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लेखक: असगर अली अंसारी
भारत में जब भी चुनाव आते हैं, एक सवाल फिर से हवा में तैरने लगता है हिंदू या मुसलमान? ऐसा लगता है जैसे यही देश का सबसे बड़ा मुद्दा हो। लेकिन सच यह है कि यह बहस आज की नहीं, सौ साल से भी पुरानी है। इसकी जड़ें आज़ादी से पहले की राजनीति में हैं। अगर हम इतिहास को ईमानदारी से पढ़ें, तो समझ आएगा कि हम कहाँ चूके और भविष्य का रास्ता क्या हो सकता है।
धर्म के नाम पर राजनीति की शुरुआत
30 दिसंबर 1906 को ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। उस समय लीग का कहना था कि कांग्रेस में मुसलमानों की राजनीतिक आवाज़ को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा है। इसके कुछ वर्ष बाद, 1915 में हिंदू महासभा का गठन हुआ। पंडित मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय और कई अन्य नेता इससे जुड़े। उनका मानना था कि यदि मुसलमानों का अलग राजनीतिक संगठन हो सकता है, तो हिंदुओं का भी अपना राजनीतिक मंच होना चाहिए। यहीं से भारतीय राजनीति में धर्म के आधार पर प्रतिनिधित्व की राजनीति मजबूत होने लगी। आने वाले वर्षों में धर्म केवल आस्था का विषय नहीं रहा, बल्कि चुनाव और सत्ता की राजनीति का भी हिस्सा बन गया।
इतिहास का वह पन्ना जिसे अक्सर भुला दिया जाता है
आज आम धारणा यह है कि मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा हमेशा एक-दूसरे के कट्टर विरोधी थे। वैचारिक रूप से यह बात काफी हद तक सही भी है। लेकिन इतिहास का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर बहुत कम चर्चा होती है। 1937 के चुनावों के बाद और आगे चलकर बंगाल तथा सिंध जैसे कुछ प्रांतों में मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा ने सत्ता में सहयोग किया। बंगाल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी वित्त मंत्री बने। यह इतिहास का दर्ज तथ्य है कि जिन दलों को जनता एक-दूसरे का सबसे बड़ा विरोधी मानती थी, वे राजनीतिक परिस्थितियों में साथ भी काम कर सकते थे। इससे एक महत्वपूर्ण बात समझ में आती है, राजनीति में विचारधारा महत्वपूर्ण होती है, लेकिन सत्ता की राजनीति कई बार अलग रास्ता चुन लेती है। जनता वर्षों तक लड़ती रहती है, जबकि नेता समय आने पर साथ बैठ जाते हैं।
मुसलमानों के सामने दो रास्ते
उस समय मुस्लिम समाज के सामने दो बड़े नेता थे। एक तरफ मोहम्मद अली जिन्ना थे। वे आधुनिक शिक्षा प्राप्त, पश्चिमी जीवन-शैली अपनाने वाले और बाद में पाकिस्तान की मांग के सबसे बड़े नेता बने। दूसरी तरफ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे। वे इस्लामी शिक्षा के बड़े विद्वान थे, कुरआन के गहरे जानकार थे और साथ ही भारत की साझी संस्कृति तथा हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे मजबूत समर्थकों में से एक थे। वे कांग्रेस के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष बने और जीवन भर संयुक्त भारत की बात करते रहे। इतिहास आज भी यह सवाल पूछता है कि मौलाना आज़ाद जैसे विद्वान और राष्ट्रवादी नेता के रहते हुए बड़ी संख्या में मुसलमानों का राजनीतिक समर्थन जिन्ना के साथ क्यों गया? इसका उत्तर केवल किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों, अंग्रेज़ों की नीतियों, आपसी अविश्वास और नेतृत्व की रणनीतियों में छिपा है।
दो हत्याएँ, जिन्होंने देश को झकझोर दिया
1947 में देश आज़ाद हुआ, लेकिन साथ ही विभाजन का दर्द भी मिला। लाखों लोग उजड़ गए और दोनों तरफ भारी हिंसा हुई। ऐसे समय में महात्मा गांधी लगातार हिंदू-मुस्लिम एकता की बात कर रहे थे। वे चाहते थे कि नफरत की आग बुझाई जाए। 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या कर दी गई। गांधी जी की हत्या केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि यह भारत की आत्मा पर हमला था। इस घटना ने देश को यह संदेश दिया कि कट्टरता किसी भी विचारधारा की हो, उसका सबसे बड़ा नुकसान देश को होता है। दूसरी बड़ी घटना 31 अक्टूबर 1984 को हुई, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों ने हत्या कर दी। यह घटना ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद बने तनावपूर्ण माहौल में हुई। इसके बाद देश ने भयावह सिख-विरोधी हिंसा भी देखी। यह घटना भी हमें बताती है कि जब समाज में नफरत बढ़ती है, तो उसकी कीमत पूरे देश को चुकानी पड़ती है।
एक फैसला जिसने राजनीति की दिशा बदल दी
