erer | Source: ererनई दिल्ली। भारत में किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने वाली दशकों पुरानी व्यवस्था अब एक नई और गंभीर आर्थिक चुनौती के सामने खड़ी दिखाई दे रही है। सरकार यूरिया पर भारी सब्सिडी देकर किसानों को कम कीमत पर खाद उपलब्ध कराती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन और उर्वरक की कीमतों में बढ़ोतरी ने इस व्यवस्था का खर्च काफी बढ़ा दिया है। स्थिति ऐसी है कि चालू वित्त वर्ष में देश का उर्वरक सब्सिडी बिल 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है, जबकि बजट में इसके लिए 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

266.5 रुपये में 45 किलो यूरिया, लेकिन असली खर्च कहीं ज्यादा

भारत में किसान 45 किलो यूरिया की एक बोरी के लिए सिर्फ 266.5 रुपये का भुगतान करता है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी कीमतों के बीच सरकार को यूरिया खरीदने के लिए इससे कई गुना अधिक राशि खर्च करनी पड़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में हुए एक टेंडर में भारत ने युद्ध से पहले की कीमतों की तुलना में लगभग दोगुनी कीमत पर यूरिया की आपूर्ति के लिए भुगतान किया।

यानी किसान तक खाद को कम कीमत पर पहुंचाने के लिए सरकार को अंतरराष्ट्रीय बाजार की ऊंची लागत और घरेलू कीमत के बीच का बड़ा अंतर अपने ऊपर लेना पड़ता है। यही अंतर अब सरकारी खजाने पर बढ़ते बोझ की बड़ी वजहों में शामिल हो गया है।

ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट ने बढ़ाई परेशानी

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन और उर्वरक की आपूर्ति प्रभावित होने से भारत की मुश्किलें और बढ़ी हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान युद्ध के कारण दुनिया भर में खाद और ऊर्जा की आपूर्ति पर असर पड़ा है। इससे उर्वरक की खरीद लागत दोगुनी से अधिक हो गई और खाद के उत्पादन के लिए जरूरी गैस की उपलब्धता पर भी असर पड़ा।

होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी आपूर्ति में रुकावट ने भी स्थिति को जटिल बनाया। भारत दुनिया के सबसे बड़े यूरिया खरीदारों में से एक है और अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर करता है। ऐसे में वैश्विक आपूर्ति में किसी भी बड़ी बाधा का सीधा असर खरीद लागत और घरेलू उपलब्धता पर पड़ सकता है।

महंगी गैस का असर सीधे खाद पर

उर्वरक उत्पादन में प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण कच्चे माल में शामिल है। भारत को प्राकृतिक गैस के आयात के लिए भी ऊंची कीमत चुकानी पड़ी है और इसका एक बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है। जब गैस महंगी होती है तो घरेलू स्तर पर उर्वरक उत्पादन की लागत भी प्रभावित होती है।

इसके साथ ही विदेशों से खाद खरीदने पर होने वाला खर्च बढ़ता है। इस तरह एक तरफ सब्सिडी का बोझ बढ़ता है और दूसरी तरफ आयात के लिए विदेशी मुद्रा की जरूरत भी बढ़ती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी मुद्रा के बाहर जाने की तेज रफ्तार ने रुपये पर भी दबाव बढ़ाया है और रुपया इस साल एशिया की कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक रहा है।

दशकों पहले शुरू हुआ था सस्ता यूरिया देने का मॉडल

भारत की यूरिया सब्सिडी व्यवस्था की जड़ें 1960 के दशक के खाद्य संकट तक जाती हैं। उस समय देश अनाज की जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर था। खाद्य सुरक्षा मजबूत करने और अकाल जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए भारत ने हरित क्रांति का रास्ता अपनाया।

गेहूं और चावल की पैदावार बढ़ाने में रासायनिक उर्वरकों, खासकर सस्ते नाइट्रोजन उर्वरक की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके बाद सरकारों ने यूरिया की कीमतों को नियंत्रित रखा और बाजार कीमत तथा किसानों से ली जाने वाली कीमत के बीच के अंतर का बोझ सरकार ने उठाया।

इस नीति ने भारत की कृषि व्यवस्था को बदलने में अहम भूमिका निभाई। देश अनाज की कमी और आयात पर निर्भरता से आगे बढ़कर कृषि उत्पादन में मजबूत स्थिति तक पहुंचा। आज भारत दुनिया का नंबर एक चावल निर्यातक देश है। सस्ती खाद व्यवस्था ने छोटे किसानों को भी समर्थन दिया और खाद्य वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद की।

कामयाब मॉडल अब क्यों बन रहा है चुनौती?

