erer | Source: ereनई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव 2026 के नतीजों के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का सिलसिला तेज हो गया है। चुनाव में ABVP ने चार में से तीन प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की, जबकि उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन विजयी रहे। इन नतीजों पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास ने कांग्रेस और लेफ्ट पर निशाना साधते हुए विपक्षी एकता और वोटों के बंटवारे को लेकर सवाल उठाए हैं।

‘ऐसी विपक्षी एकता रही तो विपक्ष में ही बने रहेंगे’

सौरव दास ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर DUSU चुनाव के नतीजों को लेकर अपनी प्रतिक्रिया साझा की। उन्होंने कहा कि चुनाव परिणामों से उन्हें दो बातें पता चलीं। उनके अनुसार, बड़ी संख्या में छात्र मौजूदा सरकार के खिलाफ हो सकते हैं, लेकिन उनके बीच विभाजन होने की वजह से इसका लाभ सरकार को मिल रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव जीतने वाले उम्मीदवारों को यह याद रखना चाहिए कि पद मिलने का अर्थ यह नहीं है कि वे ‘राजा या रानी’ बन गए हैं, क्योंकि अधिकांश छात्रों ने उन्हें वोट नहीं दिया।

दास ने अपनी पोस्ट में कांग्रेस और लेफ्ट की कार्यशैली पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि CJP को परेशान करने के बजाय कांग्रेस और उसके ‘ब्यूरोक्रेटिक विंग’ के लिए अपने राजनीतिक खेल को सुधारना बेहतर होगा। उन्होंने दावा किया कि यह स्थिति पिछले 12 वर्षों से चली आ रही है और लोगों का धैर्य अब टूट रहा है।

NSUI के बागी उम्मीदवार की जीत का भी किया जिक्र

CJP प्रवक्ता ने अपने बयान में DUSU उपाध्यक्ष पद के नतीजे का भी उल्लेख किया। उन्होंने NSUI के एक बागी उम्मीदवार का उदाहरण देते हुए कहा कि टिकट नहीं मिलने के बाद वह उम्मीदवार उपाध्यक्ष पद पर बड़े अंतर से जीत गया। दास ने इस घटनाक्रम को कांग्रेस और उससे जुड़े छात्र राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में रखा।

उन्होंने लेफ्ट की राजनीति को लेकर भी टिप्पणी की। दास के मुताबिक, लेफ्ट यूनिटी में कुछ लोग, हालांकि सभी नहीं, विचारधारात्मक शुद्धता और विशिष्टता पर जरूरत से ज्यादा जोर दे रहे हैं। उन्होंने ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं से राजनीतिक वास्तविकता को समझने और परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति पर विचार करने की बात कही।

‘कोई भी उनसे मान्यता लेने के लिए नहीं भाग रहा’

सौरव दास ने अपनी पोस्ट में लेफ्ट की राजनीतिक शैली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्हें यह समझना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति उनकी मान्यता हासिल करने के लिए उनके पास नहीं आ रहा है। इसी संदर्भ में उन्होंने विपक्षी एकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर यही विपक्षी एकता है तो उन्हें डर है कि विपक्ष लंबे समय तक विपक्ष में ही बना रहेगा।

दास की इन टिप्पणियों के बाद DUSU चुनाव के नतीजों को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है। उनके बयान का मुख्य फोकस विपक्षी दलों के बीच तालमेल, छात्र राजनीति में वोटों के विभाजन और चुनावी रणनीति पर रहा।

DUSU में ABVP ने तीन पदों पर दर्ज की जीत

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में ABVP ने चार प्रमुख पदों में से तीन पर जीत हासिल की। वहीं उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने जीत दर्ज की। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद अलग-अलग राजनीतिक समूहों की ओर से नतीजों की व्याख्या अपने-अपने तरीके से की जा रही है।

सौरव दास ने भी चुनाव परिणाम को केवल एक छात्रसंघ चुनाव के रूप में देखने के बजाय देश के युवाओं के व्यापक राजनीतिक माहौल से जोड़ने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि केवल DUSU चुनाव के नतीजों के आधार पर करोड़ों युवाओं के राजनीतिक रुझान का आकलन करना उचित विश्लेषण नहीं होगा।

बेरोजगारी, शिक्षा और महंगाई का भी उठाया मुद्दा

अपने एक अन्य सोशल मीडिया पोस्ट में सौरव दास ने बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था, स्कूलों की स्थिति, महंगाई और युवाओं में निराशा जैसे मुद्दों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि देश की एक पूरी पीढ़ी इन समस्याओं का सामना कर रही है और ऐसे व्यापक मुद्दों के राजनीतिक माहौल को केवल एक छात्रसंघ चुनाव के परिणाम से नहीं समझा जा सकता।

उन्होंने DUSU चुनाव को लेकर पैसे और बाहुबल के इस्तेमाल का भी दावा किया और कहा कि इस तरह के चुनाव के नतीजे को पूरे देश के युवाओं के राजनीतिक मूड का पैमाना मानना सही नहीं होगा। यह टिप्पणी उन्होंने अपने राजनीतिक विश्लेषण के संदर्भ में की।

गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय का उदाहरण देकर पूछा सवाल

सौरव दास ने अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के चुनाव परिणाम का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि DUSU में ABVP की जीत को अगर किसी व्यापक राजनीतिक संकेतक के तौर पर देखा जा रहा है, तो आठ दिन पहले गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय में ABVP की हार को भी उसी नजर से देखना चाहिए।

उन्होंने सवाल किया कि क्या दिल्ली के एक कॉलेज के युवाओं की राजनीतिक पसंद को देश के दूसरे विश्वविद्यालयों के युवाओं की तुलना में अलग महत्व दिया जाना चाहिए। दास ने इसी आधार पर DUSU परिणामों को पूरे देश के युवाओं के राजनीतिक मूड का निर्णायक पैमाना मानने पर आपत्ति जताई।

विपक्षी वोटों के बंटवारे को बताया महत्वपूर्ण मुद्दा

अपने बयान के अंतिम हिस्से में सौरव दास ने चुनावों में विपक्षी वोटों के विभाजन का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि उनके अनुसार विपक्ष के वोटों का बंटना चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारण हो सकता है। उन्होंने इसे मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और विपक्ष की रणनीति से जोड़कर देखा।

DUSU चुनाव के नतीजों के बाद सामने आए सौरव दास के बयान में छात्र राजनीति से लेकर विपक्षी दलों के बीच तालमेल, विचारधारा, चुनावी रणनीति और युवाओं से जुड़े व्यापक मुद्दों पर कई सवाल उठाए गए हैं। उनके बयानों ने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के राजनीतिक प्रभाव को लेकर चल रही बहस को एक नया मुद्दा दिया है।