erer | Source: erereनई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2012 में बिहार में एक पैसेंजर ट्रेन में महिला के साथ हुए गैंगरेप के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने रेलवे को पीड़िता को 3 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश देते हुए स्पष्ट किया कि यदि कोई यात्री वैध टिकट के साथ यात्रा कर रहा है, तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे की जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि अपराध बाहरी लोगों द्वारा किए जाने का तर्क रेलवे को अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकता।

2012 की घटना पर आया हाईकोर्ट का अहम फैसला

यह मामला 27 अगस्त 2012 का है, जब बिहार के एक रेलवे स्टेशन पर खड़ी एक पैसेंजर ट्रेन में एक महिला के साथ गैंगरेप की घटना हुई थी। घटना के बाद पीड़िता के पिता ने 9 मार्च 2013 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में शिकायत दर्ज कराई थी। मामले की सुनवाई के बाद आयोग ने रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष को पीड़िता को 3 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था।

रेलवे ने कोर्ट में क्या-क्या दलीलें दीं

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश को रेलवे ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। रेलवे की ओर से कहा गया कि मुआवजा तय करने का अधिकार केवल रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के पास है और NHRC के पास ऐसा आदेश देने का अधिकार क्षेत्र नहीं है।

रेलवे ने यह भी तर्क दिया कि अपराध रेलवे कर्मचारियों ने नहीं बल्कि बाहरी लोगों ने किया था, जिन्हें बाद में दोषी ठहराया गया। इसके अतिरिक्त रेलवे का कहना था कि घटना उस समय हुई जब ट्रेन स्टेशन पर खड़ी थी, इसलिए कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकार के अधीन कार्यरत गवर्नमेंट रेलवे पुलिस (GRP) की थी।

'अनहोनी घटना' की दलील भी अदालत ने की खारिज

सुनवाई के दौरान रेलवे ने यह भी कहा कि यह घटना रेलवे अधिनियम की धारा 123 के तहत 'अनहोनी घटना' की श्रेणी में नहीं आती, इसलिए धारा 124A के तहत मुआवजा देने का कोई आधार नहीं बनता।

हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि गैंगरेप जैसी घटना एक हिंसक हमला है और इसे 'अनहोनी घटना' की परिभाषा में शामिल किया जाएगा। इसलिए पीड़िता को कानूनी राहत मिलना उचित है।

रेलवे परिसर और प्लेटफॉर्म भी कानून के दायरे में

जस्टिस अमित बंसल ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि कानून केवल चलती ट्रेन के भीतर होने वाली घटनाओं तक सीमित नहीं है। रेलवे प्लेटफॉर्म और रेलवे परिसर में होने वाले हिंसक हमले भी इसी दायरे में आते हैं।

अदालत ने यह भी पाया कि पीड़िता वैध टिकट के साथ यात्रा कर रही थी। ऐसे में उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे की जिम्मेदारी थी और इस जिम्मेदारी से रेलवे बच नहीं सकता।

मानवाधिकार आयोग के अधिकारों पर भी अदालत की अहम टिप्पणी

दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अधिकार क्षेत्र का भी समर्थन किया। अदालत ने कहा कि आयोग ने मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन की शिकार पीड़िता को तत्काल आर्थिक राहत देने की सिफारिश करके अपने अधिकारों का उचित उपयोग किया।

अदालत ने पूर्व के न्यायिक निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कोई 'बिना दांत का बाघ' नहीं है, बल्कि वह नागरिकों के जीवन और सम्मान के अधिकार का प्रभावी संरक्षक है। सरकारें आयोग की सिफारिशों को अदालत में चुनौती दे सकती हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दो सप्ताह के भीतर मुआवजा देने का निर्देश

अदालत ने बताया कि मई 2016 में याचिका स्वीकार करते समय रेलवे को 3 लाख रुपये की राशि कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा कराने का निर्देश दिया गया था और NHRC के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी गई थी।

अब रेलवे की याचिका खारिज होने के बाद हाईकोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि जमा की गई राशि, उस पर अर्जित ब्याज सहित, दो सप्ताह के भीतर पीड़िता को सौंप दी जाए।