यूरिया सब्सिडी ने कृषि और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने में भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ इसके सामने नई समस्याएं भी उभरती गईं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में लागत बढ़ने के बावजूद किसानों के लिए यूरिया की कीमत को कम रखना सरकार के लिए महंगा साबित हो रहा है।

इसके अलावा, सस्ती यूरिया की उपलब्धता ने नाइट्रोजन आधारित उर्वरक के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है। दूसरे प्रकार के उर्वरकों पर भी सब्सिडी दी जाती है, लेकिन उनकी मात्रा अलग है। इससे खेती में पोषक तत्वों के संतुलित इस्तेमाल को लेकर चिंता बनी हुई है।

सरकार अब खाद के इस्तेमाल का तरीका बदलना चाहती है

बढ़ते आर्थिक बोझ के बीच सरकार किसानों को खाद के अधिक और असंतुलित इस्तेमाल के नुकसान के बारे में जागरूक करने की कोशिश कर रही है। देशभर में मिट्टी की सेहत पर अत्यधिक उर्वरक इस्तेमाल के प्रभाव को लेकर अभियान चलाए गए हैं।

इसके साथ ही एक नए सिस्टम का परीक्षण किया जा रहा है, जो लंबे समय में खाद की बिक्री के तरीके में बदलाव ला सकता है। सरकार की कोशिश केवल सब्सिडी का खर्च कम करना ही नहीं, बल्कि खेती में रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल को अधिक संतुलित बनाने की भी है।

हालांकि यह बदलाव आसान नहीं है। खेती का सबसे बड़ा सालाना मौसम चल रहा है और इसी दौरान खाद की मांग सबसे ज्यादा रहती है। बहुत से किसान लंबे समय से चले आ रहे खेती के तरीकों को बदलने के लिए तुरंत तैयार नहीं होते। ऐसे में खाद की उपलब्धता और कीमत के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।

सहकारी समितियों पर भी आपूर्ति सीमित करने का दबाव

मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के मुताबिक, मध्य पूर्व से खाद और गैस की आपूर्ति अभी तक सामान्य नहीं हुई है। इसी वजह से कुछ महत्वपूर्ण राज्यों में सहकारी समितियां खाद की आपूर्ति सीमित करने की दिशा में कदम उठा रही हैं। इसका एक कारण सरकारी खर्च को नियंत्रित करना भी बताया गया है।

स्थिति उस समय और संवेदनशील हो जाती है जब कमजोर मॉनसून की संभावना भी कृषि उत्पादन पर असर डाल सकती है। यदि खाद की उपलब्धता प्रभावित होती है और मौसम भी किसानों का साथ नहीं देता, तो इसका असर फसल उत्पादन पर पड़ सकता है।

खाद संकट का असर भारत से बाहर भी पड़ सकता है

भारत केवल अपनी घरेलू खाद्य जरूरतों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि कई देश भारतीय चावल और अन्य कृषि उत्पादों पर निर्भर हैं। इसलिए भारत में कृषि उत्पादन प्रभावित होने की स्थिति में वैश्विक खाद्य बाजार पर भी इसका असर पड़ सकता है।

इंटरनेशनल फर्टिलाइजर एसोसिएशन में मार्केट इंटेलिजेंस की डायरेक्टर लॉरा क्रॉस ने कहा, "अगर होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी रुकावटें बनी रहती हैं तो मुख्य चिंता सिर्फ खाद की उपलब्धता की नहीं, बल्कि सही समय पर खाद मिलने की है। भारत के बड़े पैमाने को देखते हुए इसके असर घरेलू बाजार से कहीं ज्यादा होंगे।"

विशेषज्ञों ने मौजूदा सब्सिडी व्यवस्था पर उठाए सवाल

इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के सीनियर रिसर्च फेलो अविनाश किशोर ने फर्टिलाइजर सब्सिडी पर खर्च को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इस पर खर्च किया जा रहा पैसा गलत और बेअसर तरीके से इस्तेमाल हो रहा है। उनके अनुसार, यह भारतीय खेती में ऐसी आदतों को बढ़ावा दे रहा है जो स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं हैं, पर्यावरण के अनुकूल नहीं हैं और पैदावार बढ़ाने में भी मदद नहीं करतीं।

रिपोर्ट के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों में कुछ किसानों ने इस साल उर्वरक कीमतों में बढ़ोतरी से बचने के लिए कम खाद की जरूरत वाली फसलों को अपनाया। इसके विपरीत भारत में सस्ती यूरिया व्यवस्था के कारण मांग बनी हुई है।

प्रधानमंत्री मोदी भी कर चुके हैं रासायनिक खाद कम करने की अपील

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करने की जरूरत पर जोर दिया है। मई में एक भाषण के दौरान उन्होंने केमिकल फर्टिलाइजर की खपत कम करना देश के लिए जरूरी बताया था।

प्रधानमंत्री ने किसानों से अपील की थी कि वे प्रमुख आयातित वस्तुओं पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठाते हुए रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल आधा करने की कोशिश करें। उन्होंने इसे धरती मां को बचाने से भी जोड़ा था।

अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

भारत के सामने चुनौती केवल खाद की कीमत या सब्सिडी का खर्च घटाने की नहीं है। एक तरफ किसानों को सस्ती और समय पर खाद उपलब्ध कराना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमत, आयात लागत, प्राकृतिक गैस की महंगी आपूर्ति और रुपये पर पड़ने वाले दबाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दशकों पुरानी सब्सिडी व्यवस्था ने भारत को खाद्य सुरक्षा मजबूत करने में मदद की है, लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों ने इसकी आर्थिक सीमाओं को सामने ला दिया है। ऐसे में सरकार को किसान हित, खाद्य सुरक्षा, सरकारी खर्च और उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल के बीच रास्ता तलाशना होगा।