कभी-कभी राजनीति में जीत केवल किसी योजना को लागू या रोक देने से नहीं होती, बल्कि शर्तों को अपने पक्ष में मोड़ देने से होती है। केरल में PM SHRI योजना को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया है, उसे कई राजनीतिक विश्लेषक इसी नजरिए से देख रहे हैं। एक तरफ केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी शिक्षा योजना को मंजूरी मिली, दूसरी तरफ राज्य सरकार ने शिक्षा नीति, स्कूल चयन और क्रियान्वयन पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश की। यही वजह है कि मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन का यह कदम अब सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।मोदी-सतीशन मुलाकात: राजनीति, संवाद और रणनीति की तस्वीर

मोदी-सतीशन मुलाकात: राजनीति, संवाद और रणनीति की तस्वीर

PM SHRI योजना पर क्यों था इतना बड़ा विवाद?

PM SHRI (प्रधानमंत्री स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया) योजना को केंद्र सरकार ने सितंबर 2022 में लॉन्च किया था। इसका उद्देश्य देशभर के सरकारी स्कूलों को आधुनिक सुविधाओं से लैस ‘मॉडल स्कूल’ में बदलना है। योजना राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) से भी जुड़ी हुई है और इसके तहत हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। हालांकि, दक्षिण भारत के कई राज्यों में इस योजना को लेकर राजनीतिक और वैचारिक आपत्तियां सामने आईं। तमिलनाडु और केरल में लंबे समय तक यह तर्क दिया गया कि शिक्षा राज्यों का विषय है और केंद्र के बढ़ते हस्तक्षेप से राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। इसी कारण PM SHRI योजना इन राज्यों में राजनीतिक बहस का विषय बनी रही। केरल में पूर्ववर्ती वामपंथी सरकार और केंद्र के बीच भी इसी मुद्दे पर टकराव देखने को मिला था।

खाली खजाना और ₹1400 करोड़ का दबाव

केरल लंबे समय से वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है। इसी बीच केंद्र द्वारा शिक्षा क्षेत्र से जुड़े करीब ₹1400 करोड़ के फंड का मुद्दा राज्य सरकार के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया। रिपोर्टों के अनुसार, पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की सरकार इस योजना को लेकर केंद्र से समझौते की दिशा में आगे बढ़ चुकी थी और शुरुआती फंड भी प्राप्त कर चुकी थी। नई सरकार के सामने दुविधा यह थी कि अगर योजना को पूरी तरह खारिज किया जाता है तो शिक्षा क्षेत्र के लिए जरूरी वित्तीय सहायता प्रभावित हो सकती है। वहीं, बिना शर्त योजना स्वीकार करना कांग्रेस और उसके सहयोगियों के राजनीतिक रुख के विपरीत माना जाता। ऐसे में वी.डी. सतीशन ने बीच का रास्ता तलाशने की रणनीति अपनाई, जिसने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया।

सतीशन का ‘मास्टरस्ट्रोक’: पैसा भी, नियंत्रण भी

मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन ने PM SHRI योजना को सैद्धांतिक मंजूरी देने के साथ कई महत्वपूर्ण शर्तें जोड़ दीं। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि स्कूलों में क्या पढ़ाया जाएगा, पाठ्यक्रम का स्वरूप क्या होगा और शिक्षा संबंधी नीतिगत फैसले कौन लेगा-इन सभी विषयों पर अंतिम अधिकार केरल सरकार के पास रहेगा। इसके अलावा योजना की निगरानी और क्रियान्वयन के लिए चार मंत्रियों की एक उच्च स्तरीय कैबिनेट उप-समिति गठित की गई। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना बताया गया कि केंद्र से मिलने वाला फंड स्कूलों के बुनियादी ढांचे, स्मार्ट क्लास, लैब और अन्य सुविधाओं पर खर्च हो, जबकि शैक्षणिक दिशा-निर्देशों पर राज्य की नीति ही लागू रहे।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम से केरल सरकार ने केंद्र के साथ टकराव से बचते हुए अपने अधिकार क्षेत्र को भी सुरक्षित रखने का प्रयास किया है।

राष्ट्रीय राजनीति के लिए क्या है संदेश?

केरल का यह मॉडल केवल एक राज्य का प्रशासनिक फैसला नहीं माना जा रहा। इसे केंद्र और राज्यों के संबंधों, संघीय ढांचे और शिक्षा नीति को लेकर चल रही राष्ट्रीय बहस के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। खासकर ऐसे समय में जब तमिलनाडु सहित कई राज्य शिक्षा और भाषा नीति पर केंद्र से अलग रुख अपनाए हुए हैं। केरल ने संकेत दिया है कि केंद्र की योजनाओं को स्वीकार करने का मतलब यह नहीं कि राज्य अपने अधिकार छोड़ देंगे। वहीं, विपक्षी दलों के लिए यह एक उदाहरण भी बन सकता है कि वित्तीय जरूरतों और राजनीतिक सिद्धांतों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।फिलहाल इतना तय है कि PM SHRI योजना केरल में लागू होगी, लेकिन उसकी दिशा और स्वरूप पर अंतिम नियंत्रण तिरुवनंतपुरम के पास रहेगा। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को कई राजनीतिक पर्यवेक्षक ‘फंड भी मिला, नियंत्रण भी बचा’ वाली रणनीति के तौर पर देख रहे हैं।