आपातकाल 1975: भारतीय लोकतंत्र का सबसे विवादित दौर।

आपातकाल 1975: भारतीय लोकतंत्र का सबसे विवादित दौर।

आजादी के 28 साल बाद भारत ने अपने लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे विवादास्पद दौर का सामना किया। 25-26 जून 1975 की मध्यरात्रि को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी। अगले दिन रेडियो पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए इंदिरा गांधी ने कहा कि राष्ट्रपति ने आपातकाल लागू किया है और आम लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। हालांकि, इसके साथ ही देशभर में विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लागू कर दिए गए। यह दौर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जिस पर आज भी बहस जारी है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने बदला राजनीतिक घटनाक्रम

आपातकाल की पृष्ठभूमि 1971 के लोकसभा चुनाव से जुड़ी हुई थी। रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले राजनारायण ने उनकी जीत को अदालत में चुनौती दी थी। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया और उन पर छह वर्षों तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। अदालत ने चुनाव प्रचार में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग समेत कुछ आरोपों को सही माना था। इस फैसले के बाद विपक्ष ने इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग तेज कर दी, लेकिन उन्होंने पद छोड़ने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया। इसी दौरान गुजरात में जनता मोर्चा की जीत ने कांग्रेस नेतृत्व पर राजनीतिक दबाव और बढ़ा दिया।

25 जून की रात बनी गिरफ्तारी की सूची, मीडिया पर लगा पहरा

राजनीतिक संकट के बीच 25 जून 1975 की रात घटनाक्रम तेजी से बदला। आपातकाल लागू होने से पहले ही विपक्षी नेताओं और आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी की तैयारी शुरू हो चुकी थी। रिपोर्टों के अनुसार, प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े कुछ वरिष्ठ लोगों की मौजूदगी में उन नेताओं की सूची तैयार की गई जिन्हें हिरासत में लिया जाना था। वहीं, दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित कई प्रमुख अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई ताकि विपक्ष की रैलियों और घटनाओं की खबरें व्यापक स्तर पर प्रकाशित न हो सकें। इसके बाद प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई और समाचारों के प्रकाशन पर सरकारी निगरानी बढ़ा दी गई। सरकार ने इसे व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम बताया, जबकि आलोचकों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करार दिया।

मीसा, नसबंदी अभियान और आपातकाल का विवादित दौर

आपातकाल के दौरान मीसा (MISA) और डीआईआर जैसे कानूनों के तहत एक लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार किए जाने के दावे किए गए। लोकनायक जयप्रकाश नारायण सहित कई बड़े विपक्षी नेता लंबे समय तक जेल में रहे। इसी अवधि में संजय गांधी का प्रभाव भी तेजी से बढ़ा और उन्होंने परिवार नियोजन, वयस्क शिक्षा, दहेज उन्मूलन, वृक्षारोपण तथा जाति प्रथा के खिलाफ अभियान जैसे कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया। हालांकि, परिवार नियोजन अभियान सबसे ज्यादा विवादों में रहा। कई जगहों पर जबरन नसबंदी कराने के आरोप लगे और इसे लेकर सरकार की व्यापक आलोचना हुई। इसके अलावा दिल्ली के तुर्कमान गेट समेत कई इलाकों में अतिक्रमण हटाने और सौंदर्यीकरण अभियानों ने भी विवाद खड़े किए। करीब 21 महीने तक चले इस दौर के बाद 1977 में आम चुनाव हुए, जिनमें कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा और आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी राजनीतिक सीख बनकर इतिहास में दर्ज हो गया।