्त में बारिश को एलपीए के लगभग 84 प्रतिशत और सितंबर में करीब 80 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। दोनों महीनों में बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना को लेकर भी चिंता जताई गई है।

इससे पहले अप्रैल में स्काईमेट ने पूरे मानसून के दौरान बारिश को एलपीए के 94 प्रतिशत के आसपास रहने का अनुमान लगाया था। अब इसे घटाकर 85 प्रतिशत कर दिया गया है। यानी कुछ ही महीनों में पूर्वानुमान में बड़ा बदलाव आया है।

सितंबर की शुरुआत में और मजबूत हो सकता है अल नीनो

स्काईमेट के प्रबंध निदेशक जतिन सिंह के अनुसार अल नीनो की स्थिति मजबूत हो रही है और सितंबर की शुरुआत में यह मौसम के लिहाज से “बहुत मजबूत” श्रेणी में पहुंच सकती है। एजेंसी का मानना है कि इसका असर मानसून के अंतिम चरण में बारिश की मात्रा और वितरण दोनों पर पड़ सकता है।

अल नीनो के कारण भारत में मानसून का व्यवहार अधिक अनिश्चित हो सकता है। यदि बारिश के बीच लंबे अंतराल बढ़ते हैं, तो खेतों में खड़ी खरीफ फसलों के लिए नमी की कमी की समस्या पैदा हो सकती है।

सरकारी मौसम विभाग का अनुमान भी सामान्य नहीं

भारत मौसम विज्ञान विभाग ने भी अगस्त-सितंबर के दौरान देशभर में बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान लगाया है। विभाग के अनुसार इन दो महीनों में बारिश दीर्घकालिक औसत के 94 प्रतिशत से नीचे रहने की संभावना है। हालांकि कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश की संभावना भी बनी हुई है, इसलिए पूरे देश में एक जैसा मौसम रहने की उम्मीद नहीं है।

आईएमडी के अनुसार अगस्त-सितंबर की अवधि में कई क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश की संभावना है, जबकि प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों, मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ इलाकों तथा पूर्व और पूर्वोत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश हो सकती है।

धान से लेकर कपास तक पर पड़ सकता है असर

मानसून की बारिश का समय और उसका क्षेत्रवार वितरण खरीफ फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। धान, कपास, दाल, सोयाबीन और तिलहन जैसी फसलें बारिश के उतार-चढ़ाव से सीधे प्रभावित हो सकती हैं।

बारिश में लंबे अंतराल की स्थिति बनने पर मिट्टी में नमी कम हो सकती है और किसानों को सिंचाई पर निर्भरता बढ़ानी पड़ सकती है। वहीं लगातार कम बारिश होने पर उत्पादन पर दबाव पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।

2023 में भी अल नीनो ने बढ़ाई थी परेशानी

अल नीनो के प्रभाव को लेकर चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि 2023 में भी इसके कारण भारत का मानसून अनिश्चित रहा था। उस दौरान कम और असमान बारिश का असर कृषि क्षेत्र पर पड़ा था और 2023-24 फसल वर्ष में देश के खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई थी।

हालांकि हर अल नीनो घटना का प्रभाव एक जैसा नहीं होता। बारिश पर समुद्री तापमान, हिंद महासागर की परिस्थितियों और अन्य वायुमंडलीय कारकों का भी असर पड़ता है।

मानसून पर नजर रखना क्यों जरूरी है?

भारत अपनी वार्षिक बारिश का बड़ा हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून के चार महीनों में प्राप्त करता है। यही बारिश कृषि, जलाशयों, भूजल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसलिए अगस्त और सितंबर में बारिश का प्रदर्शन देश की खरीफ फसलों के साथ-साथ ग्रामीण मांग और खाद्य कीमतों के लिए भी महत्वपूर्ण रहने वाला है।

फिलहाल स्काईमेट का नया अनुमान एक गंभीर चेतावनी के तौर पर सामने आया है, लेकिन इसे पूरे देश में निश्चित सूखे की घोषणा नहीं माना जाना चाहिए। मौसम की परिस्थितियां लगातार बदलती रहती हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश का प्रदर्शन भी अलग हो सकता है। सरकारी और निजी दोनों पूर्वानुमानों में फिलहाल सबसे बड़ा संकेत यही है कि मानसून के बाकी हिस्से में बारिश सामान्य से कम और अधिक असमान रहने का जोखिम बढ़ गया है।