नासिक। महाराष्ट्र के नासिक में जमीन के नीचे से निकल रहे पीले रंग के पानी ने औद्योगिक प्रदूषण और जनस्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। नासिक के अंबड औद्योगिक क्षेत्र में बोरवेल और हैंडपंपों से निकलने वाला पानी देखने में पीले रंग का है और बोतल में रखने पर तेल जैसा दिखाई देता है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) की जांच में इस भूजल में हेक्सावेलेंट क्रोमियम की खतरनाक मात्रा मिलने की बात सामने आई है। उपलब्ध जांच रिपोर्ट के अनुसार, पानी में इस जहरीले औद्योगिक प्रदूषक का स्तर भारतीय मानक ब्यूरो की निर्धारित सुरक्षित सीमा से 1,000 गुना से भी अधिक पाया गया है। इस खुलासे ने स्थानीय लोगों की सुरक्षा, औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले कचरे के निपटारे और जल स्रोतों की निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि वर्ष 2027 में नासिक में गोदावरी नदी के किनारे कुंभ मेले का आयोजन होना है। ऐसे में धार्मिक आयोजन से पहले भूजल प्रदूषण का मामला प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
अंबड में पीले पानी का खुलासा, बोरवेल और हैंडपंपों से आ रहा दूषित जल
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 20 सितंबर को स्थानीय नागरिकों ने ऑनलाइन माध्यमों पर शिकायतें साझा की थीं कि अंबड क्षेत्र के बोरवेल और हैंडपंपों से पीले रंग का पानी निकल रहा है। इसके बाद महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी मौके पर पहुंचे और एक बोरवेल से पानी का नमूना एकत्र किया। जल प्रदूषण के मामले पर काम करने वाले संगठन साउथ एशियन नेटवर्क ऑफ डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (SANDRP) ने भी क्षेत्र का दौरा किया और प्रयोगशाला में जांच के लिए पानी के नमूने लिए।
अंबड नासिक का एक औद्योगिक उपनगरीय क्षेत्र है, जहां कई प्रकार की औद्योगिक गतिविधियां संचालित होती हैं। स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक, लोग पीले रंग के इस पानी का इस्तेमाल धोने, साफ-सफाई और नहाने जैसे दैनिक कार्यों के लिए कर रहे थे। ऐसे में पानी में खतरनाक रसायनों की मौजूदगी का खुलासा लोगों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ाने वाला है।
भूजल का इस्तेमाल सीधे घरेलू जरूरतों में किए जाने की स्थिति में प्रदूषण की गंभीरता और बढ़ जाती है। हालांकि, प्रभावित लोगों की संख्या, प्रदूषित पानी के इस्तेमाल की अवधि और इससे जुड़ी बीमारियों के बारे में विस्तृत चिकित्सकीय आंकड़े उपलब्ध जानकारी में नहीं दिए गए हैं।
प्रयोगशाला की जांच में सामने आया क्रोमियम का खतरनाक स्तर
महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से 11 अक्टूबर को जारी प्रयोगशाला रिपोर्ट में पानी के नमूने में 45 मिलीग्राम प्रति लीटर क्रोमियम पाया गया। रिपोर्ट में सल्फेट और क्लोराइड की मात्रा भी काफी अधिक होने की जानकारी सामने आई। वहीं, SANDRP की ओर से लिए गए नमूने की नासिक की एक प्रयोगशाला में जांच कराई गई, जिसमें कुल क्रोमियम की मात्रा 50.5 मिलीग्राम प्रति लीटर पाई गई। इसमें 50.3 मिलीग्राम प्रति लीटर हेक्सावेलेंट क्रोमियम था।
ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स यानी भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा निर्धारित 0.05 मिलीग्राम प्रति लीटर की सीमा से तुलना करने पर यह मात्रा 1,000 गुना से भी अधिक बैठती है। यह अंतर भूजल में औद्योगिक प्रदूषण की गंभीरता को दर्शाता है।
हेक्सावेलेंट क्रोमियम को अत्यधिक खतरनाक रासायनिक प्रदूषकों में गिना जाता है। इसका इस्तेमाल कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं में होता है और उचित उपचार के बिना इससे युक्त अपशिष्ट जल पर्यावरण में पहुंचने पर मिट्टी तथा जल स्रोतों को दूषित कर सकता है। अंबड में सामने आए जांच परिणामों ने इस बात की जरूरत बढ़ा दी है कि प्रदूषण के स्रोतों की पहचान कर उसके फैलाव का आकलन किया जाए।
17 औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का नोटिस, प्रदूषण फैलाने वालों पर कार्रवाई
