ere | Source: eereगर्मी से राहत पाने के लिए आमतौर पर पंखे, कूलर और एयर कंडीशनर का सहारा लिया जाता है, लेकिन अगर बिना बिजली और बिना एयर कंडीशनर के हवा को ठंडा किया जा सके तो यह किसी आश्चर्य से कम नहीं होगा। ऑस्ट्रिया की ग्राज यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने ऐसी ही एक तकनीक विकसित की है। शोधकर्ताओं ने 3डी प्रिंटिंग की मदद से विशेष सिरेमिक क्यूब तैयार किए हैं, जो पानी और प्राकृतिक वायु प्रवाह के जरिए आसपास की हवा को ठंडा करने में सक्षम हैं।

मिट्टी के घड़े की पुरानी तरकीब को मिली आधुनिक तकनीक

इस तकनीक की खासियत यह है कि इसका मूल सिद्धांत नया नहीं है। यह सदियों पुरानी वाष्पीकरण आधारित शीतलन तकनीक पर काम करता है। जिस तरह मिट्टी का घड़ा पानी को सोखकर धीरे-धीरे उसे वाष्प में बदलता है और आसपास की गर्मी को खींचकर पानी को ठंडा रखता है, उसी सिद्धांत को शोधकर्ताओं ने आधुनिक डिजाइन और 3डी प्रिंटिंग के साथ विकसित किया है।

ग्राज यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के वास्तुकला और मीडिया संस्थान से जुड़े इस प्रोजेक्ट में शोधकर्ताओं ने मिट्टी, लकड़ी के बुरादे और फंगल कल्चर का इस्तेमाल करके बेहद छिद्रयुक्त सिरेमिक सामग्री तैयार की। इसका उद्देश्य पानी को सिरेमिक के भीतर अधिक प्रभावी तरीके से फैलाना और वाष्पीकरण की प्रक्रिया को तेज करना है।

करीब 9 इंच के क्यूब में छिपा है पूरा विज्ञान

शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रत्येक क्यूब की हर तरफ की लंबाई लगभग 9 इंच होती है। इसे पहले डिजिटल रूप से तैयार किया जाता है और फिर मिट्टी के मिश्रण से 3डी प्रिंट किया जाता है। इसके बाद प्रिंट की गई मिट्टी को कम तापमान पर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया से ऐसी सिरेमिक सामग्री तैयार होती है, जिसमें बड़ी संख्या में छोटे-छोटे छेद मौजूद रहते हैं।

इस डिजाइन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका टीपीएमएस ढांचा है। इस विशेष संरचना की मदद से कम सामग्री में भी पानी के फैलने के लिए अधिक सतह उपलब्ध हो जाती है। पानी सिरेमिक के बारीक छिद्रों में अपने आप सोख लिया जाता है और धीरे-धीरे पूरे ढांचे में फैलता है।

पानी भाप बनता है और आसपास की गर्मी खींच लेता है

जब सिरेमिक के भीतर मौजूद पानी सतह पर पहुंचता है तो वह धीरे-धीरे वाष्प में बदलता है। पानी के वाष्पीकरण की इस प्रक्रिया के दौरान आसपास की हवा से गर्मी खिंचती है। इसका परिणाम यह होता है कि क्यूब के आसपास की हवा का तापमान कम होने लगता है।

शोधकर्ता मिलिना स्टावरिक के अनुसार, यह तकनीक मूल रूप से उसी प्राकृतिक प्रक्रिया को आधुनिक रूप देती है, जिसका इस्तेमाल सदियों से मिट्टी के घड़ों और पारंपरिक विंड टावरों में किया जाता रहा है। अंतर यह है कि 3डी प्रिंटिंग की मदद से अब सिरेमिक का आकार और अंदरूनी संरचना अधिक सटीक तरीके से तैयार की जा सकती है।

फंगल कल्चर और लकड़ी के बुरादे से तैयार हुए खास छेद

इस तकनीक को अधिक प्रभावी बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने प्रिंटिंग से पहले मिट्टी में फंगल कल्चर और लकड़ी का बुरादा भी मिलाया। इसके बाद सामग्री के भीतर माइसीलियम यानी फंगल फिलामेंट्स का धागेनुमा नेटवर्क विकसित होता है।

जब इस सामग्री को पकाया जाता है तो फंगल सामग्री और लकड़ी का बुरादा जलकर समाप्त हो जाता है। इसके बाद सिरेमिक के भीतर छोटे और बड़े छिद्रों का एक घना नेटवर्क बचता है। यही छिद्र पानी को तेजी से और समान रूप से फैलने में मदद करते हैं और वाष्पीकरण के जरिए शीतलन प्रभाव को बेहतर बनाते हैं।