महात्मा गांधी की हत्या के बाद भी भारत ने लोकतंत्र और संविधान के रास्ते पर आगे बढ़ने का फैसला किया। देश ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन सबसे बड़ा मोड़ 1984 के बाद आया। 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके अंगरक्षकों ने कर दी। यह घटना ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद बने तनावपूर्ण माहौल में हुई। इसके बाद देश ने सिख-विरोधी हिंसा का दर्द भी झेला। यह घटना हमें याद दिलाती है कि जब नफरत बढ़ती है, तो उसकी आग किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती। इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद हुए चुनाव में राजीव गांधी को स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे बड़ा बहुमत मिला। लोगों को उम्मीद थी कि अब देश विकास और आधुनिक भारत की ओर तेज़ी से बढ़ेगा। लेकिन उनके कार्यकाल में दो ऐसे फैसले हुए, जिन्होंने आने वाले कई दशकों की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।
शाहबानो मामला और दूसरा फैसला
1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने 62 वर्षीय शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया और उन्हें भरण-पोषण का अधिकार दिया। इस फैसले का कुछ मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया। राजनीतिक दबाव के बीच संसद ने कानून बनाकर उस फैसले के प्रभाव को सीमित कर दिया। इस फैसले की आलोचना भी हुई। कई लोगों का मानना था कि सरकार ने न्याय और समान अधिकारों की जगह वोट बैंक की राजनीति को प्राथमिकता दी। इसी दौर में 1986 में अयोध्या स्थित विवादित स्थल के ताले खुलवाने का फैसला हुआ। इसे भी बहुत लोगों ने राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा। चाहे उस समय की सरकार की मंशा जो भी रही हो, इन दोनों घटनाओं ने धार्मिक मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। इसके बाद भारतीय राजनीति का स्वर बदलने लगा। मंदिर-मस्जिद का सवाल धीरे-धीरे विकास, शिक्षा और रोज़गार जैसे मुद्दों पर भारी पड़ने लगा।
फिर शुरू हुआ लंबा टकराव
1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन, रथयात्रा और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ। इसके बाद देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा हुई। आगे चलकर बम धमाके हुए, 2002 में गोधरा कांड हुआ और उसके बाद गुजरात में भीषण दंगे हुए। इन सभी घटनाओं में सबसे अधिक नुकसान आम लोगों का हुआ। जिन लोगों का राजनीति से कोई संबंध नहीं था, उन्होंने अपनी जान, अपना घर, अपना कारोबार और अपने परिवार खो दिए। हर घटना के बाद नेताओं के भाषण बदलते रहे, सरकारें बदलती रहीं, लेकिन आम आदमी का दर्द वही रहा।
असली सच, जिसे देखने की ज़रूरत है
अगर हम आज ज़मीन पर उतरकर देखें, तो एक अलग तस्वीर दिखाई देती है। देश के बड़े-बड़े धार्मिक नेताओं को देखिए। चाहे देवबंद के उलेमा हों, बरेली के धर्मगुरु हों, बड़े मंदिरों के पुजारी हों या शंकराचार्य अक्सर उनके बीच संवाद, सम्मान और बातचीत बनी रहती है। लेकिन तनाव कहां दिखाई देता है? तनाव ज़्यादातर उन इलाकों में होता है जहां गरीबी है, बेरोज़गारी है, अच्छी शिक्षा नहीं है, अस्पताल नहीं हैं और भविष्य की उम्मीद कम है। जब पेट खाली हो और अवसर कम हों, तब धर्म के नाम पर लोगों को भड़काना आसान हो जाता है। यही वह सच्चाई है, जिस पर राजनीति कम और समाज को ज़्यादा सोचने की ज़रूरत है।
अब हमें अपने घर के अंदर भी झांकना होगा
दूसरों की गलतियां गिनाना आसान है, लेकिन किसी भी समाज की असली ताकत तब बनती है, जब वह अपनी कमियों को भी स्वीकार करे। मेरा मानना है कि मुस्लिम समाज के सामने आज दो बड़ी चुनौतियां हैं।
पहली चुनौती – सही नेतृत्व की कमी
अक्सर देखा गया है कि हमारे मोहल्लों में ईमानदार, पढ़े-लिखे और शांत स्वभाव के लोग नेतृत्व में आगे नहीं आ पाते। उनकी शराफत को कमजोरी समझ लिया जाता है। इसके विपरीत दबंग, ऊँची आवाज़ में बोलने वाले या डर पैदा करने वाले लोग जल्दी नेता बन जाते हैं। यह समस्या केवल मुस्लिम समाज की नहीं है, लगभग हर समाज में दिखाई देती है। लेकिन मुस्लिम समाज में इसका असर अधिक इसलिए दिखता है, क्योंकि शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी पहले से ही कम रही है। जब अच्छे लोग राजनीति से दूर रहेंगे, तो संसद और विधानसभाओं में समाज की समझदारी भरी आवाज़ कौन उठाएगा?
