पटना का मुसल्लहपुर इलाका वर्षों से बिहार का सबसे बड़ा कोचिंग हब माना जाता है। यहां हजारों छात्र सरकारी नौकरी की तैयारी के लिए आते हैं और उनकी पहचान सिर्फ एक अभ्यर्थी के रूप में होती है, न कि जाति या धर्म के आधार पर। लेकिन बिहार पुलिस सिपाही भर्ती परीक्षा के रिजल्ट को लेकर शुरू हुई दो बड़े कोचिंग संस्थानों की प्रतिस्पर्धा अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां इसे ‘मुस्लिम बनाम यादव’ और ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ की लड़ाई के तौर पर पेश किया जा रहा है। यह विवाद सिर्फ दो कोचिंग संस्थानों के बीच वर्चस्व की लड़ाई था या फिर इसे जानबूझकर सामाजिक और राजनीतिक रंग दिया गया? यही सवाल अब चर्चा के केंद्र में है।
खान सर-रोशन आनंद विवाद
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
मामले की शुरुआत बिहार पुलिस सिपाही भर्ती परीक्षा के परिणामों के बाद हुई। पटना के मुसल्लहपुर स्थित खान ग्लोबल स्टडीज और ज्ञान बिंदु जीएस एकेडमी दोनों ने बड़ी संख्या में अपने छात्रों के चयन का दावा किया। बताया जाता है कि खान ग्लोबल स्टडीज ने एक पोस्टर लगाया, जिसमें करीब 12 हजार छात्रों के चयन का दावा किया गया था। दूसरी ओर ज्ञान बिंदु जीएस एकेडमी ने लगभग 10 हजार छात्रों के सफल होने की बात कही। विवाद तब बढ़ा जब खान ग्लोबल स्टडीज का पोस्टर कथित तौर पर ज्ञान बिंदु के साइनबोर्ड के ऊपर लगाया गया !दोनों संस्थानों के बीच पहले से मौजूद प्रतिस्पर्धा ने इसी मुद्दे पर टकराव का रूप ले लिया।
विवाद से हिंसा तक
2 जून की रात मामला अचानक गंभीर हो गया। खान ग्लोबल स्टडीज की ओर से आरोप लगाया गया कि ज्ञान बिंदु से जुड़े लोगों ने कोचिंग परिसर में घुसकर हंगामा किया, सुरक्षा कर्मियों के साथ मारपीट की और पथराव किया। घटना के दौरान गोली चलने की भी बात सामने आई। शुरुआत में पुलिस ने फायरिंग से इनकार किया, लेकिन बाद में सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर जांच शुरू हुई। जांच में खान सर के दो निजी सुरक्षा कर्मियों की भूमिका सामने आई, जिन्हें गिरफ्तार कर पूछताछ की गई !पुलिस के अनुसार पूछताछ में सुरक्षा कर्मियों ने स्वीकार किया कि उन्होंने हवा में गोलियां चलाई थीं। इसके बाद खान सर के खिलाफ भी मामला दर्ज हुआ। हालांकि पटना हाईकोर्ट ने फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा रखी है। दूसरी ओर ज्ञान बिंदु जीएस एकेडमी के संचालक रोशन आनंद की गिरफ्तारी हुई और उनकी जमानत याचिका भी खारिज कर दी गई।
पटना कोचिंग विवाद पर घमासान | फोटो: क्विंट हिंदी
कब आया जाति और धर्म का एंगल?
शुरुआत में पूरा मामला केवल दो कोचिंग संस्थानों के बीच व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और प्रतिष्ठा की लड़ाई माना जा रहा था। लेकिन धीरे-धीरे सोशल मीडिया पर इस विवाद की दिशा बदलने लगी। खान सर की पहचान मुस्लिम शिक्षक के रूप में और रोशन आनंद की पहचान यादव समुदाय से जुड़े व्यक्ति के रूप में उभारी जाने लगी। कुछ सोशल मीडिया अकाउंट्स और संगठनों ने इसे सीधे तौर पर ‘यादव बनाम मुस्लिम’ संघर्ष बताना शुरू कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की राजनीति में यादव और मुस्लिम समुदाय लंबे समय से एक प्रभावशाली सामाजिक-राजनीतिक गठजोड़ का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में इस विवाद को उसी नजरिए से देखने की कोशिशें भी शुरू हो गईं।
सोशल मीडिया ने कैसे बढ़ाया विवाद?