अंबड में भूजल प्रदूषण का मामला सामने आने के बाद महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने क्षेत्र की 17 औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का नोटिस भेजा है। कार्रवाई उन औद्योगिक गतिविधियों के खिलाफ की जा रही है, जिन पर बिना उचित उपचार के दूषित पानी नदियों और नालों में छोड़ने का आरोप है।
नासिक में MPCB के क्षेत्रीय अधिकारी विद्यासागर किल्लेदार ने बताया, “हमें एक बोरवेल का परिणाम मिल चुका है, और तीन अन्य बोरवेल के नमूने आगे की जांच के लिए भेजे गए हैं। इस बीच, हमने उन प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है, जो बिना साफ किए गए दूषित पानी को नदियों और नालों में छोड़ रही हैं।”
इस बयान से स्पष्ट है कि जांच अभी जारी है और अन्य बोरवेलों के नमूनों के नतीजे आने के बाद प्रदूषण की स्थिति के बारे में अतिरिक्त जानकारी मिल सकती है। हालांकि, फिलहाल उपलब्ध रिपोर्ट में सभी प्रभावित जल स्रोतों की स्थिति और प्रदूषण के वास्तविक दायरे का पूरा विवरण सामने नहीं आया है।
वर्ष 2009 से मिल रहे थे भूजल प्रदूषण के संकेत
अंबड के भूजल प्रदूषण का मुद्दा नया नहीं बताया जा रहा है। पर्यावरण कार्यकर्ता रोशन केदार ने इस मामले को उठाते हुए महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से शिकायत की थी। द प्रिंट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, केदार का कहना है कि अंबड महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (MIDC) क्षेत्र में इलेक्ट्रोप्लेटिंग से जुड़ी लगभग 80 औद्योगिक इकाइयां हैं और यहां इस प्रकार के प्रदूषण की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं।
रोशन केदार के मुताबिक, अंबड में भूजल प्रदूषण के सबसे पुराने रिकॉर्ड वर्ष 2009 के हैं। स्थानीय लोगों ने कई बार इस समस्या को लेकर शिकायतें की हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वर्ष 2016 में कई औद्योगिक इकाइयों को बंद किया गया था, लेकिन बाद में वे दोबारा खुल गईं। केदार ने इस समस्या के स्थायी समाधान की जरूरत पर जोर दिया है।
पुराने रिकॉर्ड और मौजूदा जांच के बीच सामने आया यह मामला औद्योगिक प्रदूषण की निगरानी तथा नियमों के पालन की प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है। यदि दूषित अपशिष्ट जल का निपटारा निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं होता है, तो उसका असर आसपास की मिट्टी, भूजल और नदी तंत्र पर पड़ सकता है। इसलिए केवल अस्थायी कार्रवाई के बजाय प्रदूषण के स्रोतों और उसके फैलाव की पहचान महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
हेक्सावेलेंट क्रोमियम से कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा
हेक्सावेलेंट क्रोमियम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समूह-1 के कैंसरकारी पदार्थों में शामिल किया गया है। इसके संपर्क में आने से कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा, लंबे समय तक या अधिक मात्रा में संपर्क होने पर शरीर के विभिन्न अंगों, विशेषकर यकृत और गुर्दों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
SANDRP की 8 अक्टूबर को जारी रिपोर्ट के अनुसार, अंबड के भूजल में पाया गया हेक्सावेलेंट क्रोमियम का स्तर दुनिया के गंभीर प्रदूषण मामलों में दर्ज स्तरों के बराबर बताया गया है। रिपोर्ट में इसकी तुलना वर्ष 1996 के चर्चित एरिन ब्रोकोविच मामले से भी की गई है और कहा गया है कि अंबड में सामने आया स्तर उससे भी अधिक है।
रिपोर्ट में रासायनिक प्रदूषण के संपर्क से जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का भी उल्लेख किया गया है। स्थानीय लोगों में रासायनिक घाव, त्वचा पर चकत्ते और छाले जैसे लक्षण दिखाई देने की बात कही गई है। हालांकि, इन लक्षणों और भूजल में मौजूद क्रोमियम के बीच चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित संबंध स्थापित करने के लिए स्वास्थ्य जांच और विशेषज्ञों के आकलन की आवश्यकता होगी।
क्रोम-प्लेटिंग और जिंक-प्लेटिंग की फैक्ट्रियों पर सवाल