दूसरी चुनौती – बिरादरीवाद
हम अक्सर कहते हैं कि समाज को बाहर वालों ने बाँटा है। यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, लेकिन हमें अपने भीतर भी देखना होगा। हिंदू समाज में जाति व्यवस्था की चर्चा होती है। लेकिन मुसलमान भी बिरादरियों में बँटे हुए हैं। सैयद, शेख, पठान, अंसारी, मंसूरी, कुरैशी, धोबी, दर्जी और दूसरी कई बिरादरियाँ आज भी सामाजिक दूरी बनाए रखती हैं। कई जगह शादी-ब्याह, सामाजिक रिश्तों और मस्जिद कमेटियों तक में इसका असर दिखाई देता है। जब तक समाज अपने भीतर की इन दीवारों को नहीं गिराएगा, तब तक बराबरी और तरक्की का सपना अधूरा रहेगा।
बँटते हुए शहर
आज हमारे शहर भी धीरे-धीरे धर्म और बिरादरी के आधार पर बँटते जा रहे हैं। दिल्ली में ओखला, मुस्तफाबाद, सीलमपुर और देश के दूसरे शहरों में ऐसे कई इलाके हैं, जहाँ बड़ी आबादी रहती है, लेकिन विकास की रफ्तार बहुत धीमी है। अच्छी सड़कें, पार्क, सरकारी स्कूल, अस्पताल, पुस्तकालय और रोज़गार के अवसर वहाँ उतने नहीं पहुँच पाए, जितने पहुँचने चाहिए थे। यह केवल किसी एक समुदाय का नुकसान नहीं है। जब शहर का कोई हिस्सा विकास से पीछे रह जाता है, तो उसका असर पूरे शहर पर पड़ता है।
समाधान क्या है?
सवाल केवल यह नहीं कि गलती किसकी थी। असली सवाल यह है कि आगे क्या किया जाए। मेरी नज़र में इसका सबसे बड़ा समाधान तीन शब्दों में है, समान शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य और सम्मानजनक रोज़गार। जिस दिन एक उद्योगपति का बेटा और रिक्शा चलाने वाले का बेटा एक ही स्तर की सरकारी शिक्षा पाएँगे, उस दिन उनके बीच की दूरी अपने आप कम होने लगेगी। जिस दिन सरकारी अस्पताल में हर नागरिक को बिना भेदभाव के अच्छी चिकित्सा मिलेगी, उस दिन लोगों का भरोसा व्यवस्था पर बढ़ेगा। और जिस दिन युवाओं को सम्मानजनक रोज़गार मिलेगा, उस दिन नफरत फैलाने वालों की ज़मीन अपने आप कमजोर पड़ जाएगी। आज शिक्षा का अर्थ केवल पढ़ना-लिखना नहीं है। बच्चों को संविधान, वैज्ञानिक सोच, डिजिटल साक्षरता और दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान भी सिखाना होगा। अगर नई पीढ़ी सवाल पूछना सीखेगी, तो वह अफवाहों और नफरत की राजनीति का आसान शिकार नहीं बनेगी।
आख़िरी बात
पिछले सौ वर्षों का इतिहास हमें यह नहीं सिखाता कि कौन-सा धर्म सही था और कौन-सा गलत। इतिहास हमें यह सिखाता है कि जब भी धर्म को सत्ता पाने का सबसे बड़ा हथियार बनाया गया, तब सबसे ज़्यादा नुकसान आम लोगों ने उठाया। मंदिर भी इस देश के हैं, मस्जिद भी इसी देश की हैं। लेकिन स्कूल, अस्पताल, विश्वविद्यालय, अदालत और संविधान भी इसी देश के हैं। यदि हमारी राजनीति का केंद्र शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, न्याय और समान अवसर बन जाए, तो धार्मिक तनाव अपने आप कम होने लगेगा। भारत को विश्व की अग्रणी शक्ति बनना है, तो उसे अतीत से सीख लेकर भविष्य की ओर बढ़ना होगा। धर्म व्यक्ति की आस्था का विषय रहे, लेकिन राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा नागरिक का जीवन, उसकी शिक्षा, उसका स्वास्थ्य और उसका सम्मान बने। यही महात्मा गांधी के सपनों का भारत होगा, यही संविधान की भावना का भारत होगा और यही वह भारत होगा, जहाँ आने वाली पीढ़ियाँ धर्म के नाम पर नहीं, बल्कि अपने ज्ञान, मेहनत और इंसानियत के आधार पर पहचानी जाएँगी।