विवाद के बाद कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर खान सर के खिलाफ अभियान जैसा माहौल दिखाई दिया। कुछ दक्षिणपंथी संगठनों और सोशल मीडिया हैंडल्स ने उन्हें निशाना बनाते हुए विवादास्पद पोस्ट साझा किए। कुछ यूट्यूब चैनलों और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने भी मामले को सिर्फ कोचिंग विवाद की बजाय पहचान की राजनीति से जोड़कर पेश किया। वहीं दूसरी ओर खान सर के समर्थकों ने इसे एक लोकप्रिय शिक्षक को बदनाम करने की कोशिश बताया। यहीं से कोचिंग संस्थानों की प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे सामाजिक और राजनीतिक बहस में बदलती चली गई।
मुसल्लहपुर कोचिंग विवाद | फोटो: क्विंट हिंदी
छात्रों और शिक्षकों की राय अलग
दिलचस्प बात यह है कि मुसल्लहपुर में पढ़ाने वाले अधिकांश शिक्षक और वहां तैयारी कर रहे छात्र इस विवाद को सांप्रदायिक या जातीय संघर्ष मानने से इनकार करते हैं। स्थानीय शिक्षकों का कहना है कि यहां वर्षों से अलग-अलग समुदायों के शिक्षक पढ़ाते रहे हैं और छात्रों ने कभी जाति या धर्म के आधार पर शिक्षक नहीं चुने। छात्रों की प्राथमिकता हमेशा बेहतर पढ़ाई और नौकरी रही है। कई छात्रों का कहना है कि वे एक ही समय में अलग-अलग कोचिंग संस्थानों के शिक्षकों से पढ़ते हैं, नोट्स साझा करते हैं और उनकी नजर में शिक्षक की पहचान से ज्यादा उसकी पढ़ाने की क्षमता मायने रखती है।
‘खान सर’ से ‘फैसल खान’ तक
इस विवाद के दौरान एक और दिलचस्प बदलाव देखने को मिला। लंबे समय तक राष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया पर ‘खान सर’ के नाम से लोकप्रिय रहे शिक्षक को अचानक कई मंचों पर उनके वास्तविक नाम ‘फैसल खान’ से संबोधित किया जाने लगा। विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव भी विवाद को व्यक्तिगत और धार्मिक पहचान से जोड़ने की कोशिशों का हिस्सा बन गया।
कोचिंग जंग से बढ़ा सियासी बवाल
क्या कोचिंग की लड़ाई समाज तक पहुंच रही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि मूल रूप से यह मामला दो बड़े कोचिंग संस्थानों के बीच वर्चस्व, प्रतिष्ठा और बाजार हिस्सेदारी की लड़ाई का था। लेकिन सोशल मीडिया और राजनीतिक विमर्श ने इसे एक बड़े सामाजिक विवाद का रूप दे दिया !सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार के कोचिंग हब में शुरू हुई यह प्रतिस्पर्धा अब छात्रों के बीच भी सामाजिक विभाजन पैदा करेगी, या फिर यह विवाद कुछ समय बाद केवल कानूनी और प्रशासनिक जांच तक सीमित रह जाएगा। फिलहाल पुलिस जांच जारी है, अदालत में मामला विचाराधीन है और सोशल मीडिया पर बहस थमने का नाम नहीं ले रही। लेकिन मुसल्लहपुर के अधिकांश छात्र अब भी यही कहते हैं-उनके लिए शिक्षक की पहचान नहीं, चयन और सफलता सबसे महत्वपूर्ण है।
