राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) देश के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में गिना जाता है। लगभग एक सदी पुराने इस संगठन का प्रभाव केवल सामाजिक गतिविधियों तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि शिक्षा, सेवा कार्य, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और वैचारिक संगठनों के माध्यम से इसकी व्यापक उपस्थिति देखी जाती है। ऐसे में कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खड़गे द्वारा RSS प्रमुख मोहन भागवत को लिखा गया पत्र राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। इस पत्र में खड़गे ने RSS की कानूनी स्थिति, पंजीकरण, फंडिंग के स्रोत, संपत्तियों और सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़े कई सवाल उठाए हैं। वहीं संघ ने इन सवालों को अनावश्यक बताते हुए कहा है कि उसकी कार्यप्रणाली हमेशा सार्वजनिक रही है और वह पिछले 100 वर्षों से समाज के बीच सक्रिय है।
RSS पर खड़गे के सवाल, भागवत का जवाब | फोटो: आज तक
आखिर खड़गे ने RSS से क्या पूछा है?
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने अपने पत्र में कहा है कि RSS का नेटवर्क देशभर में फैला हुआ है और केवल कर्नाटक में ही इसकी हजारों शाखाएं नियमित रूप से संचालित होती हैं। संघ के अपने आंकड़ों के अनुसार राज्य में 4 हजार से अधिक दैनिक शाखाएं, सैकड़ों साप्ताहिक बैठकें और अनेक सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। खड़गे का कहना है कि जब कोई संगठन इतने बड़े स्तर पर सार्वजनिक गतिविधियां संचालित करता हो, तब उसकी प्रशासनिक संरचना और वित्तीय व्यवस्था को लेकर पारदर्शिता भी आवश्यक हो जाती है। उन्होंने संगठन से पूछा है कि वह किस कानूनी ढांचे के तहत कार्य करता है, उसका अधिकृत प्रतिनिधित्व कौन करता है, संगठन के निर्णय लेने की प्रक्रिया क्या है और उसकी आय के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं। इसके अलावा संघ की संपत्तियों, दान व्यवस्था और कर संबंधी अनुपालन की जानकारी भी मांगी गई है।
RSS का ढांचा और कानूनी स्थिति क्यों बनी चर्चा का विषय?
RSS की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। संघ स्वयं को एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में संगठन, सेवा और राष्ट्र निर्माण की भावना को मजबूत करना है। संघ का संचालन शाखाओं और स्वयंसेवकों के नेटवर्क के माध्यम से होता है। हालांकि यह किसी राजनीतिक दल की तरह चुनाव नहीं लड़ता, लेकिन उससे प्रेरित कई संगठन शिक्षा, श्रमिक, किसान, छात्र और सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय हैं। यही वजह है कि समय-समय पर संघ की संगठनात्मक संरचना और उसके प्रभाव को लेकर सवाल उठते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि देश के सार्वजनिक जीवन में प्रभाव रखने वाले किसी भी बड़े संगठन की कार्यप्रणाली को लेकर जिज्ञासा स्वाभाविक है। वहीं संघ समर्थकों का तर्क है कि RSS एक स्वयंसेवी संगठन है और उसकी गतिविधियां समाज के सामने खुली हैं, इसलिए उसे किसी अलग कानूनी मानक से देखने की आवश्यकता नहीं है।
फंडिंग और संपत्तियों को लेकर क्यों बढ़ी दिलचस्पी?
प्रियांक खड़गे के पत्र में सबसे अधिक ध्यान संघ की वित्तीय व्यवस्था पर केंद्रित है। उन्होंने जानना चाहा है कि RSS को मिलने वाले आर्थिक सहयोग का स्रोत क्या है और उसका उपयोग किस प्रकार किया जाता है। संघ लंबे समय से यह कहता रहा है कि उसकी अधिकांश गतिविधियां स्वयंसेवकों के सहयोग और समाज से मिलने वाले योगदान के आधार पर संचालित होती हैं। हालांकि बड़े पैमाने पर सामाजिक और संगठनात्मक गतिविधियां चलाने वाले संस्थानों के वित्तीय ढांचे को लेकर हमेशा सार्वजनिक रुचि बनी रहती है। यही कारण है कि खड़गे ने संगठन की आय, व्यय, संपत्ति और कर अनुपालन से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है। उनका तर्क है कि पारदर्शिता किसी भी बड़े संगठन की विश्वसनीयता को और मजबूत करती है।
मोहन भागवत की प्रतिक्रिया क्या कहती है?
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि संघ को किसी विशेष पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है और उसकी गतिविधियां दशकों से सार्वजनिक रूप से संचालित हो रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि संघ के इतिहास में पहले कभी किसी सरकार ने इस प्रकार की जानकारी नहीं मांगी। संघ का मानना है कि उसकी पहचान और कार्यशैली समाज के सामने स्पष्ट है तथा स्वयंसेवकों का विशाल नेटवर्क उसकी सबसे बड़ी ताकत है।भागवत ने यह संकेत भी दिया कि RSS को लेकर समय-समय पर राजनीतिक दृष्टिकोण के आधार पर अलग-अलग सवाल उठाए जाते रहे हैं, लेकिन संगठन अपने मूल उद्देश्य और कार्यप्रणाली के अनुसार काम करता रहेगा।
एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है यह घटनाक्रम
प्रियांक खड़गे के पत्र और RSS की प्रतिक्रिया ने एक व्यापक प्रश्न को सामने ला दिया है- क्या देश के बड़े सामाजिक और वैचारिक संगठनों के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही के कोई समान मानक होने चाहिए? यह सवाल केवल RSS तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी संस्थाओं से जुड़ा है जिनका प्रभाव समाज के बड़े वर्ग पर पड़ता है। फिलहाल यह मामला राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर संस्थागत जवाबदेही, सार्वजनिक पारदर्शिता और सामाजिक संगठनों की भूमिका पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि RSS इस संबंध में कोई विस्तृत स्पष्टीकरण जारी करता है या यह मुद्दा राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनकर आगे बढ़ता है।