परीक्षण में करीब 7 डिग्री सेल्सियस तक कम हुआ तापमान

शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का नियंत्रित परिस्थितियों में परीक्षण भी किया। ऑस्ट्रिया की न्यूसीडल झील की तलछट के साथ भी प्रयोग किए जा रहे हैं। वहीं, ग्राज यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी में किए गए नियंत्रित क्षेत्र परीक्षण में पानी से भरे एक क्यूब को गर्म अटारी में रखा गया और उसके आसपास के तापमान पर निगरानी की गई।

परीक्षण के दौरान क्यूब के ठीक आसपास की हवा का तापमान लगभग 7 डिग्री सेल्सियस यानी 12.6 डिग्री फारेनहाइट तक कम पाया गया। यह परिणाम इस तकनीक की संभावित क्षमता को दिखाता है। हालांकि इसका प्रभाव आसपास की परिस्थितियों, पानी की उपलब्धता और वायु प्रवाह जैसे कारकों पर निर्भर करता है।

पूरे कमरे में ठंडक पहुंचाने की दिशा में बड़ा प्रयोग

शोधकर्ता क्रिस्टिजन रिस्टोस्की ने बताया कि इस तकनीक से पूरे कमरे में शीतलन का प्रभाव महसूस किया जा सकता है। उन्होंने क्यूब और पानी की आपूर्ति को जोड़कर एक शीतलन दीवार बनाने पर अपनी मास्टर थीसिस भी तैयार की थी।

ग्राज स्थित ग्राज यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के कैंपस न्यू टेक्निक में अब 2 गुणा 2 मीटर यानी करीब 6.6 गुणा 6.6 फीट की एक प्रदर्शन दीवार तैयार की गई है। आम लोग वहां जाकर इस तकनीक को देख सकते हैं और इसके प्रभाव को महसूस कर सकते हैं। इसके अलावा ग्राज के म्यूजियम ऑफ परसेप्शन में भी इसका एक दूसरा संयोजन लगाया गया है।

एयर कंडीशनर के मुकाबले क्यों खास है यह तकनीक?

एयर कंडीशनिंग व्यवस्था को चलाने के लिए बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है। एयर कंडीशनर कमरे के अंदर की गर्मी को बाहर निकालते हैं और इस प्रक्रिया में ऊर्जा की खपत होती है। दूसरी ओर, सिरेमिक आधारित वाष्पीकरण शीतलन में बिजली की आवश्यकता नहीं होती। इसमें मुख्य रूप से पानी और प्राकृतिक या निष्क्रिय वायु प्रवाह की जरूरत होती है।

इस वजह से शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि भविष्य में ऐसी तकनीक उन जगहों के लिए उपयोगी हो सकती है, जहां बिजली की उपलब्धता सीमित है या जहां ऊर्जा की खपत कम करने की आवश्यकता है। साथ ही, यह पारंपरिक एयर कंडीशनिंग की तुलना में प्राकृतिक शीतलन के विकल्प को मजबूत कर सकती है।

गर्म इलाकों में कहां हो सकता है इस्तेमाल?

मिलिना स्टावरिक के अनुसार, इस परियोजना का उद्देश्य ऐसी जगहों तक शीतलन पहुंचाना है, जहां लोग गर्मी से सबसे ज्यादा परेशान होते हैं। शोधकर्ता अधिक ऊर्जा खर्च करने वाली एयर कंडीशनिंग व्यवस्था के विकल्प के तौर पर प्राकृतिक शीतलन के तरीकों पर काम कर रहे हैं।

इस तकनीक में मिट्टी की प्राकृतिक विशेषताओं को आधुनिक 3डी प्रिंटिंग से जोड़ा गया है। इससे सिरेमिक संरचना को जरूरत के अनुसार डिजाइन करना और उसके भीतर पानी के प्रवाह तथा वाष्पीकरण के लिए अधिक प्रभावी सतह तैयार करना संभव होता है।

पुरानी तकनीक का आधुनिक रूप बन सकता है भविष्य का विकल्प

ग्राज यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं का यह प्रयोग दिखाता है कि गर्मी से राहत पाने के लिए हमेशा बिजली पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है। मिट्टी के घड़े और पारंपरिक वायु टावरों जैसी सदियों पुरानी तकनीक को 3डी प्रिंटिंग और नई सामग्री विज्ञान के साथ जोड़कर शीतलन का आधुनिक तरीका तैयार किया जा सकता है।

पानी से भरे सिरेमिक क्यूब के आसपास लगभग 7 डिग्री सेल्सियस तक तापमान में कमी का परीक्षण इस तकनीक की संभावनाओं को सामने रखता है। हालांकि इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने से पहले अलग-अलग मौसम और परिस्थितियों में इसके प्रदर्शन का अध्ययन जरूरी होगा। फिलहाल यह तकनीक प्राकृतिक शीतलन की दिशा में एक दिलचस्प प्रयोग है, जो भविष्य में कम ऊर्जा वाली ठंडक के नए विकल्पों का रास्ता खोल सकती है।