erere | Source: erereनई दिल्ली। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की कक्षा 9वीं के छात्रों के लिए लागू की गई ‘थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। नई व्यवस्था के तहत कक्षा 9वीं के विद्यार्थियों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है, जिनमें दो भारतीय भाषाएं होना जरूरी है। इस नीति को लेकर दायर याचिका पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने विद्यार्थियों के सामने आने वाली व्यावहारिक समस्याओं का मुद्दा उठाया।

सत्र के बीच लागू हुआ नियम, किताब और शिक्षक नहीं होने का आरोप

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि नई भाषा नीति को 1 जुलाई से अचानक शैक्षणिक सत्र के बीच लागू किया गया। उनका तर्क था कि कक्षा 4-5 से अलग पैटर्न के तहत पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों पर अचानक नई व्यवस्था लागू होने से परेशानी पैदा हो रही है।

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि कई विद्यार्थियों के पास नई भाषाओं की किताबें तक उपलब्ध नहीं हैं। ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में योग्य शिक्षकों की उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या हो सकती है। अदालत के समक्ष यह सवाल उठाया गया कि यदि विद्यार्थियों को नई भाषाएं पढ़ाई जानी हैं तो उन्हें पढ़ाने के लिए पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षक कहां से आएंगे।

वकील ने यह भी कहा कि केवल ऑनलाइन किताबें उपलब्ध होने की जानकारी देना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि गांव और ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ने वाले बच्चों के सामने अलग तरह की व्यावहारिक चुनौतियां हो सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट में साफ हुआ- 9वीं में भाषा के कारण छात्र नहीं होंगे फेल

सुनवाई के दौरान छात्रों के लिए महत्वपूर्ण राहत की बात सामने आई। मुख्य न्यायाधीश और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि इस नीति के तहत केवल आंतरिक मूल्यांकन होगा। यदि कोई विद्यार्थी 9वीं कक्षा में नई भाषा से संबंधित आंतरिक मूल्यांकन में अपेक्षित स्तर हासिल नहीं कर पाता है, तब भी उसे रोका नहीं जाएगा और उसे 10वीं कक्षा में प्रमोट किया जाएगा।

इसका अर्थ यह है कि नई तीन-भाषा नीति के कारण विद्यार्थियों को 9वीं कक्षा में फेल करके रोके जाने की स्थिति नहीं होगी। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश ASG ने कहा कि सरकार भी बच्चों के हित का समर्थन करती है।

CJI बोले- नई भाषा लाई जा रही है तो शिक्षक उपलब्ध कराना भी जिम्मेदारी

सुनवाई के दौरान CJI ने शिक्षक उपलब्धता से जुड़े सवाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि बोर्ड नई भाषा लेकर आ रहा है तो उस भाषा को पढ़ाने के लिए शिक्षक उपलब्ध कराना भी उसकी जिम्मेदारी होगी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से किताबों और शिक्षकों की कमी को लेकर जो आशंकाएं जताई गई थीं, उन पर अदालत ने भी ध्यान दिया। सुनवाई के दौरान यह संकेत दिया गया कि यदि नई व्यवस्था लागू करने में वास्तविक समस्याएं बनी रहती हैं तो अदालत आगे उचित कदमों पर विचार कर सकती है।

CJI ने रखा भाषा सीखने का व्यापक विचार

सुनवाई के दौरान CJI ने भाषा सीखने को लेकर एक व्यापक विचार भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि ऐसा तंत्र क्यों न बनाया जाए जिसमें दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारत की भाषा सीखें और उत्तर भारत के लोग दक्षिण भारत की भाषा सीखें।

इस टिप्पणी के माध्यम से अदालत ने अलग-अलग भारतीय भाषाओं को सीखने और उनके बीच संवाद बढ़ाने की संभावना पर विचार किया। हालांकि, CJI ने यह भी माना कि नई व्यवस्था को लेकर विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में आशंकाएं होना स्वाभाविक है।

परेशानी जारी रही तो विशेषज्ञ समिति का विकल्प

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह संकेत भी दिया कि यदि नई भाषा नीति लागू करने के बाद विद्यार्थियों की व्यावहारिक समस्याएं बनी रहती हैं तो अदालत विशेषज्ञ समिति के गठन पर विचार कर सकती है। जरूरत पड़ने पर सरकार को आवश्यक दिशा-निर्देश देने की संभावना भी जताई गई।

इससे साफ है कि अदालत ने फिलहाल नीति से जुड़े व्यावहारिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया है। खास तौर पर विद्यार्थियों के लिए शिक्षकों और अध्ययन सामग्री की उपलब्धता जैसे मुद्दे सुनवाई में महत्वपूर्ण रहे।

क्या है CBSE की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी?

CBSE की नई व्यवस्था के तहत कक्षा 9वीं के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन करना अनिवार्य किया गया है। इनमें दो भाषाएं भारतीय भाषाएं होना जरूरी है। इसी व्यवस्था को लेकर याचिका दायर की गई थी, जिसमें मुख्य रूप से यह सवाल उठाया गया कि शैक्षणिक सत्र के बीच नई व्यवस्था लागू करने से विद्यार्थियों को किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से ग्रामीण विद्यार्थियों की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी स्कूलों में नई भाषाओं के लिए पर्याप्त योग्य शिक्षक और किताबें उपलब्ध नहीं हो सकती हैं।

छात्रों और अभिभावकों के लिए फिलहाल सबसे अहम बात

इस मामले की सुनवाई में विद्यार्थियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि नई भाषा नीति के तहत 9वीं कक्षा में केवल आंतरिक मूल्यांकन होगा और इस वजह से विद्यार्थी को 10वीं कक्षा में जाने से नहीं रोका जाएगा। इससे उन छात्रों और अभिभावकों को राहत मिल सकती है, जिन्हें नई भाषा पढ़ने को लेकर परीक्षा और कक्षा में रुकने की चिंता थी।

हालांकि, नई व्यवस्था से जुड़े अन्य व्यावहारिक सवाल अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। किताबों, योग्य शिक्षकों और ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ाई की सुविधा जैसे मुद्दे आगे भी महत्वपूर्ण रहेंगे।

आगे की सुनवाई में साफ हो सकती है तस्वीर

CBSE की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने छात्रों की चिंता और नई भाषा व्यवस्था के क्रियान्वयन से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने रखा है। अदालत ने एक तरफ यह स्पष्ट किया कि विद्यार्थी 9वीं में इस भाषा व्यवस्था के कारण रोके नहीं जाएंगे, वहीं दूसरी तरफ शिक्षकों और अन्य संसाधनों की उपलब्धता को लेकर उठाए गए सवालों पर भी ध्यान दिया।

फिलहाल अदालत ने यह संकेत दिया है कि यदि नई नीति के कारण समस्याएं बनी रहती हैं तो विशेषज्ञ समिति के गठन या सरकार को आवश्यक निर्देश देने पर विचार किया जा सकता है। ऐसे में छात्रों, अभिभावकों और स्कूलों की नजर अब इस मामले में आगे होने वाली न्यायिक कार्यवाही पर रहेगी।