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भारत को टीबी मुक्त बनाने के राष्ट्रीय अभियान के बीच पूर्वोत्तर भारत से सामने आई एक नई रिपोर्ट ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। आमतौर पर टीबी को ऐसी बीमारी माना जाता है, जिसमें लगातार खांसी, बुखार, वजन कम होना, सीने में दर्द और कमजोरी जैसे स्पष्ट लक्षण दिखाई देते हैं। लेकिन हालिया स्क्रीनिंग अभियान में बड़ी संख्या में ऐसे मरीज मिले हैं, जिनमें संक्रमण मौजूद था, फिर भी बीमारी के कोई सामान्य संकेत नहीं दिखे। यही कारण है कि विशेषज्ञ इस स्थिति को "साइलेंट टीबी" या "एसिम्प्टोमैटिक टीबी" का नाम दे रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे संक्रमित लोग खुद को पूरी तरह स्वस्थ समझते हुए सामान्य जीवन जीते रहते हैं और कई बार लंबे समय तक उन्हें अपनी बीमारी का पता भी नहीं चल पाता। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बिना लक्षण वाले ऐसे मरीज टीबी नियंत्रण अभियान के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं, क्योंकि समय पर पहचान न होने से संक्रमण के फैलने का खतरा भी बढ़ जाता है।

हर तीन मरीजों में से एक बिना लक्षण वाला

स्वास्थ्य मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, नेशनल ट्यूबरक्लोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम (NTEP) के तहत जनवरी से अक्टूबर 2025 के बीच पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों में विशेष स्क्रीनिंग अभियान चलाया गया। इस अभियान में 39 लाख से अधिक लोगों की जांच की गई और लगभग 6 लाख लोगों का चेस्ट एक्स-रे कराया गया। जांच के दौरान 41,727 टीबी मरीजों की पहचान हुई, जिनमें से 14,356 मरीज ऐसे थे जिनमें बीमारी का कोई लक्षण नहीं पाया गया। यह कुल मामलों का करीब 34 प्रतिशत है, यानी हर तीन मरीजों में से एक एसिम्प्टोमैटिक टीबी का शिकार था।

असम में सबसे ज्यादा मामले, अन्य राज्यों में भी बढ़ी चिंता

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि असम में सबसे अधिक 10,362 बिना लक्षण वाले टीबी मरीज मिले। इसके बाद मेघालय में 1,055, नागालैंड में 857, त्रिपुरा में 510, अरुणाचल प्रदेश में 479, मणिपुर में 465, सिक्किम में 380 और मिजोरम में 248 मामले दर्ज किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि ये आंकड़े सिर्फ दर्ज मामलों को दर्शाते हैं, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि बड़ी आबादी अब भी जांच के दायरे से बाहर है।

टीबी नियंत्रण अभियान के सामने नई चुनौती

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बिना लक्षण वाले मरीज टीबी नियंत्रण कार्यक्रम के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं। आमतौर पर लोग तब अस्पताल पहुंचते हैं जब उन्हें लगातार खांसी या अन्य समस्याएं होती हैं, लेकिन एसिम्प्टोमैटिक मरीज लंबे समय तक बीमारी के साथ रहते हैं और इलाज नहीं करा पाते। इससे संक्रमण फैलने का जोखिम बढ़ जाता है। यही कारण है कि अब सरकार केवल अस्पतालों में आने वाले मरीजों पर निर्भर रहने के बजाय समुदाय स्तर पर सक्रिय जांच अभियान चला रही है।

एआई और डिजिटल तकनीक से हो रही पहचान

टीबी की जल्द पहचान के लिए कई राज्यों में आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। मेघालय में एआई आधारित पोर्टेबल एक्स-रे यूनिट और ‘कफ अगेंस्ट टीबी’ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की मदद से मरीजों की पहचान की जा रही है। दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए मोबाइल स्क्रीनिंग यूनिट भी तैनात की गई हैं। इन तकनीकों की मदद से ऐसे मरीजों तक पहुंचना संभव हो रहा है जो सामान्य तौर पर स्वास्थ्य केंद्रों तक नहीं पहुंच पाते।

क्यों खतरनाक है साइलेंट टीबी?

विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, टीबी का बैक्टीरिया शरीर में लंबे समय तक सक्रिय रह सकता है और शुरुआती चरण में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाता। ऐसे मरीज बीमारी को गंभीर होने तक पहचान नहीं पाते। यही वजह है कि बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग, नियमित जांच और हाई-रिस्क समूहों की निगरानी को टीबी उन्मूलन रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा रहा है। पूर्वोत्तर भारत की यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि टीबी के खिलाफ लड़ाई अब केवल लक्षणों वाले मरीजों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उन लाखों लोगों तक पहुंचने की जरूरत है जो बीमारी के साथ जी रहे हैं लेकिन उन्हें इसका एहसास तक नहीं है