
दर्शाती सांकेतिक तस्वीरSource : SOURCE: Freepik
गर्भावस्था के दौरान मां का खान-पान, स्वास्थ्य और जीवनशैली केवल उसके अपने शरीर को ही नहीं, बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के वर्तमान और भविष्य के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं। हालिया शोधों में सामने आए निष्कर्षों ने इस विषय को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक चीनी का सेवन, बढ़ा हुआ ब्लड शुगर स्तर और मोटापा बच्चों के जन्म के समय अधिक वजन का कारण बन सकते हैं। ऐसे बच्चों में आगे चलकर मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और कुछ प्रकार के कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है।
अधिक चीनी और बढ़े ब्लड शुगर का बच्चे के स्वास्थ्य पर प्रभाव
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में जन्म के समय अधिक वजन वाले यानी 'जायंट बेबी' के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। इसके साथ ही कम उम्र में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बढ़ते मामलों ने भी वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इन जोखिमों के पीछे गर्भावस्था के दौरान मां की स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
हालिया अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि गर्भावस्था के दौरान मां जो कुछ भी खाती-पीती है, उसका सीधा प्रभाव गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास पर पड़ता है। इसलिए चिकित्सक इस दौरान संतुलित और पौष्टिक आहार लेने की सलाह देते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भावस्था के समय बरती गई सावधानियां बच्चे को भविष्य में कई गंभीर बीमारियों से बचाने में मददगार हो सकती हैं।
एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन लोगों का जन्म ऐसे समय में हुआ, जब चीनी के सेवन पर सरकारी स्तर पर नियंत्रण था, उनमें जीवन के बाद के वर्षों में चिंता और अवसाद जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा अपेक्षाकृत कम देखा गया। यह निष्कर्ष गर्भावस्था के दौरान नियंत्रित मात्रा में चीनी के सेवन के महत्व को दर्शाता है।
दूसरी ओर, शोध बताते हैं कि यदि गर्भावस्था के दौरान मां मोटापे से ग्रस्त हो या उसका ब्लड शुगर स्तर सामान्य से अधिक हो, तो इसका असर गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास पर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में बच्चे का जन्म सामान्य से अधिक वजन के साथ हो सकता है और भविष्य में उसके मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग तथा कुछ प्रकार के कैंसर की चपेट में आने का खतरा बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि गर्भवती महिलाएं अपनी सेहत, वजन और खान-पान को लेकर सतर्क रहें तथा डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित जांच कराएं, तो बच्चों को भविष्य में कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
क्या होता है 'जायंट बेबी'?
चिकित्सकीय मानकों के अनुसार जन्म के समय बच्चे का सामान्य वजन 2.5 किलोग्राम से 4 किलोग्राम के बीच माना जाता है। यदि नवजात का वजन 4.5 किलोग्राम या उससे अधिक हो, तो उसे सामान्य भाषा में 'जायंट बेबी' कहा जाता है। वहीं चिकित्सा विज्ञान में जन्म के समय 4 किलोग्राम या उससे अधिक वजन वाले बच्चे की स्थिति को फीटल मैक्रोसोमिया (Fetal Macrosomia) कहा जाता है।
अमेरिका के येल स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों का जन्म के समय वजन अधिक था, उनमें 50 वर्ष की आयु से पहले बाउल कैंसर यानी आंतों के कैंसर का खतरा अधिक देखा गया। इससे पहले किए गए कई अध्ययनों में भी ऐसे बच्चों में आगे चलकर मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोग का जोखिम बढ़ने की बात सामने आ चुकी है।
गर्भ का वातावरण भी तय करता है भविष्य
विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल जन्म के समय बच्चे के अधिक वजन की नहीं है, बल्कि गर्भ के अंदर का वातावरण भी उसके भविष्य के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। गर्भावस्था के दौरान मिलने वाला पोषण, हार्मोन का संतुलन और मां के शरीर की जैविक परिस्थितियां बच्चे की कोशिकाओं और मेटाबॉलिज्म पर लंबे समय तक असर डाल सकती हैं।
लंदन के किंग्स कॉलेज में पोषण विज्ञान की विशेषज्ञ डॉ. कैथरीन डेलरिम्पल के अनुसार, जन्म के समय बच्चे का अधिक वजन इस बात का संकेत होता है कि गर्भ में उसका विकास किस प्रकार के वातावरण में हुआ। उनका कहना है कि गर्भधारण से पहले के कुछ महीनों से लेकर पूरी गर्भावस्था तक मां के स्वास्थ्य और जीवनशैली का सीधा असर बच्चे के विकास पर पड़ता है।
मां का बढ़ा हुआ ब्लड शुगर कैसे करता है असर?
विशेषज्ञों के अनुसार, जब गर्भवती महिला के खून में ग्लूकोज की मात्रा अधिक होती है, तो उसका कुछ हिस्सा प्लेसेंटा के माध्यम से बच्चे तक पहुंच जाता है। इसके बाद बच्चे का शरीर सामान्य से अधिक इंसुलिन बनाने लगता है।
इंसुलिन केवल रक्त में शुगर नियंत्रित करने वाला हार्मोन नहीं है, बल्कि यह एक ग्रोथ हार्मोन की तरह भी काम करता है। इसके कारण बच्चे की शारीरिक वृद्धि तेज हो सकती है और उसके शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा होने लगती है। परिणामस्वरूप बच्चे का वजन सामान्य से अधिक हो सकता है।
डॉ. कैथरीन डेलरिम्पल का कहना है कि यदि गर्भावधि मधुमेह (Gestational Diabetes) को समय पर नियंत्रित नहीं किया जाए, तो अतिरिक्त ग्लूकोज लगातार बच्चे तक पहुंचता रहता है। इससे बच्चे के विकास की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और भविष्य में मोटापा सहित कई चयापचय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि किसी गर्भवती महिला में गर्भावधि मधुमेह की पुष्टि होती है, तो उसे डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित जांच, संतुलित आहार, शारीरिक गतिविधि और आवश्यक उपचार का पालन करना चाहिए, ताकि मां और शिशु दोनों स्वस्थ रह सकें।
