-डॉ. शोभित सुमन (जनसंचार अध्येता)
भारत में 25 जून सन् 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आंतरिक आपातकाल की घोषणा की थी। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसा काला अध्याय शुरू हुआ जिसने नागरिक अधिकारों के साथ-साथ प्रेस की स्वतंत्रता को भी पूरी तरह से कुचल दिया था। इस दौरान अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने के लिए सेंसरशिप का सहारा लिया गया। आपातकाल की नींव और इसकी सबसे प्रखर लपटें बिहार की धरती से निकले 'जेपी आंदोलन' से जुड़ी थीं, इसलिए बिहार की पत्रकारिता पर इसका सबसे क्रूर और गहरा असर पड़ा। यह बिहार के मीडिया जगत पर लगा एक भयावह ग्रहण कहा जा सकता है। आपातकाल लागू होते ही सबसे पहला प्रहार समाचार पत्रों पर ही हुआ और बिहार की पत्रकारिता उस प्रतिरोध का केंद्र बनीं। 
आपातकाल में बिहार की पत्रकारिता का संघर्ष | फोटो: AI (chatGPT)
बिहार में पत्रकारिता पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने क्षेत्रीय सेंसर अधिकारियों की नियुक्ति की थी। बेहद ही सख्त नियम लागू किए गए थे। बिना सरकारी अधिकारी की अनुमति और जांच के बिना अखबार का एक पन्ना भी नहीं छप सकता था। यहां तक कि विज्ञापनों और कविताओं पर भी निगरानी रखी जा रही थी। पटना से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र सर्चलाइट, प्रदीप, आर्यावर्त और इंडियन नेशन के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया था। संपादकीय पन्नों पर सरकार से जुड़े कार्यों की आलोचना तक प्रकाशित नहीं हो सकती थीं। न्यायपालिका के फैसलों और जेल में बंद राजनेताओं के स्वास्थ्य के बारे में लिखना भी अपराध की श्रेणी में था।
बिहार प्रतिरोध का केंद्र था और यहां की पत्रकारिता का दमन किया जा रहा था। बिहार के केंद्र में रहने की वजह लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी थे। देशव्यापी प्रतिरोध की आग यहां से मुखर हुई थी। बिहार के पत्रकारों पर दमन चक्र चलाया जा रहा था। जो अखबार या पत्रकार सरकार की जी-हुजूरी करने को तैयार नहीं थे, उन्हें आर्थिक रूप से तोड़ने की कोशिश की गई। सरकारी विज्ञापन पूरी तरह बंद कर दिए गए, जो उस समय अखबारों की आय के मुख्य स्रोत थे। सर्चलाइट और प्रदीप जैसे अखबारों ने इस दमन के खिलाफ घुटने टेकने से मना कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप उनके संपादकों और संवाददाताओं को प्रताड़ित किया गया। आपातकाल के समय पटना के सर्चलाइट और प्रदीप प्रेस में योजना पूर्वक आग लगाई गई थी।
आपातकाल के बाद तत्कालीन भारतीय जनसंघ के नेता रहे लालकृष्ण आडवाणी ने भारतीय मीडिया के एक बड़े हिस्से पर कटाक्ष किया था। उन्होंने कहा था कि मीडिया को "जब झुकने को कहा गया, तो कुछ रेंगने लगे"। लेकिन बिहार में ही कई ऐसे पत्रकार भी थे जिन्होंने रेंगने के बजाय जेल जाना स्वीकार किया। बिहार के दर्जनों पत्रकारों को 'मीसा' और 'डीआईआर' जैसे कड़े कानूनों के तहत बिना किसी वारंट के ही गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया। पत्रकारों को डराने के लिए उनके घरों पर छापे मारे गए और प्रेस की संपत्तियों तक को भी जब्त कर लिया गया।सेंसरशिप लागू होने के बावजूद बिहार की पत्रकारिता ने इसका विरोध किया। जब सरकार ने लिखने पर पाबंदी लगाई तो अखबारों ने विरोध के तौर पर अपने संपादकीय कॉलम को खाली छोड़ना शुरू कर दिया। सुबह जब पाठकों के हाथ में अखबार आता था और वे संपादकीय की जगह सफेद कोरा पन्ना देखते थे तो वे सरकार की तानाशाही को समझ जाते थे।
उसी दौरान कई पत्रकारों और साहित्यकारों ने रूपकों और कविताओं का सहारा लिया। सुप्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार फणीश्वरनाथ रेणु ने आपातकाल के विरोध में अपना 'पद्मश्री' सम्मान तक लौटा दिया था। बिहार के अखबारों में कबीर, तुलसी और दिनकर की उन कविताएं छपने लगी थी जो अत्याचार और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाती थी। मुख्यधारा की मीडिया पर सेंसरशिप के बाद बिहार में भूमिगत पत्रकारिता का जन्म हुआ। सरकारी चैनल भी सरकार के अधीन थे। जनता तक सच पहुंचाने के लिए साइक्लोस्टाइल मशीनों का सहारा लिया गया। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने गुप्त ठिकानों से छोटे-छोटे बुलेटिन, पर्चे और पत्रिकाएं निकालनी शुरू कीं। जेल में बंद लोगों की स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी और देश में विरोध प्रदर्शन कहां हो रहे हैं इन सबकी जानकारी इसी भूमिगत पत्रकारिता के माध्यम से बिहार के गांवों और कस्बों तक पहुंचती थी। पुलिस इन गुप्त प्रेसों को ढूंढने के लिए लगातार छापेमारी करती रहती थी।
19 महीनों तक लागू रहे आपातकाल को मार्च 1977 में समाप्त किया गया। बिहार की पत्रकारिता के लिए यह काला अध्याय था जिसने मीडिया की स्वतंत्रता का पूरी तरह गला घोंट दिया था। इस दमनकारी दौर ने यह साबित कर दिया कि जब सत्ता निरंकुश होती है तो सबसे पहले सच की हत्या की जाती है। पत्रकारिता पर अंकुश लगाया जाता है।बिहार की पत्रकारिता के एक बड़े हिस्से ने अपनी जुझारू परंपरा को जीवित रखा उसी का यह परिणाम हुआ कि आपातकाल हटने के बाद जब चुनाव हुए तो बिहार की जनता ने तत्कालीन तानाशाही सरकार को पूरी तरह उखाड़ फेंका। आपातकाल का वह दौर आज भी पत्रकारों के लिए एक चेतावनी की तरह है कि निष्पक्षता और साहस ही पत्रकारिता की असली रीढ़ हैं।