अंबड औद्योगिक क्षेत्र में क्रोम-प्लेटिंग, जिंक-प्लेटिंग और पाउडर-कोटिंग से जुड़ी लगभग 80 फैक्ट्रियां होने की जानकारी सामने आई है। इन औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलने वाले कचरे में क्रोमियम जैसे रसायन मौजूद हो सकते हैं। यदि ऐसे अपशिष्ट का उचित उपचार नहीं किया जाता है, तो प्रदूषक नालों और भूजल तक पहुंच सकते हैं।
SANDRP की ओर से तैयार किए गए नक्शे के अनुसार, औद्योगिक कचरा अंबड के नालों में बहाया जाता है, जो आगे जाकर गोदावरी की सहायक नदी नंदिनी में मिलते हैं। इस स्थिति ने न केवल भूजल, बल्कि नदी के पानी की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता पैदा की है।
SANDRP की एसोसिएट कोऑर्डिनेटर परिणीता दांडेकर ने इस स्थिति को जनस्वास्थ्य के लिए आपातकालीन परिस्थिति बताया। उन्होंने कहा, “यह जनस्वास्थ्य के लिए एक आपातकालीन स्थिति है। इसके लिए सिर्फ एक कंपनी नहीं, बल्कि कई उद्योग जिम्मेदार हैं।” उन्होंने आगे कहा, “यहां लगभग 20,000 लोग रहते हैं जो इस दूषित भूजल के संपर्क में हैं, और कुंभ मेले के दौरान यहाँ लाखों लोग और आएंगे।”
उनके बयान के मुताबिक, अंबड में करीब 20,000 लोगों के दूषित भूजल के संपर्क में आने की आशंका है। हालांकि, प्रभावित आबादी और जल प्रदूषण के वास्तविक दायरे की पुष्टि के लिए व्यापक जांच आवश्यक होगी।
कुंभ मेला-2027 से पहले नंदिनी और गोदावरी के पानी की जांच की मांग
वर्ष 2027 में नासिक में गोदावरी नदी के किनारे कुंभ मेले का आयोजन प्रस्तावित है। अंबड का प्रदूषित क्षेत्र आयोजन स्थल से 10 किलोमीटर से भी कम दूरी पर बताया गया है। ऐसे में भूजल प्रदूषण का यह मामला स्थानीय आबादी के साथ-साथ आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा और जल स्रोतों की गुणवत्ता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो गया है।
SANDRP की रिपोर्ट में नगर प्रशासन से प्रभावित क्षेत्र में स्वास्थ्य शिविर आयोजित करने, सभी MIDC औद्योगिक इकाइयों की फॉरेंसिक जांच कराने और नंदिनी तथा गोदावरी नदियों के पानी के नमूनों की जांच करने की मांग की गई है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि औद्योगिक प्रदूषण नदियों तक किस हद तक पहुंचा है और उससे पर्यावरण तथा जनस्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
कुंभ मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की संभावना को देखते हुए जल स्रोतों की गुणवत्ता, औद्योगिक अपशिष्ट के उपचार और नियमित निगरानी का महत्व बढ़ जाता है। हालांकि, नदियों के पानी में क्रोमियम की मौजूदगी और प्रदूषण के स्तर की पुष्टि के लिए अलग से नमूना परीक्षण आवश्यक होगा।
स्थायी समाधान और नियमित निगरानी की जरूरत
नासिक के अंबड में पीले रंग के पानी और क्रोमियम की अत्यधिक मात्रा का मामला औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण के सामने गंभीर चुनौती के रूप में उभरा है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से 17 औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का नोटिस दिया जाना और अतिरिक्त बोरवेलों के नमूने जांच के लिए भेजना इस मामले में चल रही कार्रवाई का हिस्सा है। वहीं, पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने पुराने रिकॉर्ड, स्थानीय शिकायतों और औद्योगिक अपशिष्ट के निपटारे को लेकर स्थायी समाधान की आवश्यकता जताई है।
कुंभ मेला-2027 से पहले इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कदम भूजल प्रदूषण के स्रोतों की पहचान, प्रभावित जल स्रोतों की व्यापक जांच, औद्योगिक इकाइयों के नियमों के पालन की निगरानी और स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य की स्थिति का आकलन होगा। नंदिनी और गोदावरी के पानी की जांच से प्रदूषण के संभावित फैलाव को समझने में मदद मिल सकती है। अंबड में सामने आया यह मामला स्पष्ट करता है कि सुरक्षित पेयजल, स्वच्छ पर्यावरण और औद्योगिक गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित करना स्थानीय नागरिकों की सुरक्षा के साथ-साथ आगामी कुंभ मेले की तैयारियों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
